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औरैयाः जिले के सातों ब्लॉक में मिट्टी की सेहत बेहद खराब
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बिधूना ब्लॉक के एक गांव में बंजर पड़ी जमीन
- फोटो : AURAIYA
औरैया। जिले के औरैया, अजीतमल, भाग्यनगर, अछल्दा, एरवाकटरा, बिधूना व सहार ब्लॉक के ज्यादातर गांवों में जमीनों की उर्वरक क्षमता खत्म सी होती जा रही है। इन ब्लाकों की मिट्टी की जांच में जमीन में नाइट्रोजन व फास्फेट अपनी न्यूनतम स्तर पर मिला है। यही हाल रहा तो आने वाले 10 से 15 वर्षों में खेतिहर जमीन बंजर हो जाएगी।
जमीन में नाइट्रोजन व फास्फेट अपनी न्यूनतम स्तर पर पहुंचने का यह आंकड़ा नेशनल मिशन फॉर सिकनेवल एग्रीकल्चर (एनएमएसए) की मृदा जांच रिपोर्ट में उजागर हुआ है। कृषि विभाग की 12 टीमों ने बीते साल अक्तूबर, नवंबर व दिसंबर में अभियान चलाकर जिले के सातों ब्लॉक के 3570 किसानों के खेत से मिट्टी का नमूना लिया था। लैब से जांच कराकर किसानों को मृदा कार्ड दिया गया।
इन सातों ब्लॉक के किसानों के खेतों में नाइट्रोजन, फास्फेट की मात्रा न्यूनतम स्तर पर मिली। हालांकि पोटाश की मात्रा सामान्य है। मिट्टी की जांच में जीवांश कार्बन, नाइट्रोजन न्यूनतम स्तर 250 से 500 किलोग्राम (प्रति हेक्टेयर) तक होता है। अति न्यूनतम स्तर 100 से 150 किलोग्राम होता है। इन सात ब्लॉकों में नाइट्रोजन इस स्तर पर पहुंच चुका है। इसके बाद कम हुआ तो मिट्टी फसल उपजाने लायक नहीं रह जाएगी। फास्फेट का स्तर एक हेक्टेयर में 40 किलोग्राम होना चाहिए। यह भी न्यूनतम स्तर 10 पर पहुंच गया है।
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उप कृषि निदेशक औरैया विजय कुमार का कहना है कि जिले के खेतों की मिट्टी की उर्वरक क्षमता लगातार घट रही है। पिछले दो वर्ष में हुई मिट्टी की जांच में चिंताजनक परिणाम सामने आए हैं। मिट्टी में जीवांश, कार्बन, नाइट्रोजन, फास्टफेट और पोटाश तीन प्रमुख पोषक तत्व होते हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि पशुधन की उपेक्षा से किसानों के साथ खेतों की हालत खराब हुई है। गोबर की खाद में मिट्टी को पोषक बनाने वाले तत्व सबसे ज्यादा होते हैं। जिन किसानों को मृदा परीक्षण कार्ड मिले हैं। उनमें दर्ज तत्वों के हिसाब से रासायनिक खाद का इस्तेमाल करें। इसके लिए अपने ब्लॉक में कृषि अधिकारी से जानकारी ले सकते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र परवाहा के कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप कुमार सिंह का कहना है कि मिट्टी में पोषक तत्व के लिए तीन श्रेणी बनाई गई हैं। हरी खाद और गोबर खाद का उपयोग न किया गया तो मिट्टी और बेकार हो जाएगी। किसानों को फसल चक्र में कम से कम एक बार हरी खाद का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके अलावा कम से कम तीन वर्ष में एक बार गोबर की खाद खेत में जरूर डालनी चाहिए।
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जमीन में नाइट्रोजन व फास्फेट अपनी न्यूनतम स्तर पर पहुंचने का यह आंकड़ा नेशनल मिशन फॉर सिकनेवल एग्रीकल्चर (एनएमएसए) की मृदा जांच रिपोर्ट में उजागर हुआ है। कृषि विभाग की 12 टीमों ने बीते साल अक्तूबर, नवंबर व दिसंबर में अभियान चलाकर जिले के सातों ब्लॉक के 3570 किसानों के खेत से मिट्टी का नमूना लिया था। लैब से जांच कराकर किसानों को मृदा कार्ड दिया गया।
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इन सातों ब्लॉक के किसानों के खेतों में नाइट्रोजन, फास्फेट की मात्रा न्यूनतम स्तर पर मिली। हालांकि पोटाश की मात्रा सामान्य है। मिट्टी की जांच में जीवांश कार्बन, नाइट्रोजन न्यूनतम स्तर 250 से 500 किलोग्राम (प्रति हेक्टेयर) तक होता है। अति न्यूनतम स्तर 100 से 150 किलोग्राम होता है। इन सात ब्लॉकों में नाइट्रोजन इस स्तर पर पहुंच चुका है। इसके बाद कम हुआ तो मिट्टी फसल उपजाने लायक नहीं रह जाएगी। फास्फेट का स्तर एक हेक्टेयर में 40 किलोग्राम होना चाहिए। यह भी न्यूनतम स्तर 10 पर पहुंच गया है।
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उप कृषि निदेशक औरैया विजय कुमार का कहना है कि जिले के खेतों की मिट्टी की उर्वरक क्षमता लगातार घट रही है। पिछले दो वर्ष में हुई मिट्टी की जांच में चिंताजनक परिणाम सामने आए हैं। मिट्टी में जीवांश, कार्बन, नाइट्रोजन, फास्टफेट और पोटाश तीन प्रमुख पोषक तत्व होते हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि पशुधन की उपेक्षा से किसानों के साथ खेतों की हालत खराब हुई है। गोबर की खाद में मिट्टी को पोषक बनाने वाले तत्व सबसे ज्यादा होते हैं। जिन किसानों को मृदा परीक्षण कार्ड मिले हैं। उनमें दर्ज तत्वों के हिसाब से रासायनिक खाद का इस्तेमाल करें। इसके लिए अपने ब्लॉक में कृषि अधिकारी से जानकारी ले सकते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र परवाहा के कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप कुमार सिंह का कहना है कि मिट्टी में पोषक तत्व के लिए तीन श्रेणी बनाई गई हैं। हरी खाद और गोबर खाद का उपयोग न किया गया तो मिट्टी और बेकार हो जाएगी। किसानों को फसल चक्र में कम से कम एक बार हरी खाद का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके अलावा कम से कम तीन वर्ष में एक बार गोबर की खाद खेत में जरूर डालनी चाहिए।