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रैबीज मरीज के इलाज में लापरवाही बरती तो दस साल बाद भी आ सकते हैं लक्षण
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अमरोहा। अगर किसी व्यक्ति को कुत्ते, बंदर, सियार, लोमड़ी आदि के काट लें और वह रैबीज से पीड़ित हो तो वह व्यक्ति की जान पर भारी पड़ सकता है। रैबीज से पीड़ित मरीज ने इलाज में लापरवाही बरती तो उसकी मौत निश्चित है, उसको बचाने के लिए कोई इलाज नहीं है। क्योंकि रैबीज फैलने से मौत संभव है। अगर वेक्सिनेशन नहीं करवाया तो उसके लक्षण दस साल बाद भी आ सकते हैं
सरकार एंटी रैबीज टीकाकरण पर सालाना लाखों रुपये खर्च करती है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में रैबीज फैलने से किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। जबकि कुत्ते और बंदरों के काटने से बड़ी संख्या में घायल व्यक्ति सरकारी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। हर रोज जिले भर के अस्पतालों में 20 से 25 मरीज अवश्य आ रहे हैं। जिले के अस्पतालों, सीएचसी और पीएचसी पर एआरवी टीके लगाने की सुविधा दी गई है। अगर सीएचसी पर एंटी रैबीज इंजेक्शन खत्म होता है तो जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या तीन गुना बढ़ जाती है। लेकिन, ये निश्चित नहीं है कि यह लोग कुत्ते या बंदर के काटने के बाद रैबीज से ही पीड़ित हो। सीएमएस डॉ अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि रैबीज ऐसी भयानक बीमारी है, जो 100 फीसद जानलेवा है। आमतौर पर मानव के शरीर में रैबीज के विषाणु रैबीज से संक्रमित किसी पशु के काटने से पहुंच जाते हैं। एक बार इन विषाणु के मनुष्य या किसी पशु की नसों में घुस जाने के बाद मृत्यु निश्चित है। लेकिन सामान्य उपायों के द्वारा इस बीमारी को शुरू होने से पहले ही रोक सकते हैं। कुत्ते के काटने के चलते 85 फीसदी मरीज रैबीज से पीड़ित होते हैं। 15 फीसदी मामलों में बिल्ली, बंदर, लोमड़ी, सियार, लंगूर आदि इस बीमारी की वजह हैं।
जानवर में रैबीज के लक्षण
- मुंह से लार टपकती रहती है।
- बेचैन रहता है।
- आंखें लाल रहती हैं।
- लोगों को काटने दौड़ता है।
- सांस लेने में दिक्कत होती है।
- दस दिन के भीतर उसकी मौत हो सकती है।
इंसान में रैबीज के लक्षण
- बेचैनी
- खाना-पानी निगलने में दिक्कत होना।
- सांस लेनें में तकलीफ
क्या करें
- अगर रैबीज से संक्रमित किसी बंदर या कुत्ते आदि ने काट लिया तो तुरंत इलाज करवाएं।
- काटे हुए स्थान को कम से कम 10 से 15 मिनट तक साबुन या डेटौल से साफ करें।
- जितना जल्दी हो सके वैक्सीन या एआरवी के टीके लगवाएं।
- पालतू कुत्तों को इंजेक्शन (टीका) लगवाएं।
क्या न करें
- कुत्ते या बंदर आदि के काटने पर इलाज में लापरवाही न बरतें।
- काटे हुए जख्म पर मिर्च न बांधे।
- घाव अधिक है तो उस पर टांके न लगवाएं।
- रैबीज के संक्रमण से बचने के लिए कुत्ते और बंदरों आदि से दूर रहें।
एक नजर टीकाकरण पर
- जिला अस्पताल में हर रोज 25-30 और माह में औसतन 1000 से 15000 लोग एंटीरेबीज टीके लगवाते हैं।
- सरकारी संस्थाओं में एंटी रैबीज का टीका मुफ्त लगाया जाता है। प्राइवेट में इसकी कीमत 400 रुपये के आसपास है।
इंट्राडर्मल एंटीरेबीज इंजेक्शन की सलाह -
