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एक घर से उठे तीन शव, लोगों के दिल दहले
Auraiya, Uttar pradesh, India
Updated Mon, 06 Jun 2016 11:31 PM IST
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- पोस्टमार्टम हाउस के बाहर बैठे रजत उर्फ नितिन के परिजन
- फोटो : amar ujala beuro
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रविवार को यमुना नदी में डूबने से हुई पांच लोगाें की मौत में तीन के शव कल ही मिल गए थे। सोमवार को पोस्टमार्टम के बाद जब शव घर पहुंचे तो देखने वालों की आंखे नम हो गई। मृतकों में दो फतेहपुर के थे। जिनको परिजन अपने साथ ले गए। जबकि एक युवक का शव शेरगढ़ घाट यमुना ले जाया गया। एक ही घर से तीन शव उठते देख लोगों के दिल दहल उठे।
सोमवार को पोस्ट मार्टम के बाद रामजी, उमाकांत और नितिन का शव दिल्ली दरवाजा पहुंचा। घर पर तीनों परिवारों के लोग जमा थे। जैसे ही तीन शव एक साथ घर पहुंचे तो परिवार के लोगों में कोहराम मच गया। चारों तरफ चीख पुकार सुनाई दे रहा था। मौजूद मोहल्ले के लोगों में इस मंजर को देखने वाली हर आंख में आंसू था। वहीं फतेहपुर से आए उमाकांत व नितिन के परिजनों ने दोपहर दो बजे अपने-अपने पुत्रों को लेकर फतेहपुर को रवाना हो गए। वहीं रामजी का शव परिजन शेरगढ़ घाट के गए।
दादी का रो-रो कर बुरा हाल
इस पूरी घटना में माता-पिता के बाद सबसे ज्यादा बुरा हाल 75 वर्षीय बाबा वीरेंद्र शुक्ला व दादी सत्यवती 70 साल का था। बुढ़ापे के इस दौर तक पहुंचते-पहुंचते तीन साल पहले दामाद की मौत अब दो-दो नातियों की मौत दुख उनसे सहा नहीं जा रहा था। दादी तो बार-बार एक ही बात बोल रही थी कि अब जिंदा रहने के लिए दवा खाकर भी क्या होगा। आखिर कब तक भगवान हमें इस उम्र में अपनों की मौत का मंजर दिखाएगा।
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सोमवार को पोस्ट मार्टम के बाद रामजी, उमाकांत और नितिन का शव दिल्ली दरवाजा पहुंचा। घर पर तीनों परिवारों के लोग जमा थे। जैसे ही तीन शव एक साथ घर पहुंचे तो परिवार के लोगों में कोहराम मच गया। चारों तरफ चीख पुकार सुनाई दे रहा था। मौजूद मोहल्ले के लोगों में इस मंजर को देखने वाली हर आंख में आंसू था। वहीं फतेहपुर से आए उमाकांत व नितिन के परिजनों ने दोपहर दो बजे अपने-अपने पुत्रों को लेकर फतेहपुर को रवाना हो गए। वहीं रामजी का शव परिजन शेरगढ़ घाट के गए।
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दादी का रो-रो कर बुरा हाल
इस पूरी घटना में माता-पिता के बाद सबसे ज्यादा बुरा हाल 75 वर्षीय बाबा वीरेंद्र शुक्ला व दादी सत्यवती 70 साल का था। बुढ़ापे के इस दौर तक पहुंचते-पहुंचते तीन साल पहले दामाद की मौत अब दो-दो नातियों की मौत दुख उनसे सहा नहीं जा रहा था। दादी तो बार-बार एक ही बात बोल रही थी कि अब जिंदा रहने के लिए दवा खाकर भी क्या होगा। आखिर कब तक भगवान हमें इस उम्र में अपनों की मौत का मंजर दिखाएगा।
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