{"_id":"636409d0bae688460a5fc72a","slug":"officers-sanction-compensation-of-land-who-had-already-in-national-highway-amethi-news-lko655484596","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिस जमीन पर पहले से हाईवे, उसका भी बांट दिया मुआवजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिस जमीन पर पहले से हाईवे, उसका भी बांट दिया मुआवजा
विज्ञापन
गौरीगंज : जगदीशपुर के पास से निकला एनएच-56 का बाईपास। -संवाद
- फोटो : AMETHI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गौरीगंज (अमेठी)। मुआवजा निर्धारण व वितरण में हुए खेल की जड़ें बहुत गहरी हैं। मुआवजा निर्धारण और वितरण में हुआ खेल धीरे-धीरे सामने आ रहा है। इसमें अफसरों की मनमानी का आलम यह रहा कि मुसाफिरखाना तहसील क्षेत्र के 45 गांवों में हुए मुआवजे निर्धारण के दौरान तीन ऐसे गाटों का मुआवजा दिया गया, जिन पर पहले से ही नेशनल हाईवे (एनएच) बना हुआ था।
एनएच-56 के चौड़ीकरण व दो बाईपास (जगदीशपुर व मुसाफिरखाना) में आ रही भूमि के मुआवजा निर्धारण में जिम्मेदार अफसरों ने नियम व कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई। इस दौरान 30 गांवों के सैकड़ों ऐसे किसानों को एनएच किनारे की भूमि के बराबर का मुआवजा दे दिया गया, जिनकी जमीनें कृषि उपयोग की थीं और उनका सर्किल रेट भी बेहद कम था। मुआवजा निर्धारण व वितरण के दौरान जल्दबाजी में रहे अफसरों ने इस बात पर भी विचार नहीं किया कि जिस दिन यह मामला खुलेगा उस दिन उनका क्या हश्र होगा।
आलम यह रहा कि अफसरों ने मुआवजा वितरण में मानकों की जमकर अनदेखी की। सड़क किनारे की एक ही श्रेणी की भूमि का मुआवजा भी कम ज्यादा कर दिया। जो जितना बड़ा और प्रतिष्ठित किसान, उसके मुआवजे की दर उतनी ज्यादा। मामला सामने आने के बाद डीएम राकेश कुमार मिश्र की ओर से गठित जांच टीम ने पाया गया कि अफसरों नेे तीन ऐसे गाटों का मुआवजा निर्धारित कर बांट दिया, जिस भूमि पर अरसे पूर्व से ही हाईवे बना हुआ है।
विज्ञापन
राजस्व सूत्रों के अनुसार जिले में किसी भी प्रकार के भूमि अधिग्रहण से पहले डीएम की ओर से एडीएम को सक्षम प्राधिकारी भूमि अध्याप्ति (काला) नामित किया जाता है। इस घोटाले को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इस नियम की भी अवहेलना की गई। तत्कालीन डीएम ने एडीएम के बजाय मुसाफिरखाना तहसील के एसडीएम को ही सक्षम प्राधिकारी भूमि अध्याप्ति नामित कर दिया। कार्यदायी संस्था के अफसरों का दायित्व होता है कि वे अधिकारी से मिलकर मुआवजा निर्धारण व वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से पूरा करें।
384 करोड़ के घपले में संदिग्ध माने गए एसडीएम अभय पांडेय 10 दिसंबर 2016 से तीन जुलाई 2018 तक मुसाफिरखाना के एसडीएम व काला के पद तैनात रहे। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ कई गांवों को अवार्ड किया बल्कि सबसे अधिक मुआवजा वितरण का कार्य भी इसी दौरान हुआ। मुआवजा निर्धारण व वितरण में संदिग्ध पाए गए अभय पांडेय का जमीर तब जागा जब वे जिले से स्थानांतरित होकर बाराबंकी पहुंच गए।
31 दिसंबर 2020 को अभय पांडेय ने परियोजना निदेशक भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएच-56) को पत्र लिखकर मुआवजा निर्धारण व वितरण में गड़बड़ी की आशंका जताई। इस पत्र के बाद ही एनएचएआई ने डीएम की कोर्ट में वाद दायर किया। यही पत्र अब अन्य अफसरों के साथ अभय पांडेय के लिए मुसीबत बन गया है।