अमरोहा। स्वास्थ्य मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अस्पतालों को इंट्राडर्मल एंटीरेबीज टीके की सलाह दी है। जानकारों के मुताबिक अमूमन रोगियों की मांसपेशियों में इंजेक्शन दिया जाता है। इससे एक मल्टीडोज वैक्सीन करीब तीन मरीजों के लिए इस्तेमाल हो पाती है। इंट्राडर्मल विधि में वैक्सीन मांसपेशियों में न लगाकर ऊपर की खाल में लगाई जाती है।
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72 घटे बाद नहीं होता असर
अमरोहा। किसी भी व्यक्ति को रेबीज से संक्रमित कुत्ते, बंदर, लोमड़ी, सियार, लंगूर आदि किसी जानवर ने काट लिया और 72 घंटे तक उसका इलाज नहीं करवाया, तो वेक्सिन और एआरवी के टीके लगावने का कोई फायदा नहीं है। इस लिए जितना जल्दी हो सके वेक्सिन और एआरवी के टीके अवश्य लगावाएं। हालांकि इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार की तरफ से जागरूकता अभियान चलाकर लोगों इलाज के प्रति जागरुक किया जाता रहा है।
दस साल बाद भी दिखने लगते हैं लक्षण
अमरोहा। प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर सुखदेव सिंह ने बताया कि रेबीज के संक्रमण से पीड़ित कुत्ते और बंदर के काटने के बाद अगर वेक्सिनेशन नहीं करवाया तो उसके लक्षण दस साल बाद भी आ सकते हैं। जब किसी भी व्यक्ति में ये लक्षण आएंगे तो उसे पानी से डर लगने लगाता है। रेबीज के संक्रमण के बाद उसका इलाज संभव नहीं है। जिस व्यक्ति में यह संक्रमण बढ़ता है तो उसकी मौत निश्चित है। इससे बचने के लिए कुत्ते या बंदर के काटने के बाद समय पर इलाज कराना आवश्यक है। समय पर इलाज मिलने से इसका संक्रमण नहीं होता है।
रेबीज एक ऐसा वायरस है जो आमतौर पर जानवरों के काटने से फैलता है। यह एक जानलेवा रोग है, क्योंकि इसके लक्षण दिखने में काफी समय लग जाता है। इस कारण यह बीमारी ज्यादा खतरनाक होती है। अगर समय रहते लोगों इसके प्रति सचेत हो जाएं, तो काफी हद तक बचा जा सकता है।
- डॉ सौभाग्य प्रकाश, सीएमओ अमरोहा
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सरकार एंटी रैबीज टीकाकरण पर सालाना लाखों रुपये खर्च करती है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में रैबीज फैलने से किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। जबकि कुत्ते और बंदरों के काटने से बड़ी संख्या में घायल व्यक्ति सरकारी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। हर रोज जिले भर के अस्पतालों में 20 से 25 मरीज अवश्य आ रहे हैं। जिले के अस्पतालों, सीएचसी और पीएचसी पर एआरवी टीके लगाने की सुविधा दी गई है। अगर सीएचसी पर एंटी रैबीज इंजेक्शन खत्म होता है तो जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या तीन गुना बढ़ जाती है। लेकिन, ये निश्चित नहीं है कि यह लोग कुत्ते या बंदर के काटने के बाद रैबीज से ही पीड़ित हो। सीएमएस डॉ अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि रैबीज ऐसी भयानक बीमारी है, जो 100 फीसद जानलेवा है। आमतौर पर मानव के शरीर में रैबीज के विषाणु रैबीज से संक्रमित किसी पशु के काटने से पहुंच जाते हैं। एक बार इन विषाणु के मनुष्य या किसी पशु की नसों में घुस जाने के बाद मृत्यु निश्चित है। लेकिन सामान्य उपायों के द्वारा इस बीमारी को शुरू होने से पहले ही रोक सकते हैं। कुत्ते के काटने के चलते 85 फीसदी मरीज रैबीज से पीड़ित होते हैं। 15 फीसदी मामलों में बिल्ली, बंदर, लोमड़ी, सियार, लंगूर आदि इस बीमारी की वजह हैं।
