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शहर की जामा मस्जिद से उठी थी देश की मुकम्मल आजादी की मांग
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independence day
अमरोहा। देश की मुकम्मल आजादी की मांग शहर की जामा मस्जिद से बुलंद हुई थी। जमीअत उलमा-ए-हिंद का 1930 का नौवां सम्मेलन देश को आजाद कराने में मील का पत्थर साबित हुआ। इस तीन दिवसीय सम्मेलन में लगभग 500 उलमा शामिल हुए थे। उन्होंने मुल्क को पूर्ण स्वराज दिलाने का संकल्प लिया। आजादी के दीवाने उलमा देश के विभिन्न हिस्सों में लौट गए। उन्होंने अंग्रेजों से देश को आजाद कराने का कई चक्रों में युद्ध छेड़ दिया। हालात यह रहे कि अंग्रेजों ने घुटने टेक दिए और 17 साल में देश आजाद हो गया।
शहर की जामा मस्जिद-मदरसा इस्लामिया अरबिया की बुलंद इमारत मुल्क की आजादी के अनछुए इतिहास को समेटे है। वर्ष 1930 में शाबान के महीना में दस्तारबंदी हुई। कार्यक्रम में शामिल होने आए उलमा ने देश को मुकम्मल आजादी दिलाने के लिए सम्मेलन कराने की इच्छा जताई। मोहतमिम मोअज्जम हसनैन ने फौरन यहां पर नौवां सम्मेलन की मेजबानी कुबूल कर लीं। दरअसल 1857 की क्रांति केे बाद देश को अंग्रेजों से छुटकारा दिलाने के लिए हर कोई तड़प रहा था। देश के हर कोने में अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। बावजूद अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो नीति के चलते कामयाबी नहीं मिल रही थी, लेकिन 1930 में जमीअत उलमा-ए-हिंद के सम्मेलन ने आजादी की लड़ाई को और व्यापक कर दिया। इसके बाद तीन मई 1930 से जमीअत उलमा-ए-हिंद का नौंवा सम्मेलन शुरू हुआ।
शहर के लोगों ने किया मेहमान नवाजी
अमरोहा। जंग-ए-आजादी की लड़ाई में शहर के लोगों ने भी हिस्सा लिया। सम्मेलन में आने वाले मेहमानों का इस्तकबाल किया गया। 500 से अधिक उलमा को खाना खिलाने के लिए कई लोग घरों से खाना भिजवाते थे। तीन दिन तक लगातार लोगों ने खुशदिली से मेहमाननवाजी की।
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48 पन्नों का उर्दू में लिखा है दस्तावेज
अमरोहा। जमीअत उलमा-ए-हिंद के खुतबा ए सदर इस्तकबालिया शीर्षक से लिए गए दस्तावेज 48 पेज का है, जो संगठन की अहमियत, सियासत और मजहब, आर्थिक उन्नति, हमारी कमजोरियां, हिंदू मुस्लिम मुुफाहिमत, कांग्रेस और मुसलमान, मुकम्मल आजादी आदि हिस्सा हैं।
मेहराब और मीनार पर ठहर जाती हैं निगाहें
अमरोहा। इस्लामिक स्थापत्य कला की जामा मस्जिद की बिल्डिंग अद्भुत नमूना है। इसके मेहराब, गुंबद और मोटी दीवारें लोगों की निगाह को खींच लेती थी। ऊंची मीनारें आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। इसके अलावा मस्जिद में कई जगहों पर नक्काशी की गई है।
यह उलमा हुए थे शामिल
अमरोहा। सम्मेलन में मुफ्ती किफायतुल्लाह, मौलाना अहमद सईद, सैयद अताउल्लाह बुखारी, मौलाना मोइनुद्दीन अजमेरी मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना अहमद हुसैन मदनी, मौलाना हबीबुर्रहमान लुधियानवी, मौलाना हिफ्जुर्रहमान, मौलाना महमुदूल हसन देवबंदी, मौलाना कासिम शाह नानौतवी, मुफ्ती नसीम अहमद फरीदी, मौलाना मियां रिजवी, हाफिज अब्दुर रहमान, मौलाना एजाज हुसैन आदि प्रमुख रूप से रहे।
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शहर की जामा मस्जिद-मदरसा इस्लामिया अरबिया की बुलंद इमारत मुल्क की आजादी के अनछुए इतिहास को समेटे है। वर्ष 1930 में शाबान के महीना में दस्तारबंदी हुई। कार्यक्रम में शामिल होने आए उलमा ने देश को मुकम्मल आजादी दिलाने के लिए सम्मेलन कराने की इच्छा जताई। मोहतमिम मोअज्जम हसनैन ने फौरन यहां पर नौवां सम्मेलन की मेजबानी कुबूल कर लीं। दरअसल 1857 की क्रांति केे बाद देश को अंग्रेजों से छुटकारा दिलाने के लिए हर कोई तड़प रहा था। देश के हर कोने में अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। बावजूद अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो नीति के चलते कामयाबी नहीं मिल रही थी, लेकिन 1930 में जमीअत उलमा-ए-हिंद के सम्मेलन ने आजादी की लड़ाई को और व्यापक कर दिया। इसके बाद तीन मई 1930 से जमीअत उलमा-ए-हिंद का नौंवा सम्मेलन शुरू हुआ।
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शहर के लोगों ने किया मेहमान नवाजी
अमरोहा। जंग-ए-आजादी की लड़ाई में शहर के लोगों ने भी हिस्सा लिया। सम्मेलन में आने वाले मेहमानों का इस्तकबाल किया गया। 500 से अधिक उलमा को खाना खिलाने के लिए कई लोग घरों से खाना भिजवाते थे। तीन दिन तक लगातार लोगों ने खुशदिली से मेहमाननवाजी की।
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48 पन्नों का उर्दू में लिखा है दस्तावेज
अमरोहा। जमीअत उलमा-ए-हिंद के खुतबा ए सदर इस्तकबालिया शीर्षक से लिए गए दस्तावेज 48 पेज का है, जो संगठन की अहमियत, सियासत और मजहब, आर्थिक उन्नति, हमारी कमजोरियां, हिंदू मुस्लिम मुुफाहिमत, कांग्रेस और मुसलमान, मुकम्मल आजादी आदि हिस्सा हैं।
मेहराब और मीनार पर ठहर जाती हैं निगाहें
अमरोहा। इस्लामिक स्थापत्य कला की जामा मस्जिद की बिल्डिंग अद्भुत नमूना है। इसके मेहराब, गुंबद और मोटी दीवारें लोगों की निगाह को खींच लेती थी। ऊंची मीनारें आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। इसके अलावा मस्जिद में कई जगहों पर नक्काशी की गई है।
यह उलमा हुए थे शामिल
अमरोहा। सम्मेलन में मुफ्ती किफायतुल्लाह, मौलाना अहमद सईद, सैयद अताउल्लाह बुखारी, मौलाना मोइनुद्दीन अजमेरी मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना अहमद हुसैन मदनी, मौलाना हबीबुर्रहमान लुधियानवी, मौलाना हिफ्जुर्रहमान, मौलाना महमुदूल हसन देवबंदी, मौलाना कासिम शाह नानौतवी, मुफ्ती नसीम अहमद फरीदी, मौलाना मियां रिजवी, हाफिज अब्दुर रहमान, मौलाना एजाज हुसैन आदि प्रमुख रूप से रहे।