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बेटी का नेत्रदान करा अब लोगों को प्रेरणा दे रहे अशोक
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उम्मीद की मशाल के लिए अशोक अग्रवाल का फोटो
- फोटो : DHANAURA
मंडी धनौरा। बेटी के नेत्रदान कराकर अब लोगों को नेत्रदान करने की प्रेरणा दे रहे है अशोक अग्रवाल। लगभग 11 साल पहले शुरू हुई इस मुहिम के अंतर्गत अब तक 112 लोगों के नेत्रदान नगर व ग्रामीण क्षेत्र में कराए जा चुके हैं। अशोक अग्रवाल ने अपनी 15 साल की बेटी नैना अग्रवाल की मौत होने पर नेत्रदान का फैसला लिया था। आज लोग अपने प्रियजन की मौत पर स्वेच्छा से ही नेत्रदान का फैसला कर रहे हैं। नेत्रदान के लिए प्रेरित करने के लिए अशोक अग्रवाल के साथ उनके दोस्तों का भी योगदान महत्वपूर्ण है।
नगर पालिका के चार बार सभासद रहे मोहल्ला विजय नगर निवासी अशोक अग्रवाल बताते है कि बेटी नैना की 11 साल पहले अचानक मौत हो गई। पत्नी योजना ने नैना के नेत्रदान करने के बारे में कहा तो उनके पांव तले जमीन निकल गई। वह बताते है कि कस्बाई जिंदगी में मृतक के शरीर में चीरफाड़ को लेकर अच्छा नहीं समझा जाता है। लेकिन पत्नी नेत्रदान पर अड़ गई तो आननफानन में मुरादाबाद के सीएल गुप्ता इंस्टीट्यूट से संपर्क किया गया। उनकी टीम उनके घर आई और नैना के नैन लेकर चली गई। नैना के नेत्रदान नगर व ग्रामीण क्षेत्र का पहला नेत्रदान था। लोग नेत्रदान का महत्व नहीं जानते थे।
अशोक बताते हैं कि कुछ समय बाद सीएल गुप्ता आई इंस्टीट्यूट के अधिकारियों ने बताया कि उनकी बेटी के नेत्रों से तीन नेत्रहीन लोगों की आंखों को रोशनी मिली है और वह अब दुनिया के रंगों को देख सकते हैं। तब उनको नेत्रदान का महत्व समझ में आया। उसके बाद उन्होंने नेत्रदान के लिए लोगों को समझाना शुरू कर दिया। नेत्रहीन लोगों की जिंदगी में रोशनी लाने के संकल्प को पूरा करने के लिए अपने कुछ दोस्तों को भी अपने साथ जोड़ा। अशोक अपनी एक और बेटी की मौत के बाद उसके भी नेत्रदान कर चुके हैं। अपने परिवार के पांच लोगों के नेत्रदान सहित अब तक 112 नेत्रदान करा चुके हैं। उनकी इस मुहिम में सर्वेश शर्मा, सुबोध देवरा आदि का भी योगदान हैं। अशोक व उनकी पत्नी मृत्यु के पश्चात नेत्रदान व देहदान का संकल्प भी कर चुके हैं।
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आमिर खान के कार्यक्रम सत्यमेव जयते से मिली प्रेरणा
मंडी धनौरा। वर्षों पहले टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले प्रसिद्ध सिने अभिनेता आमिर खान के बहुचर्चित कार्यक्रम सत्यमेव जयते देखकर अशोक अग्रवाल व उनकी पत्नी को नेत्रदान का महत्व समझ में आया था। अशोक अग्रवाल का कहना है कि एक रविवार वह और उनकी पत्नी सत्यमेव जयते कार्यक्रम में नेत्रदान का महत्व देख रहे थे। कितनी बड़ी तादाद में लोग जन्म से ही दृष्टिहीन होते हैं और कुछ किसी बीमारी अथवा दुर्घटना में आंखों की रोशनी खो देते हैं। इस कार्यक्रम में नेत्रहीनों की पीड़ा देखकर उनका मन द्रवित हो गया था। उसी समय निर्णय कर लिया था कि वह अपने व परिवार के सदस्यों का नेत्रदान अवश्य करेंगे। उनका कहना है कि हिंदू संस्कृति में शरीर नश्वर माना गया है। यदि मृत्यु के बाद हमारा शरीर व उसका कोई अंग किसी के काम आ जाए तो इससे अधिक पुण्य का काम नहीं हो सकता है।
