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हौसले में दिखा पर्यावरण संरक्षण का जज्बा

Fri, 05 Jun 2015 12:43 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, औरैया
ब्यूरो/अमर उजाला, औरैया Updated Fri, 05 Jun 2015 12:43 AM IST
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Freshly show economies of environmental protection

जिले में पर्यावरण संरक्षण की नई इबारत क्षेत्र के मेहनतकश लोग लिख रहे हैं। अपने जुनून से वह आज भी पर्यावरण को बचाने में लगे हैं। पेश है ऐसे ही जुझारू युवाओं की मेहनत की एक तस्वीर..

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अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी बना पर्यावरण का भागीरथ- मुरादगंज  (औरैया)। समीपवर्ती गांव ततारपुर के किसान वीरेंद्र सिंह भदौरिया के पुत्र अवनीश सिंह भदौरिया ने अपने खेल जीवन की शुरुआत 1985 में बालीबाल स्पोटर्स  कालेज लखनऊ से की थी। उन्होंने 1978-88 में प्रदेश टीम का प्रतिनिधित्व किया।
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1988-90 तक राष्ट्रीय टीम का गौरव बढ़ाया। अवनीश ने  टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी में 1992 से 2007 तक सिंगापुर, बैंकाक, मलाया आदि देशों में जाकर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की।
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भागदौड़ की जिंदगी से आजिज आ चुके 45 वर्षीय भदौरिया बताते हैं कि वह परेशान थे, तब चाचा रवींद्र  सिंह भदौरिया जो कि चीफ आफ कंजरर्वेशन उत्तर प्रदेश से सेवानिवृत्त हुए थे, ने उन्हें सुखमय जीवन के लिए प्रकृति से प्रेम करने की सलाह दी।


उन्होंने चाचा के सुझाव पर आत्मसात करते हुए चार एकड़ जमीन पर किन्नू, आम, पीपल, बरगद, नीम आदि के पौध रोपित किए।



पत्नी के वियोग ने बनाया पर्यावरण प्रेमी- मुरादगंज  (औरैया)। सरकार भले ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति उदासीन हो, किंतु अजीतमल  ब्लाक क्षेत्र के ग्राम बिरुहनी के एक लाल ने पर्यावरण संरक्षण कार्य को भगवान मान लिया है।


ग्राम बिरुहनी निवासी चंद्र दत्त विश्नोई के पुत्र भगवत स्वरूप विश्नोई बताते हैं कि 22 वर्षो से वह नर्सरी को भगवान मान बैठे हैं।


 
बताते हैं कि 1991 में पत्नी रेशमा उर्फ उमा देवी विश्नोई की अचानक मौत ने उनका जीवन ही बदल दिया। उन्होंने पत्नी की याद में एक जून 1992  को उद्यान की शुरुआत की। छह एकड़ के बाग में अमरूद, आंवला, कटहल आदि फसलों से दो लाख रुपये का मुनाफा कमा लेते हैं।


इसके अलावा देहरादून की लीची, मेरठ का आडू व नाशपाती, कश्मीर का सेब, केसर, दक्षिण भारत का चंदन,  चीकू, सीता, अशोक, गोवा का काजू, तेजपत्ता, लिली, केरल की इलाइची आदि के पौध उनके बाग में देखे जा सकते हैं।



कानपुर से बीएससी एमएड की डिग्री  हासिल करने वाले विश्नोई बताते हैं कि ग्रीन हाइस की मदद से वह वातावरण को अनुकूल बना लेते है। वह निशुल्क प्रशिक्षण देने के लिए सदैव तत्पर्य रहते हैं।

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