सांप्रदायिक सौहार्द: मुस्लिम करा रहे रामलीला, 1975 में सैय्यद अख्तर ने की थी शुरुआत, आज शिबाल हैं अध्यक्ष
नौगांवा सादात। समाजसेवी सैय्यद अहसान अख्तर के नेतृत्व में शुरू हुआ रामलीला का आयोजन हर साल परंपरागत ढंग से जारी है। कमेटी के मौजूदा अध्यक्ष शिबाल हैदर ने बताया कि अहसान अख्तर ने करीब 30 साल तक रामलीला के आयोजन की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया था।
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नौगांवा सादात में 47 वर्षों से रामलीला का आयोजन मुस्लिम करा रहे हैं। इसकी शुरुआत 1975 में सैय्यद अहसान अख्तर ने रामलीला कमेटी गठित करके की थी। जो निरंतर जारी है। अब रामलीला कमेटी के अध्यक्ष शिबाल हैदर हैं।
जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर स्थित नौगांवा सादात बीड़ी उद्योग और जैकेट कारोबार के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। इसके साथ ही सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल यहां की रामलीला भी इस कस्बे को मशहूर बनाए हुए है। दरअसल कस्बे में हर साल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की लीला का मंचन होता है। जिसका सारा दारोमदार रामलीला कमेटी के कंधों पर है। इस रामलीला की कमान मुस्लिमों के हाथों में है। 47 साल पहले 1975 में इसकी शुरूआत रामलीला कमेटी बनाकर की गई थी। रामलीला के मंचन से लेकर रावण के पुतला दहन की सारी जिम्मेदारी मुस्लिम ही पूरी शिद्दत से अदा करते आ रहे हैं। करीब 12 दिन तक आयोजित होने वाली रामलीला के लिए हिंदू और मुसलिम दोनों से चंदा एकत्र किया जाता है।
अहसान अख्तर ने 30 साल तक निभाई आयोजन की जिम्मेदारी
नौगांवा सादात। समाजसेवी सैय्यद अहसान अख्तर के नेतृत्व में शुरू हुआ रामलीला का आयोजन हर साल परंपरागत ढंग से जारी है। कमेटी के मौजूदा अध्यक्ष शिबाल हैदर ने बताया कि अहसान अख्तर ने करीब 30 साल तक रामलीला के आयोजन की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया था। उनके बाद गुलाम अब्बास किट्टी ने समिति अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। फिलहाल वह अध्यक्ष की जिम्मेदारी के साथ आपसी सौहार्द की रामलीला का आयोजन करा रहे हैं।
पूजन में तिलक लगाकर मौजूद रहते हैं मुस्लिम
नौगांवा सादात। रामलीला के आयोजन की शुरुआत में होने वाले पूजन में मुस्लिम समाज के लोग शामिल रहते हैं। मंत्रोच्चार की गूंज के बीच रोली-चावल का तिलक लगाए मुस्लिम भाइयों की मौजूदगी अपने आप में मिसाल है। अध्यक्ष शिबाल ने कहा कि ये यहां की गंगा-जमुनी तहजीब है, जो हमारे खून में बसी है।
केवल 20 फीसदी है हिन्दू आबादी
अमरोहा। आंकड़ों की बात करें तो नौगांवा सादात कस्बे में आबादी का 80 फीसदी हिस्सा मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखता है। जबकि यहां केवल 20 फीसदी ही हिन्दू समाज के लोग रहते हैं। यहां हिंदू-मुस्लिम आपसी सौहार्द कायम है।