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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya Ram Mandir Lord Shri Ram gives message of harmony

सबके राम: शबरी के श्रीराम... देते हैं समरसता का संदेश, प्रभु और भक्त का संबंध पश्चिमी समाज की कल्पना से भी परे

Fri, 19 Jan 2024 08:42 AM IST
आकाश दुबे राज चावला, अमर उजाला
राज चावला, अमर उजाला Published by: आकाश दुबे Updated Fri, 19 Jan 2024 08:42 AM IST
सार

श्री रामायण का हर घटनाक्रम समरस विश्व की दिशा में बड़ा संदेश भी है। जैसे एक वृद्धा, वनवासिनी, ऋषियों की सेविका के मुख से चखे हुए बेर उनके हाथ से जब तीनों लोकों के पालनहार स्वीकार करते हैं, तब ऐसा समभाव, प्रभु और भक्त का इस तरह का संबंध पश्चिमी समाज की तो कल्पना से भी परे है।

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Ayodhya Ram Mandir Lord Shri Ram gives message of harmony
रामलला - फोटो : amar ujala

विस्तार

अयोध्यापुरी में बन रहा भव्य मंदिर क्या विश्व को नई दिशा दे सकता है? इसे समझना कठिन नहीं। दुनियाभर में भारत को लेकर आज जो दृष्टिकोण बदला, भारत का स्वाभिमान जागा, यदि इनसे जुड़ी सभी घटनाओं पर साधारण चिंतन है, तो उत्तर है हां। श्री रामायण का हर घटनाक्रम समरस विश्व की दिशा में बड़ा संदेश भी है। जैसे एक वृद्धा, वनवासिनी, ऋषियों की सेविका के मुख से चखे हुए बेर उनके हाथ से जब तीनों लोकों के पालनहार स्वीकार करते हैं, तब ऐसा समभाव, प्रभु और भक्त का इस तरह का संबंध पश्चिमी समाज की तो कल्पना से भी परे है। श्रीराम जब माता सीता की खोज में निकले तो रास्ते में कबंध ने उन्हें शबरी के आश्रम जाने का परामर्श दिया। शबरी के आत्मीय सत्कार से प्रभु अति प्रसन्न हुए। श्रीराम और शबरी के संवाद की गहराई समझिए, जिसे वे जानते नहीं थे, उसकी कितनी चिंता करते थे। श्रीराम पूछते हैं-

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कश्चित ते नियमा: प्राप्ता: कश्चित ते मनस: सुखम।
कश्चित ते गुरुसुश्रूषा सफला चारूभाषिणि...।

यानी हे तपस्विनी, तुम्हारे आहार नियमों में कोई बाधा तो नहीं? तुम प्रशांत जीवन तो व्यतीत कर रही हो न? हे मृदुभाषिणि, तुम अपने गुरु की सेवा में अपने आप को धन्य तो बना रही हो न?
वन में रहने वाली वृद्धा को एक चक्रवर्ती सम्राट कैसे संबोधित करता है। यह वास्तव में इस पावन धरा का ही चरित्र हो सकता है। या दूसरी तरह से देखें तो वनवासिनी की तपस्या में इतना बल हो सकता है कि एक चक्रवर्ती सम्राट स्वयं उसके दर तक आए। अब इससे बड़ा परमानंद शबरी के जीवन में कहां होगा। श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में लिखा है-  

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुं आनि। 
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥

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यानी माता शबरी ने रसीले और स्वादिष्ट कंद, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया॥ शबरी के उद्धारक श्रीराम फिर शबरी माता जानकी के बारे में बताती हैं

पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहं होइहि सुग्रीव मिताई॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूं पूछहु मतिधीरा॥

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शबरी कहती हैं- हे रघुनाथजी, आप पंपा सरोवर जाइए। वहां आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव, वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि, आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं। अरण्यकाण्ड में फिर लिखा है-

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह परि पद लीन भइ जहं नहिं फिरे॥

यानी सारी कथा कहकर भगवान के दर्शन कर, उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गई, जहां से लौटना नहीं होता। माता शबरी भील समाज से आती थीं। ऋषियों की सेवा में पूरा जन्म लगाया और अंत में प्रभु के दर्शन के बाद स्वयं ही देह छोड़ दी। इधर श्रीराम उन्हें भामिनी कहते हैं, उनके चखे फल खाते हैं, सीता को खोजने में मदद मांगते हैं और अंत में मुक्ति देते हैं। भारतभूमि की इसी सांस्कृतिक विशिष्टता ने माता शबरी को अमर बना दिया। इसीलिए तो अयोध्या का मंदिर विश्व के लिए श्री रामायण का संदेशवाहक, दिग्दर्शक व मार्गदर्शक भी है। जब हम कहते हैं सबके राम, तो श्री रामायण का यही सार संसार के हर वर्ग, श्रेणी के प्राणी को गले लगाने का संदेश भी है।

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