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384 करोड़ के खेल में एनएचएआई भी दोषी
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गौरीगंज (अमेठी)। जिले से होकर गुजरने वाले एनएच-56 के चौड़ीकरण व दो बाईपास बनाने से पहले भूमि अधिग्रहण व भू-स्वामियों को मुआवजा देने में की गई भारी गड़बड़ी के लिए अकेले राजस्व विभाग जिम्मेदार नहीं है। करीब 384 करोड़ रुपये के इस खेल में एनएचएआई के अफसर भी बराबर के दोषी हैं। सूत्रों के अनुसार एनएचएआई के अफसरों ने राजस्व अफसरों को हमवार कर पूरे घोटाले को अंजाम दिया।
एनएच 56 से जुड़े दो बाईपास के लिए अधिग्रहीत जमीन के लिए मुआवजा तय करने वाले अधिकारियों के साथ ही एनएचएआई के अधिकारी भी दोषी मिले हैं। तत्कालीन सक्षम अधिकारी भूमि अध्याप्ति द्वारा मुआवजे की राशि तय करने के बाद उसे स्वीकृति देने के लिए एनएचएआई अफसरों के पास भेजा गया था।
जिस पर एनएचएआई के अधिकारियों ने स्वीकृति प्रदान करते हुए राशि जारी कर दी। एनएचएआई के अफसरों ने इस बात की समीक्षा तक नहीं की कि राजस्व विभाग के अफसरों द्वारा निर्धारित मुआवजा नियमानुसार है भी या नहीं। एनएचएआई की ओर से लिखित स्वीकृति व धनराशि आवंटित होते ही अधिकारियों ने आनन-फानन उसी राशि (वास्तविक मुआवजा 180 करोड़ रुपये के बजाए 564 करोड़ रुपये) का वितरण कर दिया।
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तुरंत तो छोड़िए एनएचएआई के अफसरों ने कई साल तक न तो किसी प्रकार की कोई आपत्ति की और न ही पूरे मामले से उच्चाधिकारियों को अवगत ही कराया। 2014 से शुरू होकर 2016 तक चली इस कवायद के दौरान व चार साल तक एनएचएआई के अफसर इस मामले में चुप्पी साधे रहे। और तो और अधिकारियों ने इस मामले में आर्बिट्रेशन वाद तक दायर नहीं किया।
घोटाले की जड़ें बहुत गहरी
मुसाफिरखाना और जगदीशपुर में बनाए गए दोनों बाईपास के लिए अधिग्रहीत भूमि के मुआवजा वितरण में हुए घोटाले की जड़ें बहुत गहरी हैं। जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई 2014 में शुरू हुई। इस दौरान तत्कालीन एसडीएम आरडी राम और अशोक कनौजिया को सक्षम अधिकारी भूमि अध्याप्ति (काला) बनाया गया था। इन्हीं दोनों अधिकारियों के द्वारा मुआवजे का निर्धारण किया गया। शेष बचे कुछ गांवों का अवार्ड एसडीएम अभय पांडेय द्वारा किया गया था।
90 प्रतिशत लोगों में हो चुका वितरण
दर निर्धारित करने के बाद जब पत्रावलियां राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण भेजी गईं तो उसे बिना जांच-पड़ताल स्वीकृति दे दी गई। इसके बाद मुआवजा वितरण शुरू हो गया। अब तक 90 प्रतिशत किसानों व भू-स्वामियों को मुआवजे का वितरण किया जा चुका है। कतिपय कारणों से मुआवजा पाने से वंचित रहे करीब 10 प्रतिशत लोगों को इसका वितरण अब किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिन किसानों को अब मुआवजा मिल रहा है उन्हें वास्तविक दर से (कृषक भूमि के सर्किल रेट का चार गुना) भुगतान किया जा रहा है। इसको लेकर किसानों में आक्रोश भी देखने को मिल रहा है।
सिर्फ 10 गांवों में गड़बड़ी की जताई आशंका