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नगर पालिका के चार बार सभासद रहे मोहल्ला विजय नगर निवासी अशोक अग्रवाल बताते है कि बेटी नैना की 11 साल पहले अचानक मौत हो गई। पत्नी योजना ने नैना के नेत्रदान करने के बारे में कहा तो उनके पांव तले जमीन निकल गई। वह बताते है कि कस्बाई जिंदगी में मृतक के शरीर में चीरफाड़ को लेकर अच्छा नहीं समझा जाता है। लेकिन पत्नी नेत्रदान पर अड़ गई तो आननफानन में मुरादाबाद के सीएल गुप्ता इंस्टीट्यूट से संपर्क किया गया। उनकी टीम उनके घर आई और नैना के नैन लेकर चली गई। नैना के नेत्रदान नगर व ग्रामीण क्षेत्र का पहला नेत्रदान था। लोग नेत्रदान का महत्व नहीं जानते थे।
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अशोक बताते हैं कि कुछ समय बाद सीएल गुप्ता आई इंस्टीट्यूट के अधिकारियों ने बताया कि उनकी बेटी के नेत्रों से तीन नेत्रहीन लोगों की आंखों को रोशनी मिली है और वह अब दुनिया के रंगों को देख सकते हैं। तब उनको नेत्रदान का महत्व समझ में आया। उसके बाद उन्होंने नेत्रदान के लिए लोगों को समझाना शुरू कर दिया। नेत्रहीन लोगों की जिंदगी में रोशनी लाने के संकल्प को पूरा करने के लिए अपने कुछ दोस्तों को भी अपने साथ जोड़ा। अशोक अपनी एक और बेटी की मौत के बाद उसके भी नेत्रदान कर चुके हैं। अपने परिवार के पांच लोगों के नेत्रदान सहित अब तक 112 नेत्रदान करा चुके हैं। उनकी इस मुहिम में सर्वेश शर्मा, सुबोध देवरा आदि का भी योगदान हैं। अशोक व उनकी पत्नी मृत्यु के पश्चात नेत्रदान व देहदान का संकल्प भी कर चुके हैं।
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आमिर खान के कार्यक्रम सत्यमेव जयते से मिली प्रेरणा
मंडी धनौरा। वर्षों पहले टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले प्रसिद्ध सिने अभिनेता आमिर खान के बहुचर्चित कार्यक्रम सत्यमेव जयते देखकर अशोक अग्रवाल व उनकी पत्नी को नेत्रदान का महत्व समझ में आया था। अशोक अग्रवाल का कहना है कि एक रविवार वह और उनकी पत्नी सत्यमेव जयते कार्यक्रम में नेत्रदान का महत्व देख रहे थे। कितनी बड़ी तादाद में लोग जन्म से ही दृष्टिहीन होते हैं और कुछ किसी बीमारी अथवा दुर्घटना में आंखों की रोशनी खो देते हैं। इस कार्यक्रम में नेत्रहीनों की पीड़ा देखकर उनका मन द्रवित हो गया था। उसी समय निर्णय कर लिया था कि वह अपने व परिवार के सदस्यों का नेत्रदान अवश्य करेंगे। उनका कहना है कि हिंदू संस्कृति में शरीर नश्वर माना गया है। यदि मृत्यु के बाद हमारा शरीर व उसका कोई अंग किसी के काम आ जाए तो इससे अधिक पुण्य का काम नहीं हो सकता है।