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जानवर में रैबीज के लक्षण
- मुंह से लार टपकती रहती है।
- बेचैन रहता है।
- आंखें लाल रहती हैं।
- लोगों को काटने दौड़ता है।
- सांस लेने में दिक्कत होती है।
- दस दिन के भीतर उसकी मौत हो सकती है।
इंसान में रैबीज के लक्षण
- बेचैनी
- खाना-पानी निगलने में दिक्कत होना।
- सांस लेनें में तकलीफ
क्या करें
- अगर रैबीज से संक्रमित किसी बंदर या कुत्ते आदि ने काट लिया तो तुरंत इलाज करवाएं।
- काटे हुए स्थान को कम से कम 10 से 15 मिनट तक साबुन या डेटौल से साफ करें।
- जितना जल्दी हो सके वैक्सीन या एआरवी के टीके लगवाएं।
- पालतू कुत्तों को इंजेक्शन (टीका) लगवाएं।
क्या न करें
- कुत्ते या बंदर आदि के काटने पर इलाज में लापरवाही न बरतें।
- काटे हुए जख्म पर मिर्च न बांधे।
- घाव अधिक है तो उस पर टांके न लगवाएं।
- रैबीज के संक्रमण से बचने के लिए कुत्ते और बंदरों आदि से दूर रहें।
एक नजर टीकाकरण पर
- जिला अस्पताल में हर रोज 25-30 और माह में औसतन 1000 से 15000 लोग एंटीरेबीज टीके लगवाते हैं।
- सरकारी संस्थाओं में एंटी रैबीज का टीका मुफ्त लगाया जाता है। प्राइवेट में इसकी कीमत 400 रुपये के आसपास है।
इंट्राडर्मल एंटीरेबीज इंजेक्शन की सलाह -
अमरोहा। स्वास्थ्य मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अस्पतालों को इंट्राडर्मल एंटीरेबीज टीके की सलाह दी है। जानकारों के मुताबिक अमूमन रोगियों की मांसपेशियों में इंजेक्शन दिया जाता है। इससे एक मल्टीडोज वैक्सीन करीब तीन मरीजों के लिए इस्तेमाल हो पाती है। इंट्राडर्मल विधि में वैक्सीन मांसपेशियों में न लगाकर ऊपर की खाल में लगाई जाती है।
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72 घटे बाद नहीं होता असर
अमरोहा। किसी भी व्यक्ति को रेबीज से संक्रमित कुत्ते, बंदर, लोमड़ी, सियार, लंगूर आदि किसी जानवर ने काट लिया और 72 घंटे तक उसका इलाज नहीं करवाया, तो वेक्सिन और एआरवी के टीके लगावने का कोई फायदा नहीं है। इस लिए जितना जल्दी हो सके वेक्सिन और एआरवी के टीके अवश्य लगावाएं। हालांकि इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार की तरफ से जागरूकता अभियान चलाकर लोगों इलाज के प्रति जागरुक किया जाता रहा है।
दस साल बाद भी दिखने लगते हैं लक्षण
अमरोहा। प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर सुखदेव सिंह ने बताया कि रेबीज के संक्रमण से पीड़ित कुत्ते और बंदर के काटने के बाद अगर वेक्सिनेशन नहीं करवाया तो उसके लक्षण दस साल बाद भी आ सकते हैं। जब किसी भी व्यक्ति में ये लक्षण आएंगे तो उसे पानी से डर लगने लगाता है। रेबीज के संक्रमण के बाद उसका इलाज संभव नहीं है। जिस व्यक्ति में यह संक्रमण बढ़ता है तो उसकी मौत निश्चित है। इससे बचने के लिए कुत्ते या बंदर के काटने के बाद समय पर इलाज कराना आवश्यक है। समय पर इलाज मिलने से इसका संक्रमण नहीं होता है।
रेबीज एक ऐसा वायरस है जो आमतौर पर जानवरों के काटने से फैलता है। यह एक जानलेवा रोग है, क्योंकि इसके लक्षण दिखने में काफी समय लग जाता है। इस कारण यह बीमारी ज्यादा खतरनाक होती है। अगर समय रहते लोगों इसके प्रति सचेत हो जाएं, तो काफी हद तक बचा जा सकता है।
- डॉ सौभाग्य प्रकाश, सीएमओ अमरोहा