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Amroha News: मुनव्वर राना की शायरी सुनने के लिए लग गई थी भीड़
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अमरोहा। मां की महिमा को शायरी में पिरोने वाले शायर मुनव्वर राणा दुनिया को अलविदा कह गए। मुनव्वर राणा अमरोहा में भी बड़े शौक से सुने जाते थे। साल 2015 में आखिरी बार उन्होंने यहां हुए मुशायरे में अपनी शायरी से समा बांध दिया था। आलम यह था कि उनको सुनने के लिए सर्द रात में भी लाेगों ने सुबह चार बजे तक इंतजार किया था।
मशहूर शायर मुनव्वर राणा के चाहने वाले हर जगह हैं। अमरोहा भी इससे अछूता नहीं है। जब भी यहां मुनव्वर राणा पहुंचे तो लोगों को अलग ही माहौल देखा गया। वह उनकी शायरी को बड़ी उत्सुकता से सुनते रहे हैं। 19 फरवरी 2015 को मुनव्वर राणा ने आखिरी बार अमरोहा में अपने कलाम पढ़े थे। नगर पालिका के टाउन हॉल में जिंदा-ए-दिलाने संस्था के तत्वावधान में आयोजित एक शाम नूर अमरोहवी के नाम से आयोजित मुशायरे में शिरकत करने के लिए पहुंचे थे। शहर के शायर शीबान कादरी कहते हैं कि उन्हें अमरोहा के शायरों के शौकीनों से बड़ा लगाव था। नूर अमरोहवी से उनके खास रिश्ते थे। तभी वह तबीयत खराब होने के बाद भी कलाम पढ़ने के लिए पहुंचे थे। आलम यह था कि उनकी शायरी के शौकीन रात-रात भर उनका इंतजार करते थे। शायरी के दौरान उनके शेर- लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है, मैं हिंदी में गजल कहता हूं हिंदी मुस्कुराती है। इसके अलावा, इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिए, आप आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए, अपनी यादों से कहो एक दिन की छुट्टी दे हमें, इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए, खूब सुनी गई थी। उनकी शायरी की गर्माहट ने लोगों को पूरी रात रुकने को मजबूर कर दिया था। डाॅ. सिराजुद्दीन हाशमी द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम में लखनऊ के मशहूर शायर सैफ बाबर, डॉ. तारिक कमर, दिल्ली के सबा अजीज, शम्स रम्जी, शबनम सिद्दीकी ने भी अपने कलाम पढ़े थे। डॉ. सिराजुद्दीन हाशमी बताते हैं कि उनका अमरोहा एवं उनके परिवार से काफी लगाव था। वह कई मर्तबा अमरोहा आए। उनकी किताब का विमोचन भी मुनव्वर राणा द्वारा किया गया था। वह कहते हैं कि उनकी मौत से उर्दू शायरी में जो खालीपन हुआ है, उसको भरना नामुमकिन है।
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मशहूर शायर मुनव्वर राणा के चाहने वाले हर जगह हैं। अमरोहा भी इससे अछूता नहीं है। जब भी यहां मुनव्वर राणा पहुंचे तो लोगों को अलग ही माहौल देखा गया। वह उनकी शायरी को बड़ी उत्सुकता से सुनते रहे हैं। 19 फरवरी 2015 को मुनव्वर राणा ने आखिरी बार अमरोहा में अपने कलाम पढ़े थे। नगर पालिका के टाउन हॉल में जिंदा-ए-दिलाने संस्था के तत्वावधान में आयोजित एक शाम नूर अमरोहवी के नाम से आयोजित मुशायरे में शिरकत करने के लिए पहुंचे थे। शहर के शायर शीबान कादरी कहते हैं कि उन्हें अमरोहा के शायरों के शौकीनों से बड़ा लगाव था। नूर अमरोहवी से उनके खास रिश्ते थे। तभी वह तबीयत खराब होने के बाद भी कलाम पढ़ने के लिए पहुंचे थे। आलम यह था कि उनकी शायरी के शौकीन रात-रात भर उनका इंतजार करते थे। शायरी के दौरान उनके शेर- लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है, मैं हिंदी में गजल कहता हूं हिंदी मुस्कुराती है। इसके अलावा, इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिए, आप आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए, अपनी यादों से कहो एक दिन की छुट्टी दे हमें, इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए, खूब सुनी गई थी। उनकी शायरी की गर्माहट ने लोगों को पूरी रात रुकने को मजबूर कर दिया था। डाॅ. सिराजुद्दीन हाशमी द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम में लखनऊ के मशहूर शायर सैफ बाबर, डॉ. तारिक कमर, दिल्ली के सबा अजीज, शम्स रम्जी, शबनम सिद्दीकी ने भी अपने कलाम पढ़े थे। डॉ. सिराजुद्दीन हाशमी बताते हैं कि उनका अमरोहा एवं उनके परिवार से काफी लगाव था। वह कई मर्तबा अमरोहा आए। उनकी किताब का विमोचन भी मुनव्वर राणा द्वारा किया गया था। वह कहते हैं कि उनकी मौत से उर्दू शायरी में जो खालीपन हुआ है, उसको भरना नामुमकिन है।
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