एनएच का दफ्तर मुसाफिरखाना में भी बना है। बावजूद इसके अफसरों ने मामले को छह साल बाद उठाया। एनएचएआई के अफसरों की मिलीभगत को इस बात से भी समझा जा सकता है कि 2020 में जिला मजिस्ट्रेट के कोर्ट में जो आर्बिट्रेशन वाद दायर किया गया उसमें 30 गांवों के बजाए सिर्फ 10 गांवों में ही गड़बड़ी की आशंका जताई गई।
कमजोर रही एनएचएआई की पैरवी
2020 में वाद दायर होने के बाद तत्कालीन डीएम ने मामले में नोटिस जारी कर रिपोर्ट तलब की। रिपोर्ट आई तो डीएम ने संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी की। हालांकि बाद में एनएचएआई के अफसरों की कमजोर पैरवी की वजह से मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
विशेषज्ञ अफसरों कां जांच का जिम्मा
मौजूदा डीएम राकेश कुमार के संज्ञान में मामला आने के बाद उन्होंने जांच के लिए जिस कमेटी का गठन किया उसमें विशेष अफसर रखे गए। डीएम ने एडीएम न्यायिक राज कुमार द्विवेदी को अध्यक्ष बनाया गया तो उनके साथ लेनदेन की जांच के लिए वरिष्ठ कोषाधिकारी तो स्टांप आदि की जांच के लिए एआईजी स्टांप को बतौर सदस्य जगह दी गई। मुसाफिरखाना की एसडीएम सविता यादव को टीम में इसलिए रखा गया जिससे अभिलेखों की उपलब्धता व उनकी जांच पड़ताल में कोई बाधा न आए। एडीएम न्यायिक भी जांच के विशेषज्ञ माने जाते हैं। डीएम स्वयं पूरे प्रकरण की प्रतिदिन मॉनीटरिंग करते रहे।
मुसाफिरखाना में चर्चा का बाजार गर्म
384 करोड़ रुपये के इस घोटाले की खबरें सार्वजनिक होने के बाद मंगलवार को मुसाफिरखाना में चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। अफसर से लेकर कर्मचारी तक यह जानने की कोशिश में जुटे रहे कि आखिर गड़बड़ी में किसका क्या भूमिका थी। वहीं एसडीएम सविता यादव ने पूरे मामले पर कुछ भी बोलने से बच रहीं हैं।
भेजी गई रिपोर्ट : डीएम
डीएम राकेश कुमार मिश्र ने कहा कि पूरे मामले की गहन छानबीन कराई गई। जांच टीम की रिपोर्ट मिलने के बाद उसे शासन को भेज दिया गया है। उच्चाधिकारियों को भी पूरे प्रकरण से अवगत कराया गया है।
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एनएच 56 से जुड़े दो बाईपास के लिए अधिग्रहीत जमीन के लिए मुआवजा तय करने वाले अधिकारियों के साथ ही एनएचएआई के अधिकारी भी दोषी मिले हैं। तत्कालीन सक्षम अधिकारी भूमि अध्याप्ति द्वारा मुआवजे की राशि तय करने के बाद उसे स्वीकृति देने के लिए एनएचएआई अफसरों के पास भेजा गया था।
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जिस पर एनएचएआई के अधिकारियों ने स्वीकृति प्रदान करते हुए राशि जारी कर दी। एनएचएआई के अफसरों ने इस बात की समीक्षा तक नहीं की कि राजस्व विभाग के अफसरों द्वारा निर्धारित मुआवजा नियमानुसार है भी या नहीं। एनएचएआई की ओर से लिखित स्वीकृति व धनराशि आवंटित होते ही अधिकारियों ने आनन-फानन उसी राशि (वास्तविक मुआवजा 180 करोड़ रुपये के बजाए 564 करोड़ रुपये) का वितरण कर दिया।
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तुरंत तो छोड़िए एनएचएआई के अफसरों ने कई साल तक न तो किसी प्रकार की कोई आपत्ति की और न ही पूरे मामले से उच्चाधिकारियों को अवगत ही कराया। 2014 से शुरू होकर 2016 तक चली इस कवायद के दौरान व चार साल तक एनएचएआई के अफसर इस मामले में चुप्पी साधे रहे। और तो और अधिकारियों ने इस मामले में आर्बिट्रेशन वाद तक दायर नहीं किया।
घोटाले की जड़ें बहुत गहरी
