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जो बचाएं सबकी जान, उनके योगदान को सलाम

Fri, 01 Jul 2022 12:03 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 01 Jul 2022 12:03 AM IST
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Salute to the contribution of those who save everyone's life
डॉ. बृजेंद्र सिंह व पत्नी डॉ. रूचि। संवाद - फोटो : AURAIYA
औरैया। डॉक्टर को यूं ही भगवान के समान दर्जा नहीं दिया जाता है। जब कोई बीमार अथवा हादसे का शिकार होता है तो ऐसे मुश्किल समय में डॉक्टर ही मदद करते हैं। हाल में ही कोरोना माहमारी के दौरान डॉक्टरों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दिन-रात काम किया। लोगों का जीवन बचाने के लिए डॉक्टर डटे रहे।
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कोविड काल में निभाई पूरी जिम्मेदारी
एसीएमओ डॉ. शिशिर पुरी ने बताया कि अच्छा इंसान एक अच्छा डॉक्टर जरूर होगा क्योंकि डॉक्टरी पेशे में इंसानियत बहुत जरूरी है। यही मैं अपने साथियों व जूनियरों को भी समझाता हूं। कोविड काल में जिला सर्विलांस अधिकारी की जिम्मेदारी निभाई। डॉक्टरों व स्वास्थ्य कर्मियों को कोविड संबंधित जानकारी दी। मरीजों का घर के सदस्यों की तरह इलाज किया। इस दौरान खुद भी कोरोना संक्रमित हुए।
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घर में तीन डॉक्टर, संक्रमित होकर नहीं हारी हिम्मत
औरैया के जानेतपुर निवासी डॉ. बृजेंद्र सिंह राजपूत राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में बाल रोग विशेषज्ञ है। बताया कि पत्नी डॉ. रुचि स्त्री रोग विशेषज्ञ है। पिता भारत सिंह ने खेती कर बृजेंद्र सिंह व बहन अंजली को एमबीबीएस कराया। कोविड काल में तीनों लोगों ने कोरोना संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए अपनी ड्यूटी बखूबी निभाई। संक्रमित मरीजों का इलाज करते समय वह खुद भी कोरोना की चपेट में आए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। स्वस्थ होने के बाद फिर से मरीजों को सेवाएं दीं।
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जागरुकता आई काम, लोगों ने लगवाई वैक्सीन
डॉ. देव नारायन कटियार ने बताया कि कोरोना काल के समय जिला प्रतिरक्षण अधिकारी रहे। सरकार के निर्देश पर पहले स्वास्थ्य कर्मियों व उसके बाद फ्रंटलाइन वर्करों को कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन जिले के सभी निर्धारित टीकाकरण केंद्र पर लगाई। इसके बाद लोगों को जागरूक करने के लिए जागरूकता कैंप, रैली व अन्य माध्यमों से वैक्सीन के फायदे बताए गए। तब जाकर लोग वैक्सीन लगवाने के लिए आगे आए।

मरीजों की दोस्त, भाई व बेटा बनकर सेवा की
डॉ. विशाल अग्निहोत्री ने बताया कि कोविड काल में मरीजों की दोस्त, भाई व बेटा बनकर सेवा की। सभी का नियमित इलाज किया। अस्पताल से घर जाने पर थोड़ा डर जरूर लगता था। ताकि किसी भी तरह परिवार के सदस्य कोरोना संक्रमित न हो सके। बचाव के लिए पीपीई कीट का सहारा लेना पड़ता था। गर्मी के मौसम में पीपीई कीट में बेहद गर्मी लगती थी, लेकिन उसे उतार नहीं सकते थे। क्योंकि खुद के साथ ही परिवार के सदस्यों की भी चिंता रहती थी। वही, अन्य लोग संक्रमित न हो इसका भी ध्यान देना पड़ता था।

 डॉ. देवनारायण कटियार। संवाद

डॉ. देवनारायण कटियार। संवाद- फोटो : AURAIYA

फोटो-30एयूआरपी- 36 डॉ. विशाल अग्निहोत्री। संवाद

फोटो-30एयूआरपी- 36 डॉ. विशाल अग्निहोत्री। संवाद- फोटो : AURAIYA

एसीएमओ डॉ. शिशिर पुरी। संवाद

एसीएमओ डॉ. शिशिर पुरी। संवाद- फोटो : AURAIYA

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