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मरने के बाद नहीं मिल रहा कंधा
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गजरौला। कोरोना काल ने विधि के विधान को भी बदलकर रख दिया है। यही वजह है कि कोरोना संक्रमित की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार से पूर्व होने वाले क्रिया कर्म तक नहीं हो पा रहे हैं। और तो और मरने वालों को अपनों का कंधा तक नहीं नसीब हो रहा है। गाड़ी से स्ट्रेचर उतारकर सीधे चिता पर शव रखकर सीधे अंतिम संस्कार हो रहे हैं। गंगाघाट अथवा मोक्ष स्थल पर चिता जलती देख उनके अपने दूर से ही निहारते रहते हैं। कोविड से हो रही मौतों के कारण अपनों का साथ छूटता जा रहा है और परिजन अंत समय में भी उनसे दूरी बना रहे हैं।
मंगलवार को नगर के एक मोहल्ले में रहने वाले एक फैक्टरी अधिकारी के बीमार पिता ने नोएडा के बड़े अस्पताल में दम तोड़ दिया। शव यहां लाया गया लेकिन अंतिम संस्कार के लिए तिगरी ले जाने में काफी परेशानी हुई। जैसे तैसे शव को तिगरी ले जाया गया। शव के साथ उनका बेटा और ड्राइवर ही था। गाड़ी से पीपीई किट में रखे शव को उतारकर गंगा किनारे सजाई गई चिता पर लिटा गया। इसके बाद आनन-फानन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। बेटे की विवशता यह थी कि कोरोना संक्रमण के भय से उसने पिता के शरीर को हाथ तक नहीं लगाया। जब उनकी चिता जली तो वह दूर खड़ा होकर फफकता नजर आया। इस तरह के मार्मिक दृश्य इन दिनों ब्रजघाट और तिगरी में देखे जा सकते हैं। वहां अंतिम संस्कार के लिए आने वाले कोरोना संक्रमितों के शवों को सीधे ही जलाया जा रहा है। अंतिम संस्कार से पूर्व होने वाली क्रियाओं को पूरा नहीं कराया जा रहा है। पंडित भी शवों के पास जाने अथवा उन्हें छूने से डर रहे हैं।
क्या कहते हैं पंडित-
गंगाधाम तिगरी में रहने वाले पंडित गंगाशरन शर्मा कहते हैं कि मृत्यु एक साक्षात सत्य है। मृतक की आत्मा की शांति के लिए उसकी पार्थिव देह को पहले घर में ही नहलाया जाता है। वस्त्र बदले जाते हैं। इसके उपरांत देह पर पिंड भी रखे जाते हैं। अंत्येष्टि से पूर्व भी गंगाघाट अथवा मोक्ष स्थल पर भी धार्मिक कृत्य किए जाते हैं। ऐसा होना अत्यावश्यक है। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है।
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गंगा आरती मंदिर ब्रजघाट के पुजारी मनोज तिवारी कहते हैं कि अंतिम संस्कार को अपने धर्म के अनुसार ही कराना श्रेयस्कर होता है। इससे मृतक की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है। यह परंपरा तो आदिकाल से चली आ रही है।
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मंगलवार को नगर के एक मोहल्ले में रहने वाले एक फैक्टरी अधिकारी के बीमार पिता ने नोएडा के बड़े अस्पताल में दम तोड़ दिया। शव यहां लाया गया लेकिन अंतिम संस्कार के लिए तिगरी ले जाने में काफी परेशानी हुई। जैसे तैसे शव को तिगरी ले जाया गया। शव के साथ उनका बेटा और ड्राइवर ही था। गाड़ी से पीपीई किट में रखे शव को उतारकर गंगा किनारे सजाई गई चिता पर लिटा गया। इसके बाद आनन-फानन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। बेटे की विवशता यह थी कि कोरोना संक्रमण के भय से उसने पिता के शरीर को हाथ तक नहीं लगाया। जब उनकी चिता जली तो वह दूर खड़ा होकर फफकता नजर आया। इस तरह के मार्मिक दृश्य इन दिनों ब्रजघाट और तिगरी में देखे जा सकते हैं। वहां अंतिम संस्कार के लिए आने वाले कोरोना संक्रमितों के शवों को सीधे ही जलाया जा रहा है। अंतिम संस्कार से पूर्व होने वाली क्रियाओं को पूरा नहीं कराया जा रहा है। पंडित भी शवों के पास जाने अथवा उन्हें छूने से डर रहे हैं।
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क्या कहते हैं पंडित-
गंगाधाम तिगरी में रहने वाले पंडित गंगाशरन शर्मा कहते हैं कि मृत्यु एक साक्षात सत्य है। मृतक की आत्मा की शांति के लिए उसकी पार्थिव देह को पहले घर में ही नहलाया जाता है। वस्त्र बदले जाते हैं। इसके उपरांत देह पर पिंड भी रखे जाते हैं। अंत्येष्टि से पूर्व भी गंगाघाट अथवा मोक्ष स्थल पर भी धार्मिक कृत्य किए जाते हैं। ऐसा होना अत्यावश्यक है। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है।
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गंगा आरती मंदिर ब्रजघाट के पुजारी मनोज तिवारी कहते हैं कि अंतिम संस्कार को अपने धर्म के अनुसार ही कराना श्रेयस्कर होता है। इससे मृतक की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है। यह परंपरा तो आदिकाल से चली आ रही है।