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Amroha News: जन्म-मृत्यु पंजीकरण में देरी अब पड़ेगी महंगी, विलंब शुल्क दस गुना तक बढ़ा
Sun, 07 Jun 2026 01:45 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Sun, 07 Jun 2026 01:45 AM IST
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अमरोहा। जन्म और मृत्यु पंजीकरण को समयबद्ध एवं प्रभावी बनाने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार ने जन्म-मृत्यु पंजीकरण अधिनियम-1969 की नियमावली में महत्वपूर्ण संशोधन किया है। नई व्यवस्था के तहत अब निर्धारित समय सीमा के बाद जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कराने वालों को पहले की तुलना में कई गुना अधिक विलंब शुल्क देना होगा। इससे लोग समय रहते पंजीकरण कराएंगे और सरकारी अभिलेख अधिक सटीक एवं अद्यतन रहेंगे।
अब तक जन्म या मृत्यु के 21 दिन बाद पंजीकरण कराने पर मात्र दो रुपये विलंब शुल्क देना पड़ता था, लेकिन संशोधित नियमों के तहत यह शुल्क बढ़ाकर 20 रुपये कर दिया गया है। इसी प्रकार 30 दिन से एक वर्ष के भीतर पंजीकरण कराने पर पहले पांच रुपये शुल्क लिया जाता था, जिसे बढ़ाकर 50 रुपये कर दिया गया है। वहीं एक वर्ष से अधिक समय बाद पंजीकरण कराने पर अब दस रुपये की जगह 100 रुपये विलंब शुल्क देना होगा।
इनकी है जन्म-मृत्यु पंजीकरण की जिम्मेदारी
जन्म और मृत्यु पंजीकरण की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग, पंचायती राज विभाग, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से पंजीकरण कराया जाता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में नगर पालिका एवं नगर पंचायतें यह कार्य करती हैं। संबंधित विभागों का दायित्व है कि क्षेत्र में होने वाले प्रत्येक जन्म और मृत्यु का समय पर रिकॉर्ड तैयार किया जाए तथा नागरिकों को प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया जाए। जन्म और मृत्यु का पंजीकरण केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के कानूनी और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जन्म प्रमाणपत्र शिक्षा, पासपोर्ट, आधार कार्ड, सरकारी योजनाओं और रोजगार से संबंधित कई कार्यों में आवश्यक होता है। वहीं मृत्यु प्रमाण पत्र संपत्ति हस्तांतरण, बीमा दावों, बैंक खातों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य माना जाता है।
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समय पर पंजीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश
सरकार ने यह संशोधन लोगों को समय पर पंजीकरण के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किया है। नए नियमों के अनुसार जन्म या मृत्यु होने के 21 दिन के भीतर पंजीकरण कराने पर कोई शुल्क नहीं देना होगा। इसके बाद निर्धारित विलंब शुल्क लागू होगा। अधिकांश लोग लापरवाही या जागरूकता की कमी के कारण समय पर आवेदन नहीं करते। परिणामस्वरूप कई मामलों में वर्षों बाद प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन किए जाते हैं, जिससे रिकॉर्ड सत्यापन और दस्तावेजी प्रक्रिया जटिल हो जाती है। नई व्यवस्था से इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगने की उम्मीद है।
बेहद कम लोग समय पर करा रहे पंजीकरण
अमरोहा नगर पालिका के आंकड़े बताते हैं कि बच्चे के जन्म के 21 दिन के भीतर जन्म प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने वालों का प्रतिशत केवल 13 के आसपास है। करीब 30 प्रतिशत लोग ही बच्चे के जन्म के एक वर्ष के भीतर प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन करते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 50 प्रतिशत से अधिक लोग एक वर्ष या उससे भी अधिक समय बीत जाने के बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पहुंचते हैं। अधिकारियों के अनुसार देरी से आवेदन करने के कारण कई बार अभिलेखों की जांच में अतिरिक्त समय लगता है और नागरिकों को भी परेशानी उठानी पड़ती है। ऐसे मामलों में दस्तावेजों का सत्यापन और रिकॉर्ड मिलान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
50-60 साल बाद भी बनवाने पहुंचे जन्म प्रमाणपत्र
जन्म प्रमाणपत्र के महत्व को लेकर लोगों में लंबे समय तक जागरूकता का अभाव रहा है। इसका उदाहरण राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया के दौरान देखने को मिला था। उस समय बड़ी संख्या में ऐसे लोग नगर पालिका और अन्य कार्यालयों में पहुंचे, जो अपने जन्म के 50 से 60 वर्ष बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाना चाहते थे। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में पुराने रिकॉर्ड तलाशना और उनका सत्यापन करना बेहद कठिन कार्य होता है। कई बार रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण लोगों को लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
लोगों की जिम्मेदारी भी होगी तय
