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दफ्तर से रसीद बुक और रिकार्ड गायब
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
Updated Sun, 01 May 2016 12:45 AM IST
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- फोटो : demo pic
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नगर पंचायत नौगावां सादात ने जिन ठेकेदारों के नाम से बुक संख्या 97 से रसीदें काटीं, वह बुक नगर पंचायत के रिकार्ड में ही दर्ज नहीं है, जबकि उससे संबंधित रिकार्ड भी गायब है। वहीं बुक संख्या 107 से वर्ष 2011 में काटी गई रसीदों की धनराशि पांच साल बाद पंचायत कोष में जमा करने का मामला सामने आया है।
शहर के मानवाधिकार कार्यकर्ता अनिल कुमार जग्गा ने नगर पंचायत नौगावां सादात से आरटीआई के माध्यम से कुछ बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। इस पर चौकाने वाली जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक, नगर पंचायत ने वर्ष 2010 में रसीद बुक संख्या 97 से रसीद संख्या 9613 और 9618 एक ठेकेदार के नाम काटी थी। इस बुक में करीब सौ रसीदें थीं। हैरत की बात तो ये है कि यह रसीद बुक संख्या, नगर पंचायत के रिकार्ड में ही दर्ज नहीं है।
जबकि इस बुक से ठेकेदारों से दो फीसदी धरोहर धनराशि वसूली गई थी। इस बुक के जरिए जितने भी निर्माण कार्य कराए गए, उनका रिकार्ड तक पंचायत कार्यालय से गायब है। कुल मिलाकर या तो फर्जी रसीद बुक से लाखों रुपये का गबन किया गया है या फिर गर्दन फंसती देख रिकार्ड ही गायब कर दिया गया।
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फिलहाल यह जांच का मामला है। इसके अलावा अन्य बुक संख्या 107 से वर्ष 2011 में रसीदें काटकर धरोहर धनराशि वसूली गई थी। 28 मार्च को डाली गई आरटीआई की भनक लगते ही इन रसीदों से संबंधित धनराशि आनन फानन में पांच वर्ष बाद 13 अप्रैल को पंचायत कोष में जमा की गई, जबकि धनराशि 24 घंटे में सरकारी कोष में जमा हो जानी चाहिए थी।
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शहर के मानवाधिकार कार्यकर्ता अनिल कुमार जग्गा ने नगर पंचायत नौगावां सादात से आरटीआई के माध्यम से कुछ बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। इस पर चौकाने वाली जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक, नगर पंचायत ने वर्ष 2010 में रसीद बुक संख्या 97 से रसीद संख्या 9613 और 9618 एक ठेकेदार के नाम काटी थी। इस बुक में करीब सौ रसीदें थीं। हैरत की बात तो ये है कि यह रसीद बुक संख्या, नगर पंचायत के रिकार्ड में ही दर्ज नहीं है।
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जबकि इस बुक से ठेकेदारों से दो फीसदी धरोहर धनराशि वसूली गई थी। इस बुक के जरिए जितने भी निर्माण कार्य कराए गए, उनका रिकार्ड तक पंचायत कार्यालय से गायब है। कुल मिलाकर या तो फर्जी रसीद बुक से लाखों रुपये का गबन किया गया है या फिर गर्दन फंसती देख रिकार्ड ही गायब कर दिया गया।
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फिलहाल यह जांच का मामला है। इसके अलावा अन्य बुक संख्या 107 से वर्ष 2011 में रसीदें काटकर धरोहर धनराशि वसूली गई थी। 28 मार्च को डाली गई आरटीआई की भनक लगते ही इन रसीदों से संबंधित धनराशि आनन फानन में पांच वर्ष बाद 13 अप्रैल को पंचायत कोष में जमा की गई, जबकि धनराशि 24 घंटे में सरकारी कोष में जमा हो जानी चाहिए थी।