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आजादी का दीवाने मुकुंदी लाल को भारतवीर से नवाजा
अमर उजाला ब्यूरो औरैया
Updated Sun, 09 Aug 2015 12:08 AM IST
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आजादी की लड़ाई में जहां बड़े-बड़े देशभक्तों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर देश को आजादी दिलाई। वहीं औरैया के भारतवीर उपाधि से अलंकृत मुकुंदीलाल गुप्ता ने भी अपने गुरु पं. गेंदालाल दीक्षित से प्रेरित होकर देश को आजाद कराने में अपनी महती भूमिका अदा की।
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नौ अगस्त 1925 को साथी राम प्रसाद विस्मिल के साथ मिलकर उन्होंने काकोरी ट्रेन डकैती की घटना को अंजाम देते हुए अंग्रेजी हुकूमत का खजाना लूटकर देशभक्तों की श्रेणी में अपना नाम दर्ज कराया।
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भारतवीर मुकुंदीलाल गुप्ता को काकोरी कांड से पूर्व मैनपुरी षड़यंत्र कांड में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था। इस सिलसिले में वर्ष 1918 में उन पर मुकदमा चला, जिसमें क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के कारण मुकुंदीलाल को छह वर्ष का कठोर कारावास हुआ।
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जेल से मुक्त होने के बाद मुकुंदीलाल क्रांतिकारी गतिविधियों में निरंतर भाग लेते रहे। पुलिस इनके परिवार को परेशान करने लगी।
ऐसी स्थिति में अपने को सुरक्षित रखने को मुकुंदीलाल का परिवार झांसी चला गया और वहां व्यापार करने लगा। आजादी के दीवाने मुकुंदीलाल ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग जारी रखने को मैनपुरी कांड में जिन युवकों को सजा दी गई, उन्हें खोजकर संपर्क करना शुरू कर दिया।
इस अभियान में क्रांतिकारी शतींद्र नाथ बक्सी भी उनके साथ रहे। चूंकि झांसी पहले से ही क्रांतिकारियों का गढ़ था। इसलिए इन दोनों का संपर्क बढ़ता गया।
शतींद्र नाथ के प्रयास से भारतवीर मुकुंदीलाल क्रांतिकारी दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ से जुड़ गए। संघ के माध्यम से उन्होंने काकोरी कांड की योजना तैयार की।
बैठकों में भाग लेते रहे और अंग्रेजों की सरकारी संपत्ति छीनने में जुट गए। नौ अगस्त 1925 को मुकुंदीलाल गुप्त ने साथियों के साथ काकोरी में ट्रेन के डिब्बे के पास खड़े होकर फायर करना शुरू कर दिया, जिससे कोई यात्री नीचे न उतर सके। बाद में मुखबिरी के चलते 26 सितंबर 1926 को मुकुंदीलाल पुलिस के हत्थे चढ़ गए।
अंग्रेजी हुुकूमत ने उन पर काकोरी कांड से संबंधित मुकदमा लखनऊ न्यायालय में चलाया। छह अप्रैल 1927 को न्यायाधीश ने मुकुंदीलाल गुप्त को आजीवन काले पानी की सजा सुनाई। हालांकि दस वर्ष बाद ही उन्हें रिहा भी कर दिया गया।
जेल से रिहा होते ही मुकुंदीलाल ने 1942 के स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता से भाग लेना शुरू कर दिया। इस दौरान भारत छोड़ो आंदोलन में एक बार फिर से वह अंग्रेजी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिसमें उन्हें सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई, लेकिन भारत का यह सपूत देश सेवा में अडिग बना रहा।