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Amroha News: सौ साल पुराना है तिगरी रामलीला का इतिहास
Wed, 01 Oct 2025 02:55 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Wed, 01 Oct 2025 02:55 AM IST
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गजरौला। कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले गंगा मेले के लिए विख्यात तिगरी अपनी वैभवशाली रामलीला के लिए भी अलग पहचान रखता था। यहां करीब सौ साल पूर्व एक खाली पड़े घेर से रामलीला का मंचन शुरू हुआ था जो बदस्तूर जारी है। स्थानीय कलाकार ही इसमें भाग लेते हैं।
करीब सौ साल पूर्व गांव निवासी अतर सिंह त्यागी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रदत्त त्यागी, गेंदा यादव, घासीराम यादव, गिरधारी यादव, गंगासरन उपाध्याय ने रामलीला की टोली बना कर गांव में ही मंचन शुरू किया। उस समय गांव में रामलीला मंचन के लिए कोई स्थान नहीं मिलने के कारण बसंत सिंह त्यागी के घेर की खाली पड़ी भूमि पर मंचन शुरू हुआ था। गांव के दयानंद सिंह त्यागी हनुमान और उनके बाद भतीजे अनुज त्यागी ने करीब दस साल तक बजरंग बली की भूमिका निभाई।
2017 में अनुज त्यागी का निधन हो गया। विजय त्यागी भगवान राम की भूमिका निभाते व महावीर सिंह त्यागी भरत बनते थे। उस समय आसपास के ग्रामीण ही नहीं बल्कि गजरौला, धनौरा, अमरोहा के लोग भी मंचन देखने आते थे। अपने यहां पर रामलीला मंचन करने का अनुरोध करते थे। मगर कोई भी स्थानीय कलाकार अन्यत्र स्थान पर मंचन करने नहीं गया। वह कहते थे कि पैसे के लिए मंचन नहीं करते हैं।
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रमेश चंद्र त्यागी ने रावण की भूमिका को जीवंत निभाया
गांव निवासी 91 वर्षीय रमेश चंद्र त्यागी कहते हैं कि उस दौरान रामलीला में अपनी भूमिका निभाना भगवान का आशीर्वाद मानते थे। उनका लंबा तगड़ा शरीर और चौड़ा मस्तक होने के कारण उनको जबरन रावण बनाया जाता था। वह मानते थे कि कम से कम इसी बहाने भगवान से सामना तो हो रहा है।
सुभाष गुप्ता को पसंद रहा मेघनाद बनना
76 वर्षीय सुभाष गुप्ता का कहना है कि रामलीला में करीब छह दशक तक उन्होंने मेघनाद की भूमिका निभाई। इसके अलावा वह समय-समय पर सीता, लक्ष्मण, भरत का भी रोल करते थे। आज भी लोग उनको मेघनाद कहकर बुलाते हैं। वह कहते हैं कि उनको बड़ा गर्व है कि अपनी संस्कृति व सभ्यता के लिए कई साल तक रामलीला में काम किया।
70 साल रामलीला में मंचन करने का एक पैसा नहीं लिया
तिगरी निवासी 85 वर्षीय ओम प्रकाश यादव उर्फ दयालु कहते हैं कि प्रभु की कृपा से उन्होंने करीब 70 साल तक लगातार रामलीला में मंचन किया। कभी भगवान परशुराम का तो कभी राजा दशरथ की भूमिका निभाई। सात दशक तक रामलीला का मंचन किया, लेकिन कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया। धन की भूख नहीं थी, इसलिए मंचन करने बाहर भी नहीं गए जबकि बड़े शहरों से बुलावा आता था।
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करीब सौ साल पूर्व गांव निवासी अतर सिंह त्यागी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रदत्त त्यागी, गेंदा यादव, घासीराम यादव, गिरधारी यादव, गंगासरन उपाध्याय ने रामलीला की टोली बना कर गांव में ही मंचन शुरू किया। उस समय गांव में रामलीला मंचन के लिए कोई स्थान नहीं मिलने के कारण बसंत सिंह त्यागी के घेर की खाली पड़ी भूमि पर मंचन शुरू हुआ था। गांव के दयानंद सिंह त्यागी हनुमान और उनके बाद भतीजे अनुज त्यागी ने करीब दस साल तक बजरंग बली की भूमिका निभाई।
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2017 में अनुज त्यागी का निधन हो गया। विजय त्यागी भगवान राम की भूमिका निभाते व महावीर सिंह त्यागी भरत बनते थे। उस समय आसपास के ग्रामीण ही नहीं बल्कि गजरौला, धनौरा, अमरोहा के लोग भी मंचन देखने आते थे। अपने यहां पर रामलीला मंचन करने का अनुरोध करते थे। मगर कोई भी स्थानीय कलाकार अन्यत्र स्थान पर मंचन करने नहीं गया। वह कहते थे कि पैसे के लिए मंचन नहीं करते हैं।
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रमेश चंद्र त्यागी ने रावण की भूमिका को जीवंत निभाया
गांव निवासी 91 वर्षीय रमेश चंद्र त्यागी कहते हैं कि उस दौरान रामलीला में अपनी भूमिका निभाना भगवान का आशीर्वाद मानते थे। उनका लंबा तगड़ा शरीर और चौड़ा मस्तक होने के कारण उनको जबरन रावण बनाया जाता था। वह मानते थे कि कम से कम इसी बहाने भगवान से सामना तो हो रहा है।
सुभाष गुप्ता को पसंद रहा मेघनाद बनना
76 वर्षीय सुभाष गुप्ता का कहना है कि रामलीला में करीब छह दशक तक उन्होंने मेघनाद की भूमिका निभाई। इसके अलावा वह समय-समय पर सीता, लक्ष्मण, भरत का भी रोल करते थे। आज भी लोग उनको मेघनाद कहकर बुलाते हैं। वह कहते हैं कि उनको बड़ा गर्व है कि अपनी संस्कृति व सभ्यता के लिए कई साल तक रामलीला में काम किया।
70 साल रामलीला में मंचन करने का एक पैसा नहीं लिया
तिगरी निवासी 85 वर्षीय ओम प्रकाश यादव उर्फ दयालु कहते हैं कि प्रभु की कृपा से उन्होंने करीब 70 साल तक लगातार रामलीला में मंचन किया। कभी भगवान परशुराम का तो कभी राजा दशरथ की भूमिका निभाई। सात दशक तक रामलीला का मंचन किया, लेकिन कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया। धन की भूख नहीं थी, इसलिए मंचन करने बाहर भी नहीं गए जबकि बड़े शहरों से बुलावा आता था।