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अहंकार आने पर नहीं होती प्रभु की कृपा
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गौरीगंज (अमेठी)। नौ दिवसीय आयोजन के पहले दिन रामभद्राचार्य की कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र हुए। जगद्गुरु ने सुंदर कांड के 33वें दोहे की दूसरी पंक्ति पर नौ दिन तक कथा कहने की बात कहते हुए उसका शुभारंभ किया।
रणंजय इंटर कॉलेज खेल मैदान में आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के पहले दिन सोमवार को जगद्गुरु रामभद्राचार्य महाराज ने पहले दिन की कथा कही। कथा की शुरूआत उन्होंने नौ दिन तक एक चौपाई पर कथा कहीं जाने वाली पंक्ति (प्रभु पद पंकज पतीत शीशा, सुमिरि सो दशानन मगन गौरीसा) से कथा शुरू की।
कहा कि हनुमानजी लंका जलाकर भगवान श्रीराम के पास उपस्थित हो चुके हैं। भगवान हनुमान को बारम्बार निहारते हुए मन ही मन कह रहे हैं कि मैं तुमसे उरिन नहीं हूं। कहते हैं कि एकस समय ऐसा लग रहा था कि मानो भगवान के शरीर के 3.5 करोड़ रोम हनुमानजी का अभिनंदन करने को खड़े हों।
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उधर हनुमान समझ रहे हैं कि प्रभु उनकी प्रशंसा करने वाले हैं। हनुमान मन में सोंचते हैं कि प्रशंसा होने पर अहंकार हो सकता है। अहंकार आने पर भगवान नहीं मिलते, चले जाते हैं। हनुमान इसी सोच विचार में परेशान हैं।
फिर हनुमान ने सोचा कि भगवान का मुंह अग्नि है, अहंकार मन में आते ही उसे उसी में डाल दूंगा, यहीं सोचकर वह प्रभु के चरणों में गिर गए। भगवान बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं लेकिन प्रेम में मगन होने के चलते हनुमान उठना ही नहीं चाहते हैं। कहते हैं कि यह दशा देखकर शंकर भगवान प्रसन्न होते हैं और सोचते हैं कि यह अवसर हमें क्यों नहीं मिला। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
दर्शनार्थ रखी गईं दो चरण पादुकाएं
रामकथा के दौरान नौ दिन तक क्षेत्रवासियों के दर्शन के लिए मंच पर दो चरण पादुकाएं रखी गई हैं। आयोजक डॉ. अनिल कुमार त्रिपाठी ने बताया कि बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती महाराज आदि शंकराचार्य की चरण पादुका तो रामभद्राचार्य 725 वर्ष पुरानी आद्य रामानंदाचार्य की पादुका लाए हैं। कथा वाचक ने कहा कि दोनों पादुकाएं नौ दिन तक मंच पर रहेंगी।
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रणंजय इंटर कॉलेज खेल मैदान में आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के पहले दिन सोमवार को जगद्गुरु रामभद्राचार्य महाराज ने पहले दिन की कथा कही। कथा की शुरूआत उन्होंने नौ दिन तक एक चौपाई पर कथा कहीं जाने वाली पंक्ति (प्रभु पद पंकज पतीत शीशा, सुमिरि सो दशानन मगन गौरीसा) से कथा शुरू की।
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कहा कि हनुमानजी लंका जलाकर भगवान श्रीराम के पास उपस्थित हो चुके हैं। भगवान हनुमान को बारम्बार निहारते हुए मन ही मन कह रहे हैं कि मैं तुमसे उरिन नहीं हूं। कहते हैं कि एकस समय ऐसा लग रहा था कि मानो भगवान के शरीर के 3.5 करोड़ रोम हनुमानजी का अभिनंदन करने को खड़े हों।
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उधर हनुमान समझ रहे हैं कि प्रभु उनकी प्रशंसा करने वाले हैं। हनुमान मन में सोंचते हैं कि प्रशंसा होने पर अहंकार हो सकता है। अहंकार आने पर भगवान नहीं मिलते, चले जाते हैं। हनुमान इसी सोच विचार में परेशान हैं।
फिर हनुमान ने सोचा कि भगवान का मुंह अग्नि है, अहंकार मन में आते ही उसे उसी में डाल दूंगा, यहीं सोचकर वह प्रभु के चरणों में गिर गए। भगवान बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं लेकिन प्रेम में मगन होने के चलते हनुमान उठना ही नहीं चाहते हैं। कहते हैं कि यह दशा देखकर शंकर भगवान प्रसन्न होते हैं और सोचते हैं कि यह अवसर हमें क्यों नहीं मिला। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
दर्शनार्थ रखी गईं दो चरण पादुकाएं
रामकथा के दौरान नौ दिन तक क्षेत्रवासियों के दर्शन के लिए मंच पर दो चरण पादुकाएं रखी गई हैं। आयोजक डॉ. अनिल कुमार त्रिपाठी ने बताया कि बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती महाराज आदि शंकराचार्य की चरण पादुका तो रामभद्राचार्य 725 वर्ष पुरानी आद्य रामानंदाचार्य की पादुका लाए हैं। कथा वाचक ने कहा कि दोनों पादुकाएं नौ दिन तक मंच पर रहेंगी।