{"_id":"5745de904f1c1bd53c690787","slug":"fire-victims-spent-the-night-in-open","type":"story","status":"publish","title_hn":"खुले में गुजरी अग्निकांड पीड़ितों की रात ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खुले में गुजरी अग्निकांड पीड़ितों की रात
Auraiya, Uttar pradesh, India
Updated Wed, 25 May 2016 10:49 PM IST
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आग से वीरान हुई बस्ती के उजड़े घर
- फोटो : amar ujala beuro
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कलापुर गांव में हुए अग्निकांड में 21 परिवारों के सिर से छत छिन गई है। खुले आसमान के नीचे अग्नि पीड़ितों की रात गुजरी। मंगलवार को हुए अग्निकांड का मंजर अभी तक पीड़ितों की आंखों में तैर रहा है। लगभग एक सैंकड़ा लोगों को खुले में रात गुजारनी पड़ी। घर में रखा अनाज भी जलकर राख हो गया। फिलहाल तो गांव वाले मदद कर रहे हैं। लेकिन आगे क्या होगा, यह सोचकर सभी परेशान हैं।
ग्राम कलापुर में चूल्हे की चिंगारी से हुए अग्निकांड ने 21 परिवारों के घर राख कर दिए। दाने-दाने को मोहताज एक सैंकड़ा से भी अधिक लोगों को खुले में रात गुजारने को मजबूर होना पड़ रहा है। घटना के दिन तो कई सामाजिक संगठनों ने पहुंचकर पीड़ितों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त की, लेकिन संवेदनाओं के इस दौर में किसी को भी अग्नि पीड़ितों के पेट की आग नहीं दिखाई दी। इसके चलते दूसरे दिन शाम तक भोजन मुहैया नहीं हो सका।
उधर पीड़ितों को भूखे पेट देख गांव के रमेश सिंह सहित अन्य गांववासियों ने पीड़ितों के पेट की आग शांत की। पीड़ितों के प्रति जिला प्रशासन ने भी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। संवेदना के तौर पर अगर उन्हें कुछ मिला तो वह था बिस्कुट और लइया के पैकेट। ऐसे में पीड़ित भूख से विचलित दिखे। गांव निवासी रमेश सिंह ने बताया कि आग लगने के बाद एक के बाद एक राख हुए घरों से उठ रही लपटों को देख कर मुुंह से आह भी नहीं निकल पा रही थी।
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पानी पीकर ही बुझाई भूख
दैवीय आपदा से गांव में एक ओर जहां गम का माहौल दिखाई दिया तो वहीं नौनिहालाें सहित छोटे-छोटे बच्चों को दूध के लिए भी तरसना पड़ा। सूखी संवेदनाएं लेकर गांव पहुंचे लोगों ने पीड़ितों से मिलकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली, लेकिन किसी का भी भूख से बिलबिलाते नौनिहालों की ओर ध्यान नहीं दिया। भूख शांत करने को बच्चे बोतल में भरा पानी पीकर ही भूख मिटाते दिखे।
राख में तलाशे आलू
औरैया। जब व्यक्ति की पेट की आग भड़कती है तो फिर दिमाग भी काम करना बंद कर देता है। इसका नजारा बुधवार को गांव की पड़ताल के दौरान देखने को मिला। भूख से रोते-बिलखते बच्चों को देख पाने में असमर्थ होशियार सिंह की पत्नी सब कुछ बर्बाद होने के बावजूद पागलों की तरह राख में जले आलू तलाशते रही। यही नही अधिकतर लोग राख में ही खाने का सामान भूख मिटाने को तलाशते रहे।
इमदाद मिलने पर खिले बच्चों के चेहरे
औरैया। जिला पंचायत अध्यक्ष राजवीर यादव की ओर से इमदाद लेकर गांव पहुंचे हाफिज अब्दुल सत्तार, बबलू यादव, मनोज यादव आदि को देखते ही पीड़ित परिवारों के बच्चे जमा हो गए। जैसे ही इमदाद बांटी गई तो बच्चों के चेहरों पर खुशी के भाव दिखे। वह दी गई मदद का सामान लेकर अपने घर की ओर रवाना हो गए।
