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झोलाछाप अस्पतालों के पास जान से खेलने का लाइसेंस
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औरैया। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक अपंजीकृत अस्पतालों का मकड़जाल फैला है। विभागीय अधिकारी सब जानते हुए भी अनजान बने बैठे हैं। हालात ये हैं कि इन अस्पतालों में झोलाछाप मरीजों की जिंदगी के खिलवाड़ कर रहे हैं।
कई अस्पतालों में न तो डॉक्टर हैं और न ही प्रशिक्षित स्टाफ। करीब 10 अस्पताल ऐसे हैं जो मकानों व छोटी दुकानों में चल रहे हैं। यहां मिले लोग भले ही पंजीयन कराके अस्पताल संचालन का दम भर रहे हो, लेकिन इनके न तो मानक पूरे है और न ही अस्पताल जैसी सुविधाएं। कुल मिलाकर जिले की स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे ही हैं।
औरैया शहर के अलावा एरवाकटरा, बेला, बिधूना और अछल्दा में करीब 20 अस्पताल और क्लीनिक संचालित हैं। छोटे-छोटे मकानों और दुकानों में संचालित इन अस्पतालों में कुछ को लाइसेंस भी मिल गया है।
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जो स्वास्थ्य विभाग के निगरानी तंत्र और लाइसेंस जारी करने के मानकों की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं। हालात ये है कि अधिकतर अस्पतालों में इलाज करने वाला स्टाफ प्रशिक्षित ही नहीं।
जिन अस्पतालों का पंजीकरण है, वहां विशेषज्ञों की लंबी चौड़ी लिस्ट जरूर चस्पा हैं। मगर ड्यूटी पर रहने वाले डाक्टर नदारद रहते हैं। कुछ अस्पतालों में झोलाछाप कमान संभाले हैं तो कुछ में नर्सिंग की ट्रेनिंग कर रहे छात्र।
ज्यादातर अस्पताल मानकों को धता बता रहे हैं। विभाग सब कुछ जानते हुए भी ऐसे अस्पतालों पर मेहरबान है, जिनमें झोलाछाप लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं।
इस तरह हो चुकी मौतें
दिबियापुर के ककराही में बिना पंजीकरण के चल रहे सहयोग हास्पिटल में खुशहालपुर अजीतमल निवासी सोनू राजपूत और उसके नवजात की 11 फरवरी को मौत हो गई। जच्चा बच्चा की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की आंखें खुली तो पोल खुल कर सामने आई। 24 सितंबर को एरवाकटरा थाना क्षेत्र के भटपुरा निवासी तालिब खां की पत्नी मरियम की एक निजी क्लीनिक में मौत हो गई थी। जांच में पता चला कि क्लीनिक विभाग से पंजीकृत नहीं थी। विभाग दोनों मामलों में रिपोर्ट दर्ज कर चुप्पी साध कर बैठ गया।
विभाग के आंकड़ों में पंजीकरण
हॉस्पिटल - 28
पैथालॉजी लैब - 22
क्लीनिक - 15
बिना पंजीयन के संचालित हो रहे अस्पतालों के लिए स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी, मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी की टीम बनाई गई है। जिले स्तर पर भी टीम गठित है, जो निरीक्षण कर अस्पतालों का पंजीकरण व मानकों की पड़ताल कर कार्रवाई कर रही है। - डॉ. अर्चना श्रीवास्तव सीएमओ
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कई अस्पतालों में न तो डॉक्टर हैं और न ही प्रशिक्षित स्टाफ। करीब 10 अस्पताल ऐसे हैं जो मकानों व छोटी दुकानों में चल रहे हैं। यहां मिले लोग भले ही पंजीयन कराके अस्पताल संचालन का दम भर रहे हो, लेकिन इनके न तो मानक पूरे है और न ही अस्पताल जैसी सुविधाएं। कुल मिलाकर जिले की स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे ही हैं।
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औरैया शहर के अलावा एरवाकटरा, बेला, बिधूना और अछल्दा में करीब 20 अस्पताल और क्लीनिक संचालित हैं। छोटे-छोटे मकानों और दुकानों में संचालित इन अस्पतालों में कुछ को लाइसेंस भी मिल गया है।
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जो स्वास्थ्य विभाग के निगरानी तंत्र और लाइसेंस जारी करने के मानकों की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं। हालात ये है कि अधिकतर अस्पतालों में इलाज करने वाला स्टाफ प्रशिक्षित ही नहीं।
जिन अस्पतालों का पंजीकरण है, वहां विशेषज्ञों की लंबी चौड़ी लिस्ट जरूर चस्पा हैं। मगर ड्यूटी पर रहने वाले डाक्टर नदारद रहते हैं। कुछ अस्पतालों में झोलाछाप कमान संभाले हैं तो कुछ में नर्सिंग की ट्रेनिंग कर रहे छात्र।
ज्यादातर अस्पताल मानकों को धता बता रहे हैं। विभाग सब कुछ जानते हुए भी ऐसे अस्पतालों पर मेहरबान है, जिनमें झोलाछाप लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं।
इस तरह हो चुकी मौतें
दिबियापुर के ककराही में बिना पंजीकरण के चल रहे सहयोग हास्पिटल में खुशहालपुर अजीतमल निवासी सोनू राजपूत और उसके नवजात की 11 फरवरी को मौत हो गई। जच्चा बच्चा की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की आंखें खुली तो पोल खुल कर सामने आई। 24 सितंबर को एरवाकटरा थाना क्षेत्र के भटपुरा निवासी तालिब खां की पत्नी मरियम की एक निजी क्लीनिक में मौत हो गई थी। जांच में पता चला कि क्लीनिक विभाग से पंजीकृत नहीं थी। विभाग दोनों मामलों में रिपोर्ट दर्ज कर चुप्पी साध कर बैठ गया।
विभाग के आंकड़ों में पंजीकरण
हॉस्पिटल - 28
पैथालॉजी लैब - 22
क्लीनिक - 15
बिना पंजीयन के संचालित हो रहे अस्पतालों के लिए स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी, मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी की टीम बनाई गई है। जिले स्तर पर भी टीम गठित है, जो निरीक्षण कर अस्पतालों का पंजीकरण व मानकों की पड़ताल कर कार्रवाई कर रही है। - डॉ. अर्चना श्रीवास्तव सीएमओ