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औरैयाः दस सालों से बच्चों को संस्कारित कर रहीं ममता
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ममता चक। संवाद
- फोटो : AURAIYA
दिबियापुर। किसी भी लक्ष्य और सपने को साकार करने के लिए हौसला और हिम्मत होना जरूरी, तभी लक्ष्य पाया जा सकता है। ऐसा ही कुछ कर समाज के लिए मिसाल बनी हैं, एक छोटे से गांव केबिन की मड़ैया निवासी ममता। उन्होंने कम शिक्षित होते हुए भी समाजसेवा और बच्चों के संस्कारवान बनाने का सपना देखा। आज वह अपनी लगन से उसे पूरा कर लोगों के लिए नजीर बनी हुई हैं। वह बच्चों को निशुल्क शिक्षा व संस्कारित होने के टिप्स दे रही हैं।
दिबियापुर के पास गांव केबिन की मड़ैया निवासी ममता चक बताती हैं कि उनकी पढ़ाई तो हाईस्कूल तक हुई है, लेकिन शुरू से ही समाजसेवा करने के प्रति खासा रुझान रहा है। गांवों में गरीब परिवार के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक नहीं होते। इन परिवार के बच्चे गांव में इधर-उधर घूमकर समय बर्बाद करते नजर आते थे। उन्हें ऐसे बच्चों के लिए कुछ काम करने की हमेशा रुचि रहती थी।
इस बीच उन्हें विद्या भारती के सरस्वती संस्कार केंद्र की जानकारी मिली। लगभग 10 वर्ष पूर्व (2012) में उन्होंने अपने घर पर ही संस्कार केंद्र खोला। तब से प्रतिदिन एक घंटे का समय छोटे-छोटे बच्चों को संस्कारित करने व पढ़ाने में देती हैं। बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करना, योग सिखाना, अपने से बड़ों का सम्मान करना, प्रतिदिन स्नान कर शरीर की साफ सफाई रखना जैसे कई अन्य संस्कार सिखाना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं।
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अब तक सैकड़ों बच्चों को वह संस्कारित कर चुकीं हैं। काफी संख्या में बच्चे बड़े होकर कई क्षेत्रों में काम कर गांव का नाम रोशन कर रहे हैं। वह इस समय प्रतिदिन लगभग 40 बच्चों को संस्कारित कर रहीं हैं। सरस्वती विद्या मंदिर समेत कई संस्थाएं बच्चों को उपहार देकर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। ममता के पति विनोद कुमार चक फेरी लगाकर कपड़े बेचते हैं।
स्वयं सहायता समूह भी संचालित करतीं हैं
ममता चक बतातीं हैं कि वह लंबे समय से स्वयं सहायता समूह का भी संचालन करतीं हैं। सरकार की योजनाओं की जानकारी महिलाओं तक पहुंचातीं हैं। बताया कि कोरोना से पहले वह समूह के माध्यम से सिलाई केंद्र चला चुकीं हैं। इससे पहले गांव की महिलाओं को पहले सिलाई का प्रशिक्षण दिलाया था। सिलाई केंद्र के माध्यम से सरकारी स्कूलों के बच्चों की ड्रेसें सिलने लगीं थीं। लेकिन अब सरकार ने स्कूली यूनिफार्म के रुपये सीधे लाभार्थी के खाते में भेजने शुरू कर दिए हैं। इसके चलते सिलाई का काम बंद हो गया। उनके संगठन में लगभग दो सौ महिलाएं जुड़ीं हैं। यह सभी महिलाएं समूह से रुपया लेकर स्वरोजगार करके आत्मनिर्भर बन रहीं हैं। कई महिलाएं भैंस, बकरी लेकर दूध का काम कर रहीं हैं। जबकि कई महिलाएं खेती से भी जुड़ गईं हैं।
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दिबियापुर के पास गांव केबिन की मड़ैया निवासी ममता चक बताती हैं कि उनकी पढ़ाई तो हाईस्कूल तक हुई है, लेकिन शुरू से ही समाजसेवा करने के प्रति खासा रुझान रहा है। गांवों में गरीब परिवार के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक नहीं होते। इन परिवार के बच्चे गांव में इधर-उधर घूमकर समय बर्बाद करते नजर आते थे। उन्हें ऐसे बच्चों के लिए कुछ काम करने की हमेशा रुचि रहती थी।
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इस बीच उन्हें विद्या भारती के सरस्वती संस्कार केंद्र की जानकारी मिली। लगभग 10 वर्ष पूर्व (2012) में उन्होंने अपने घर पर ही संस्कार केंद्र खोला। तब से प्रतिदिन एक घंटे का समय छोटे-छोटे बच्चों को संस्कारित करने व पढ़ाने में देती हैं। बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करना, योग सिखाना, अपने से बड़ों का सम्मान करना, प्रतिदिन स्नान कर शरीर की साफ सफाई रखना जैसे कई अन्य संस्कार सिखाना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं।
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अब तक सैकड़ों बच्चों को वह संस्कारित कर चुकीं हैं। काफी संख्या में बच्चे बड़े होकर कई क्षेत्रों में काम कर गांव का नाम रोशन कर रहे हैं। वह इस समय प्रतिदिन लगभग 40 बच्चों को संस्कारित कर रहीं हैं। सरस्वती विद्या मंदिर समेत कई संस्थाएं बच्चों को उपहार देकर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। ममता के पति विनोद कुमार चक फेरी लगाकर कपड़े बेचते हैं।
स्वयं सहायता समूह भी संचालित करतीं हैं
ममता चक बतातीं हैं कि वह लंबे समय से स्वयं सहायता समूह का भी संचालन करतीं हैं। सरकार की योजनाओं की जानकारी महिलाओं तक पहुंचातीं हैं। बताया कि कोरोना से पहले वह समूह के माध्यम से सिलाई केंद्र चला चुकीं हैं। इससे पहले गांव की महिलाओं को पहले सिलाई का प्रशिक्षण दिलाया था। सिलाई केंद्र के माध्यम से सरकारी स्कूलों के बच्चों की ड्रेसें सिलने लगीं थीं। लेकिन अब सरकार ने स्कूली यूनिफार्म के रुपये सीधे लाभार्थी के खाते में भेजने शुरू कर दिए हैं। इसके चलते सिलाई का काम बंद हो गया। उनके संगठन में लगभग दो सौ महिलाएं जुड़ीं हैं। यह सभी महिलाएं समूह से रुपया लेकर स्वरोजगार करके आत्मनिर्भर बन रहीं हैं। कई महिलाएं भैंस, बकरी लेकर दूध का काम कर रहीं हैं। जबकि कई महिलाएं खेती से भी जुड़ गईं हैं।

सरस्वती संस्कार केंद्र पर बच्चों के साथ ममता चक। संवाद- फोटो : AURAIYA