बूढ़ी आंखों से देखा आग का मंजर
औरैया। 75 बसंत देख चुकी सिया दुलारी की बूढ़ी आंखों ने मंगलवार को हुए अग्निकांड का खौफनाक मंजर भी देखा। लाठी के सहारे टिकाए कांपते शरीर के साथ उनकी बूढ़ी आंखें सिर्फ हादसे से जले बेटे के आशियाने को निहारती दिखी। शायद सोच रही होंगी कि उम्र के इस पड़ाव में भगवान ने उन्हें यह कैसे दिन दिखा दिए।
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ग्राम कलापुर में चूल्हे की चिंगारी से हुए अग्निकांड ने 21 परिवारों के घर राख कर दिए। दाने-दाने को मोहताज एक सैंकड़ा से भी अधिक लोगों को खुले में रात गुजारने को मजबूर होना पड़ रहा है। घटना के दिन तो कई सामाजिक संगठनों ने पहुंचकर पीड़ितों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त की, लेकिन संवेदनाओं के इस दौर में किसी को भी अग्नि पीड़ितों के पेट की आग नहीं दिखाई दी। इसके चलते दूसरे दिन शाम तक भोजन मुहैया नहीं हो सका।
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उधर पीड़ितों को भूखे पेट देख गांव के रमेश सिंह सहित अन्य गांववासियों ने पीड़ितों के पेट की आग शांत की। पीड़ितों के प्रति जिला प्रशासन ने भी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। संवेदना के तौर पर अगर उन्हें कुछ मिला तो वह था बिस्कुट और लइया के पैकेट। ऐसे में पीड़ित भूख से विचलित दिखे। गांव निवासी रमेश सिंह ने बताया कि आग लगने के बाद एक के बाद एक राख हुए घरों से उठ रही लपटों को देख कर मुुंह से आह भी नहीं निकल पा रही थी।
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पानी पीकर ही बुझाई भूख
दैवीय आपदा से गांव में एक ओर जहां गम का माहौल दिखाई दिया तो वहीं नौनिहालाें सहित छोटे-छोटे बच्चों को दूध के लिए भी तरसना पड़ा। सूखी संवेदनाएं लेकर गांव पहुंचे लोगों ने पीड़ितों से मिलकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली, लेकिन किसी का भी भूख से बिलबिलाते नौनिहालों की ओर ध्यान नहीं दिया। भूख शांत करने को बच्चे बोतल में भरा पानी पीकर ही भूख मिटाते दिखे।
राख में तलाशे आलू
औरैया। जब व्यक्ति की पेट की आग भड़कती है तो फिर दिमाग भी काम करना बंद कर देता है। इसका नजारा बुधवार को गांव की पड़ताल के दौरान देखने को मिला। भूख से रोते-बिलखते बच्चों को देख पाने में असमर्थ होशियार सिंह की पत्नी सब कुछ बर्बाद होने के बावजूद पागलों की तरह राख में जले आलू तलाशते रही। यही नही अधिकतर लोग राख में ही खाने का सामान भूख मिटाने को तलाशते रहे।
इमदाद मिलने पर खिले बच्चों के चेहरे
औरैया। जिला पंचायत अध्यक्ष राजवीर यादव की ओर से इमदाद लेकर गांव पहुंचे हाफिज अब्दुल सत्तार, बबलू यादव, मनोज यादव आदि को देखते ही पीड़ित परिवारों के बच्चे जमा हो गए। जैसे ही इमदाद बांटी गई तो बच्चों के चेहरों पर खुशी के भाव दिखे। वह दी गई मदद का सामान लेकर अपने घर की ओर रवाना हो गए।
बूढ़ी आंखों से देखा आग का मंजर
औरैया। 75 बसंत देख चुकी सिया दुलारी की बूढ़ी आंखों ने मंगलवार को हुए अग्निकांड का खौफनाक मंजर भी देखा। लाठी के सहारे टिकाए कांपते शरीर के साथ उनकी बूढ़ी आंखें सिर्फ हादसे से जले बेटे के आशियाने को निहारती दिखी। शायद सोच रही होंगी कि उम्र के इस पड़ाव में भगवान ने उन्हें यह कैसे दिन दिखा दिए।