मुसाफिरखाना और जगदीशपुर में बनाए गए दोनों बाईपास के लिए अधिग्रहीत भूमि के मुआवजा वितरण में हुए घोटाले की जड़ें बहुत गहरी हैं। जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई 2014 में शुरू हुई। इस दौरान तत्कालीन एसडीएम आरडी राम और अशोक कनौजिया को सक्षम अधिकारी भूमि अध्याप्ति (काला) बनाया गया था। इन्हीं दोनों अधिकारियों के द्वारा मुआवजे का निर्धारण किया गया। शेष बचे कुछ गांवों का अवार्ड एसडीएम अभय पांडेय द्वारा किया गया था।
90 प्रतिशत लोगों में हो चुका वितरण
दर निर्धारित करने के बाद जब पत्रावलियां राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण भेजी गईं तो उसे बिना जांच-पड़ताल स्वीकृति दे दी गई। इसके बाद मुआवजा वितरण शुरू हो गया। अब तक 90 प्रतिशत किसानों व भू-स्वामियों को मुआवजे का वितरण किया जा चुका है। कतिपय कारणों से मुआवजा पाने से वंचित रहे करीब 10 प्रतिशत लोगों को इसका वितरण अब किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिन किसानों को अब मुआवजा मिल रहा है उन्हें वास्तविक दर से (कृषक भूमि के सर्किल रेट का चार गुना) भुगतान किया जा रहा है। इसको लेकर किसानों में आक्रोश भी देखने को मिल रहा है।
सिर्फ 10 गांवों में गड़बड़ी की जताई आशंका
एनएच का दफ्तर मुसाफिरखाना में भी बना है। बावजूद इसके अफसरों ने मामले को छह साल बाद उठाया। एनएचएआई के अफसरों की मिलीभगत को इस बात से भी समझा जा सकता है कि 2020 में जिला मजिस्ट्रेट के कोर्ट में जो आर्बिट्रेशन वाद दायर किया गया उसमें 30 गांवों के बजाए सिर्फ 10 गांवों में ही गड़बड़ी की आशंका जताई गई।
कमजोर रही एनएचएआई की पैरवी
2020 में वाद दायर होने के बाद तत्कालीन डीएम ने मामले में नोटिस जारी कर रिपोर्ट तलब की। रिपोर्ट आई तो डीएम ने संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी की। हालांकि बाद में एनएचएआई के अफसरों की कमजोर पैरवी की वजह से मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
विशेषज्ञ अफसरों कां जांच का जिम्मा
मौजूदा डीएम राकेश कुमार के संज्ञान में मामला आने के बाद उन्होंने जांच के लिए जिस कमेटी का गठन किया उसमें विशेष अफसर रखे गए। डीएम ने एडीएम न्यायिक राज कुमार द्विवेदी को अध्यक्ष बनाया गया तो उनके साथ लेनदेन की जांच के लिए वरिष्ठ कोषाधिकारी तो स्टांप आदि की जांच के लिए एआईजी स्टांप को बतौर सदस्य जगह दी गई। मुसाफिरखाना की एसडीएम सविता यादव को टीम में इसलिए रखा गया जिससे अभिलेखों की उपलब्धता व उनकी जांच पड़ताल में कोई बाधा न आए। एडीएम न्यायिक भी जांच के विशेषज्ञ माने जाते हैं। डीएम स्वयं पूरे प्रकरण की प्रतिदिन मॉनीटरिंग करते रहे।
मुसाफिरखाना में चर्चा का बाजार गर्म
384 करोड़ रुपये के इस घोटाले की खबरें सार्वजनिक होने के बाद मंगलवार को मुसाफिरखाना में चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। अफसर से लेकर कर्मचारी तक यह जानने की कोशिश में जुटे रहे कि आखिर गड़बड़ी में किसका क्या भूमिका थी। वहीं एसडीएम सविता यादव ने पूरे मामले पर कुछ भी बोलने से बच रहीं हैं।
भेजी गई रिपोर्ट : डीएम
डीएम राकेश कुमार मिश्र ने कहा कि पूरे मामले की गहन छानबीन कराई गई। जांच टीम की रिपोर्ट मिलने के बाद उसे शासन को भेज दिया गया है। उच्चाधिकारियों को भी पूरे प्रकरण से अवगत कराया गया है।