मामले में एनएचएआई के अफसरों की मिलीभगत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतने बड़े धन के अपव्यय के मामले में दो वर्ष पूर्व वाद दायर करने के बाद अफसरों ने इसमें कोई पैरवी नहीं की। और तो और अब तक संबंधित किसानों को नोटिस भी नहीं जारी की गई। मामले में डीएम के कड़े रुख को देखते हुए बुधवार को एनएचएआई के अफसरों ने फिलहाल उन 10 गांवों के किसानों को नोटिस जारी की है, जिसका वाद उन्होंने दो वर्ष पूर्व दायर किया था।
विज्ञापन
एनएच-56 के चौड़ीकरण व दो बाईपास (जगदीशपुर व मुसाफिरखाना) में आ रही भूमि के मुआवजा निर्धारण में जिम्मेदार अफसरों ने नियम व कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई। इस दौरान 30 गांवों के सैकड़ों ऐसे किसानों को एनएच किनारे की भूमि के बराबर का मुआवजा दे दिया गया, जिनकी जमीनें कृषि उपयोग की थीं और उनका सर्किल रेट भी बेहद कम था। मुआवजा निर्धारण व वितरण के दौरान जल्दबाजी में रहे अफसरों ने इस बात पर भी विचार नहीं किया कि जिस दिन यह मामला खुलेगा उस दिन उनका क्या हश्र होगा।
विज्ञापन
आलम यह रहा कि अफसरों ने मुआवजा वितरण में मानकों की जमकर अनदेखी की। सड़क किनारे की एक ही श्रेणी की भूमि का मुआवजा भी कम ज्यादा कर दिया। जो जितना बड़ा और प्रतिष्ठित किसान, उसके मुआवजे की दर उतनी ज्यादा। मामला सामने आने के बाद डीएम राकेश कुमार मिश्र की ओर से गठित जांच टीम ने पाया गया कि अफसरों नेे तीन ऐसे गाटों का मुआवजा निर्धारित कर बांट दिया, जिस भूमि पर अरसे पूर्व से ही हाईवे बना हुआ है।
विज्ञापन
राजस्व सूत्रों के अनुसार जिले में किसी भी प्रकार के भूमि अधिग्रहण से पहले डीएम की ओर से एडीएम को सक्षम प्राधिकारी भूमि अध्याप्ति (काला) नामित किया जाता है। इस घोटाले को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इस नियम की भी अवहेलना की गई। तत्कालीन डीएम ने एडीएम के बजाय मुसाफिरखाना तहसील के एसडीएम को ही सक्षम प्राधिकारी भूमि अध्याप्ति नामित कर दिया। कार्यदायी संस्था के अफसरों का दायित्व होता है कि वे अधिकारी से मिलकर मुआवजा निर्धारण व वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से पूरा करें।
384 करोड़ के घपले में संदिग्ध माने गए एसडीएम अभय पांडेय 10 दिसंबर 2016 से तीन जुलाई 2018 तक मुसाफिरखाना के एसडीएम व काला के पद तैनात रहे। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ कई गांवों को अवार्ड किया बल्कि सबसे अधिक मुआवजा वितरण का कार्य भी इसी दौरान हुआ। मुआवजा निर्धारण व वितरण में संदिग्ध पाए गए अभय पांडेय का जमीर तब जागा जब वे जिले से स्थानांतरित होकर बाराबंकी पहुंच गए।
31 दिसंबर 2020 को अभय पांडेय ने परियोजना निदेशक भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएच-56) को पत्र लिखकर मुआवजा निर्धारण व वितरण में गड़बड़ी की आशंका जताई। इस पत्र के बाद ही एनएचएआई ने डीएम की कोर्ट में वाद दायर किया। यही पत्र अब अन्य अफसरों के साथ अभय पांडेय के लिए मुसीबत बन गया है।
मामले में एनएचएआई के अफसरों की मिलीभगत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतने बड़े धन के अपव्यय के मामले में दो वर्ष पूर्व वाद दायर करने के बाद अफसरों ने इसमें कोई पैरवी नहीं की। और तो और अब तक संबंधित किसानों को नोटिस भी नहीं जारी की गई। मामले में डीएम के कड़े रुख को देखते हुए बुधवार को एनएचएआई के अफसरों ने फिलहाल उन 10 गांवों के किसानों को नोटिस जारी की है, जिसका वाद उन्होंने दो वर्ष पूर्व दायर किया था।