ईओ दिनेश कुमार ने बताया कि सरकार की नई व्यवस्था से लोगों पर कुछ अतिरिक्त शुल्क का बोझ अवश्य बढ़ेगा, लेकिन इससे जन्म और मृत्यु पंजीकरण को लेकर नागरिकों की जिम्मेदारी भी तय होगी। उन्होंने कहा कि समय पर पंजीकरण कराने से नागरिकों को भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा और आवश्यक प्रमाणपत्र आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि बच्चे के जन्म अथवा किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद 21 दिन के भीतर संबंधित विभाग में पंजीकरण अवश्य कराएं, जिससे अतिरिक्त शुल्क से बचा जा सके और सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर प्राप्त हो सकें।
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अब तक जन्म या मृत्यु के 21 दिन बाद पंजीकरण कराने पर मात्र दो रुपये विलंब शुल्क देना पड़ता था, लेकिन संशोधित नियमों के तहत यह शुल्क बढ़ाकर 20 रुपये कर दिया गया है। इसी प्रकार 30 दिन से एक वर्ष के भीतर पंजीकरण कराने पर पहले पांच रुपये शुल्क लिया जाता था, जिसे बढ़ाकर 50 रुपये कर दिया गया है। वहीं एक वर्ष से अधिक समय बाद पंजीकरण कराने पर अब दस रुपये की जगह 100 रुपये विलंब शुल्क देना होगा।
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इनकी है जन्म-मृत्यु पंजीकरण की जिम्मेदारी
जन्म और मृत्यु पंजीकरण की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग, पंचायती राज विभाग, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से पंजीकरण कराया जाता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में नगर पालिका एवं नगर पंचायतें यह कार्य करती हैं। संबंधित विभागों का दायित्व है कि क्षेत्र में होने वाले प्रत्येक जन्म और मृत्यु का समय पर रिकॉर्ड तैयार किया जाए तथा नागरिकों को प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया जाए। जन्म और मृत्यु का पंजीकरण केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के कानूनी और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जन्म प्रमाणपत्र शिक्षा, पासपोर्ट, आधार कार्ड, सरकारी योजनाओं और रोजगार से संबंधित कई कार्यों में आवश्यक होता है। वहीं मृत्यु प्रमाण पत्र संपत्ति हस्तांतरण, बीमा दावों, बैंक खातों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य माना जाता है।
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समय पर पंजीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश
सरकार ने यह संशोधन लोगों को समय पर पंजीकरण के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किया है। नए नियमों के अनुसार जन्म या मृत्यु होने के 21 दिन के भीतर पंजीकरण कराने पर कोई शुल्क नहीं देना होगा। इसके बाद निर्धारित विलंब शुल्क लागू होगा। अधिकांश लोग लापरवाही या जागरूकता की कमी के कारण समय पर आवेदन नहीं करते। परिणामस्वरूप कई मामलों में वर्षों बाद प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन किए जाते हैं, जिससे रिकॉर्ड सत्यापन और दस्तावेजी प्रक्रिया जटिल हो जाती है। नई व्यवस्था से इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगने की उम्मीद है।
बेहद कम लोग समय पर करा रहे पंजीकरण
अमरोहा नगर पालिका के आंकड़े बताते हैं कि बच्चे के जन्म के 21 दिन के भीतर जन्म प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने वालों का प्रतिशत केवल 13 के आसपास है। करीब 30 प्रतिशत लोग ही बच्चे के जन्म के एक वर्ष के भीतर प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन करते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 50 प्रतिशत से अधिक लोग एक वर्ष या उससे भी अधिक समय बीत जाने के बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पहुंचते हैं। अधिकारियों के अनुसार देरी से आवेदन करने के कारण कई बार अभिलेखों की जांच में अतिरिक्त समय लगता है और नागरिकों को भी परेशानी उठानी पड़ती है। ऐसे मामलों में दस्तावेजों का सत्यापन और रिकॉर्ड मिलान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
50-60 साल बाद भी बनवाने पहुंचे जन्म प्रमाणपत्र
जन्म प्रमाणपत्र के महत्व को लेकर लोगों में लंबे समय तक जागरूकता का अभाव रहा है। इसका उदाहरण राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया के दौरान देखने को मिला था। उस समय बड़ी संख्या में ऐसे लोग नगर पालिका और अन्य कार्यालयों में पहुंचे, जो अपने जन्म के 50 से 60 वर्ष बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाना चाहते थे। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में पुराने रिकॉर्ड तलाशना और उनका सत्यापन करना बेहद कठिन कार्य होता है। कई बार रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण लोगों को लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
लोगों की जिम्मेदारी भी होगी तय
ईओ दिनेश कुमार ने बताया कि सरकार की नई व्यवस्था से लोगों पर कुछ अतिरिक्त शुल्क का बोझ अवश्य बढ़ेगा, लेकिन इससे जन्म और मृत्यु पंजीकरण को लेकर नागरिकों की जिम्मेदारी भी तय होगी। उन्होंने कहा कि समय पर पंजीकरण कराने से नागरिकों को भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा और आवश्यक प्रमाणपत्र आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि बच्चे के जन्म अथवा किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद 21 दिन के भीतर संबंधित विभाग में पंजीकरण अवश्य कराएं, जिससे अतिरिक्त शुल्क से बचा जा सके और सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर प्राप्त हो सकें।