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पशुओं व मनुष्यों के लिए घातक गाजर घास का सेवन

Thu, 19 Aug 2021 11:21 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 19 Aug 2021 11:21 PM IST
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Consumption of carrot grass fatal for animals and humans
महरुआ। गाजर घास यानी पार्थेनियम को देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसका सेवन पशुओं के साथ ही मनुष्यों के लिए भी घातक है। इससे कई तरह की बीमारियां पैदा हो सकती हैं। गाजर घास से मनुष्यों को त्वचा संबंधी रोग, एक्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा तक हो सकता है। इसका अत्यधिक प्रभाव होने पर मनुष्य की मृत्यु तक हो सकती है। पशुओं के लिए भी यह खरपतवार अत्यधिक विषाक्त होती है। गाजर घास के तेजी से फैलने के कारण अन्य उपयोगी वनस्पतियां खत्म होने लगती हैं। यह विचार कृषि विज्ञान केंद्र पांती अध्यक्ष व वैज्ञानिक डॉ रामजीत ने दी। वह गाजर घास उन्मूलन एवं जागरूकता सप्ताह में हिस्सेदारी कर रहे थे।
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उन्होंने बताया कि गाजर घास अलग अलग स्थानों पर अलग अलग नामों से पहचानी जाती है। गाजर घास को सफेद टोपी, चटक चांदनी, गंदी बूटी आदि नामों से पहचाना जाता है। यह मुख्यत: खाली स्थानों, अनुपयोगी भूमियों, औद्योगिक क्षेत्र, बगीचों, पार्को, स्कूलों, सड़कों तथा रेलवे पटरियों के किनारे पाई जाती है। पिछले कुछ वर्षों से इसका प्रकोप सभी प्रकार के खाद्यान्न फसलों, सब्जियों एवं उद्यानों में बढ़ा है। गाजर घास पानी मिलने पर वर्ष भर फल फूल सकती है, परंतु वर्षा के मौसम में इसका अधिक अंकुरण होने पर यह भीषण खरपतवार का रूप ले लेती है। गाजर घास का पौधा 3 से 4 महीने में अपना जीवन पूरा कर लेता है। 1 वर्ष में इसकी 3 से 4 पीढ़ियां पूरी हो जाती है। जैव विविधता के लिए गाजर घास एक बहुत बड़ा खतरा बनती जा रही है। इसके कारण फसलों की उत्पादकता बहुत कम हो जाती है।
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डा. रामजीत ने बताया कि गाजर घास को नष्ट करने के लिए उसमें फूल आने से पहले जड़ से उखाड़कर कंपोस्ट एवं वर्मी कंपोस्ट बनाना चाहिए। घर के आसपास एवं संरक्षित क्षेत्रों में गेंदे के पौधे लगाकर गाजर घास के फैलाव वृद्धि को रोका जा सकता है। इस मौके पर पशुपालन वैज्ञानिक डॉ विद्यासागर, पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ प्रदीप कुमार, फसल वैज्ञानिक डॉ रत्नाकर पांडे आदि ने लोगों को जागरूक किया।
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