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डेढ़ हजार में किराये पर लिया खेत, 20 लोगों को दिया गया रोजगार

Tue, 12 Jul 2022 11:24 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 12 Jul 2022 11:24 PM IST
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Software engineer and teacher started farming of lemon grass
10 : संग्रामपुर : सीवान में तैयार की गई लेमन ग्रास की खेती के पास मौजूद उत्पादक। -संवाद - फोटो : AMETHI
संग्रामपुर (अमेठी)। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान नौकरी पर संकट आया तो सुल्तानपुर के रहने वाले दो दोस्तों ने अमेठी में पहले तुलसी फिर लेमनग्रास की खेती शुरू की। 20 हजार रुपये प्रति बीघे प्रति वर्ष किराये पर भूमि लेकर लेमनग्रास की खेती करने वाले दोनों दोस्त खासा मुनाफा कमाने के साथ क्षेत्र के लोगों (विशेषकर किसानों) के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
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सुल्तानपुर जिले के करौंदीकला निवासी ऋषि कुमार श्रीवास्तव और उन्हीं के जिले के पीयूष सिंह की दोस्ती केएनआई में पढ़ाई के दौरान हुई। दोनों दोस्तों ने कई बार सोशल एंटरप्रेन्योरशिप से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया। दोनों ने ऑर्गेनिक खेती पर भी काफी रिसर्च किया।
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दोनों दोस्तों में खेती में कुछ अलग करने की रुचि बढ़ती गयी। कई बार विचार विमर्श भी हुआ। लेकिन दोनों ने पढ़ाई के बाद दो से तीन साल जॉब करने के बारे में सोचा। इसी दौरान ऋषि की प्लेसमेंट हो गया और वह एक अच्छी कंपनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर पर काम करने लगे। पीयूष सिंह एक विद्यालय में पढ़ाने लगे। इसी बीच मार्च 2020 में कोरोना ने दस्तक दे दी। और दोनों अपने घर आ गए।
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लॉकडाउन के दौरान दोनों दोस्तों ने कुछ अलग करने का विचार किया। उन्होंने तुलसी की खेती के लिए संग्रामपुर क्षेत्र के उत्तरगांव (अमहा) और भुसाहरी में अपने परिचित से करीब 20 बीघे जमीन 20 हजार रुपये प्रति बीघे सलाना लीज पर लेकर खेती की शुरूआत की। तुलसी की खेती में फायदा नहीं हुआ तो उन्होंने लेमनग्रास की खेती शुरू की। यह खेती दोनों दोस्तों के लिए वरदान साबित हो रही है। दोनों दोस्त एक बीघे में प्रतिवर्ष करीब 70 से 80 हजार रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं।
1500 रुपये लीटर तक बिकता है तेल
लेमनग्रास की मांग हर दिन बढ़ती जा रही है। सरपत की तरह के इस पौधे की खासियत है कि इसे एक बार लगाया जाता है और पांच वर्ष तक यह चलता है। पहली कटाई 120 दिन पर होती है। उसके बाद हर 60 दिन पर इसकी कटाई की जा सकती है। एक बीघे में कटाई के बाद आठ से दस लीटर तेल निकलता है। इसका औसतन भाव 1200 से 1500 रुपये प्रति लीटर रहता है। लेमनग्रास की खेती होने से गांव के करीब 20 लोगों को रोजगार भी मिला है।
तेल निकालने का प्लांट भी लगाया
ऋषि और पीयूष ने भुसहरी गांव के किनारे लेमनग्रास का तेल निकालने का प्लांट भी लगाया है। एक बीघे में हर दूसरे महीने वह आठ से दस लीटर तेल निकाल रहे हैं। लेमनग्रास का तेल स्टीम के जरिए निकाला जाता है। पहले लेमनग्रास के तैयार पौधों की जड़ से थोड़ा छोड़कर कटाई करते हैं। उसके बाद ब्वॉयलर के जरिए इसमें से तेल निकाला जाता है। तेल निकलने के बाद साथ-साथ फिल्टर भी हो जाता है। ऋषि बताते हैं कि बाराबंकी व लखनऊ में तेल ले जाने पर व्यापारी इसे हाथों हाथ खरीद लेते हैं।
पशु इसे नहीं खाते
ऋषि और पीयूष बताते हैं कि इस पर आपदा का प्रभाव नहीं पड़ता। पशु इसे नहीं खाते। यह रिस्क फ्री फसल है। यह सरपत की प्रजाति मानी जाती है। इसको न तो गाय, भैंस, बकरी, नीलगाय सहित कोई भी जानवर इसे नहीं खाते। वहीं लेमनग्रास की रोपाई के बाद सिर्फ एक बार निराई करने की जरूरत पड़ती है। सिंचाई भी साल में पांच से छह बार ही करनी पड़ती है। इससे जाहिर होता है कि इसमें मेहनत कम लगती है और लागत भी काफी कम है। इन्हीं वजहों से इसकी खेती की तरफ हम दोनों दोस्त आकर्षित हुए थे।
किस काम में आती लेमनग्रास
लेमनग्रास के तेल की मांग काफी ज्यादा है। इसके पत्ते से तेल बनाया जाता है। वहीं इसके डंठल का भी निर्यात किया जाता है। दवाई बनाने के लिए कंपनियां इनकी खरीद करती हैं। इत्र, सौंदर्य के सामान और साबुन बनाने एवं कॉस्मेटिक उत्पादों आदि में इसका काफी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा हर्बल टी में भी इसका उपयोग होता है। विटामिन-ए की अधिकता और सिंट्राल के कारण भारतीय लेमनग्रास के तेल की मांग हमेशा बनी रहती है। कोरोना काल से इसके तेल का इस्तेमाल सैनिटाइजर बनाने में भी हो रहा है।

यहां होगी अच्छी पैदावार
ऋषि और पीयूष बताते है कि लेमनग्रास की खेती आप कहीं भी कर सकते हैं। लेकिन ज्यादा पैदावार के लिए गर्म और आर्द्र्र जलवायु जरूरी है। उच्च ताप और धूप से इसमें तेल की मात्रा बढ़ती है। हर प्रकार के खेत में इसकी खेती कर सकते हैं। अगर दोमट उपजाऊ मिट्टी में खेती करते हैं तो फसल काफी अच्छी होती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा रही है।
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