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आजादी की याद दिलाती है नील की कोठी
अमर उजाला ब्यूरो औरैया
Updated Sat, 15 Aug 2015 12:38 AM IST
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रोशंगपुर-लखनपुर कोठी क्षेत्र के चपटा गांव में खंडहर में तब्दील होती नील की कोठियां आजादी की याद दिलाती है। कभी यहां नील की भरमार रहती है। देश के कोने- कोने तक नील का व्यवसाय रोशगंपुर-लखनपुर कोठी से संचालित होता था। यहां से अंग्रेज अधिकारी देश की पूरी नील खेती पर नजर रखते थे।
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खंडहर होते अवशेषों की ओर इशारा करते हुए गांव के वयोवृद्ध ज्ञानेंद्र सिंह भदौरिया, दुर्गा प्रसाद दुबे, गोपीनाथ पांडेय बताते हैं कि जब भारत में अंग्रेज व्यापार करने आए थे तो उन्होंने सबसे पहले नील की खेती से व्यापार शुरू किया था। धीरे-धीरे देशी रियासतों में उठे मतभेदों के चलते अंग्रेजों को लाभ मिलता चला गया।
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उन्होंने मौके का फायदा उठाकर मजदूरों को नील की खेती करने के लिए विवश कर दिया। इस गांव को नील के व्यवसाय का केंद्र बना दिया। 1882 में निर्मित टकपुरा नहर कोठी की इमारत इस बात की गवाह है कि अंग्रेज यहां ठहरकर अपनी हुकूमत चलाते थे।
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उपेक्षित है स्व. बाबूराम सविता की प्रतिमा- मुरादगंज (औरैया)। आजादी के 68 वर्ष बाद भी रणबाकुंरों के वंशजों को प्रशासनिक उपेक्षा का अफसोस है। आजादी की लड़ाई में अपने पति की बहादुरी के किस्से सुनाते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. बाबूराम सविता की बेवा फफक पड़ती हैं।
वह कहती हैं कि अब लला शहीदन की कौऊ बकत नहींया.. मुंह पर साड़ी का पल्लू लगाकर आंखों में आंसू भरे बैठी बिरुहनी गांव की इमरती देवी कहती हैं कि पहले कोई न कोई प्रशासनिक अधिकारी बीमारी में पूछने आ जाता था, लेकिन पिछले कई वर्षो से कोई देखने वाला नहीं है।
अब तो उनकी प्रतिमा पर फूल भी कोई चढ़ाने नहीं आता है। गर्व से अपने पति को मिले ताम्रपात्र को दिखाते हुए कहती हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने यह ताम्रपात्र उन्हें भेंट किया था। उन्होंने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए थे।
तंग आकर अंग्रेजों ने उन्हें मैनपुरी जेल में डाल दिया था। उस समय अंग्रेजों का विरोध कर पाना आम आदमी के बस की बात नहीं थी।