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मुसलमानों की चाल से बिगड़ा प्रत्याशियों का गणित
Updated Fri, 24 Nov 2017 11:34 PM IST
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आजमगढ़। निकाय चुनाव के लिए मतदान समाप्त हो चुका है। अब वोटों का गुणा-गणित शुरू हो चुकी है, लेकिन सियासत की इस बिसात पर इस बार मुस्लिमों की चाल ने सभी प्रत्याशियों की गणित बिगाड़ दी है। मुस्लिमों को इस रुख से इन्हें अपना वोट बैं क समझने वाली पार्टियां उलझ गई है। इस बार मुस्लिमों ने ऐसे प्रत्याशियों को वोट किया है जो मुख्य मुबाकले में हो। इसके लिए उन्होंने ये भी नहीं देखा कि सामने प्रत्याशी निर्दल है या किसी दल का।
निकाय चुनाव में मुस्लिमों को लुभाने में किसी भी पार्टी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हर तरह से उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए खूब लुभाया गया। लेकिन मतदान के बाद यही पार्टियां उनके रुख को देखकर कर उलझन में पड़ गई हैं। कारण ये है कि मुस्लिमों को अपना वोट बैंक समझने वाली पार्टियों के प्रत्याशियों को उनका एक मुश्त वोट अपनी ओर पड़ता नजर नहीं आ रहा है। अब इसे लोकसभा और विधान सभा चुनाव का परिणाम समझे या कुछ और। इस बार निकाय चुनाव में मुस्लिमों ने भी खूब फूंक फूंक कर कदम रखा है। मुस्लिम मतदाताओं इस बार उन प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान किया जो मुख्य मुकाबले में नजर आए। अब चाहे वो पार्टी विशेष का प्रत्याशी हो या निर्दल। निर्दल प्रत्याशी यदि जीतने की स्थिति में था तो उन्होंने उसे भी वोट देना गंवारा नहीं समझा। इसके लिए उन्होंने पूरे चुनाव के दौरान खुलने के बजाय अंत तक इंतजार किया। कहीं उनका रुझान सपा की ओर से रहा तो कहीं बसपा की ओर। यहीं नहीं कहां निर्दल जीत की ओर से तो उनकी भी ओर। यहीं कारण हैं उन्हें अपना वोटबैंक समझने वाली पार्टियों की गणित अभी तक उलझी हुई है। सभी अपनी जीत और हार को लेकर फिर से मंथन कर रहे हैं।
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व्यापारियों को लेकर भाजपा में संशय
आजमगढ़। निकाय चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की घोषणा के साथ ही पूर्व पालिकाध्यक्ष इंदिरा देवी जायसवाल के पुत्र अभिषेक जायसवाल दीनू ने भाजपा के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकते हुए निर्दलीय नामांकन कर दिया था। हालांकि भाजपा ने उन्हें समझा कर नामांकन वापस करा लिया, लेकिन इस प्रकरण को लेकर व्यापारियों के भाजपा के पक्ष में वोटिंग को लेकर संशय का आलम है। जबकि के भाजपा के परंपरागत वोटर माने जाते हैं। अब असली स्थिति मतगणना क बाद ही साफ होगी।
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निकाय चुनाव में मुस्लिमों को लुभाने में किसी भी पार्टी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हर तरह से उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए खूब लुभाया गया। लेकिन मतदान के बाद यही पार्टियां उनके रुख को देखकर कर उलझन में पड़ गई हैं। कारण ये है कि मुस्लिमों को अपना वोट बैंक समझने वाली पार्टियों के प्रत्याशियों को उनका एक मुश्त वोट अपनी ओर पड़ता नजर नहीं आ रहा है। अब इसे लोकसभा और विधान सभा चुनाव का परिणाम समझे या कुछ और। इस बार निकाय चुनाव में मुस्लिमों ने भी खूब फूंक फूंक कर कदम रखा है। मुस्लिम मतदाताओं इस बार उन प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान किया जो मुख्य मुकाबले में नजर आए। अब चाहे वो पार्टी विशेष का प्रत्याशी हो या निर्दल। निर्दल प्रत्याशी यदि जीतने की स्थिति में था तो उन्होंने उसे भी वोट देना गंवारा नहीं समझा। इसके लिए उन्होंने पूरे चुनाव के दौरान खुलने के बजाय अंत तक इंतजार किया। कहीं उनका रुझान सपा की ओर से रहा तो कहीं बसपा की ओर। यहीं नहीं कहां निर्दल जीत की ओर से तो उनकी भी ओर। यहीं कारण हैं उन्हें अपना वोटबैंक समझने वाली पार्टियों की गणित अभी तक उलझी हुई है। सभी अपनी जीत और हार को लेकर फिर से मंथन कर रहे हैं।
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व्यापारियों को लेकर भाजपा में संशय
आजमगढ़। निकाय चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की घोषणा के साथ ही पूर्व पालिकाध्यक्ष इंदिरा देवी जायसवाल के पुत्र अभिषेक जायसवाल दीनू ने भाजपा के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकते हुए निर्दलीय नामांकन कर दिया था। हालांकि भाजपा ने उन्हें समझा कर नामांकन वापस करा लिया, लेकिन इस प्रकरण को लेकर व्यापारियों के भाजपा के पक्ष में वोटिंग को लेकर संशय का आलम है। जबकि के भाजपा के परंपरागत वोटर माने जाते हैं। अब असली स्थिति मतगणना क बाद ही साफ होगी।
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