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Ambedkar Nagar News: मिट्टी से परंपरा की नई पहचान गढ़ रहे अशोक कुमार
Sun, 05 Oct 2025 11:04 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
Updated Sun, 05 Oct 2025 11:04 PM IST
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दीपावली पर्व के लिए मूर्ति तैयार करते अशोक कुमार।
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जितेंद्र भार्गव
जलालपुर (अंबेडकरनगर)। दीपावली का पर्व नजदीक है और इसी बीच क्षेत्र के आसीपुर गांव के कारीगर अशोक कुमार प्रजापति मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं। इनके घर में इस समय दिन-रात रंग, ब्रश और मिट्टी की महक पसरी है। अशोक कुमार बताते हैं कि मूर्तिकला उनका पुश्तैनी काम है।
पूर्वजों ने इसे शुरू किया और अब पूरा परिवार इसमें जुटा है। इस बार छोटी मूर्तियों की कीमत 80 से 500 रुपये तक रखी गई है। बड़ी मूर्तियां मांग पर बनाई जाती हैं, जिनकी कीमत 5,000 से लेकर 30,000 रुपये तक है। धनतेरस व दीपावली को देखते हुए रंगाई और फिनिशिंग का काम तेज किया गया है। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां 150 से 500 रुपये तक बिक रही हैं। हर साल दीपावली के मौके पर उनके घर से तैयार हुई मूर्तियां आसपास के क्षेत्रों के बाजारों में भी पहुंचती हैं। मिट्टी से जन्मी यह कला आज भी उनके परिवार की पहचान और जीवन का आधार है।
ऑनलाइन बाजार से झटका
अशोक ने बताया कि बीते वर्षों में ऑनलाइन खरीदारी ने उनकी कमाई पर सीधा असर डाला है। अब लोग घर बैठे ऑर्डर कर रहे हैं। ग्राहक बाजारों में कम आते हैं, जिससे पारंपरिक बिक्री प्रभावित होती है। जीएसटी कम करने की बातें जरूर होती हैं, पर कच्चा माल अभी भी पहले के दामों पर ही मिलता है। ऐसे में अगर कीमत घटाई जाए तो मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता।
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जलालपुर (अंबेडकरनगर)। दीपावली का पर्व नजदीक है और इसी बीच क्षेत्र के आसीपुर गांव के कारीगर अशोक कुमार प्रजापति मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं। इनके घर में इस समय दिन-रात रंग, ब्रश और मिट्टी की महक पसरी है। अशोक कुमार बताते हैं कि मूर्तिकला उनका पुश्तैनी काम है।
पूर्वजों ने इसे शुरू किया और अब पूरा परिवार इसमें जुटा है। इस बार छोटी मूर्तियों की कीमत 80 से 500 रुपये तक रखी गई है। बड़ी मूर्तियां मांग पर बनाई जाती हैं, जिनकी कीमत 5,000 से लेकर 30,000 रुपये तक है। धनतेरस व दीपावली को देखते हुए रंगाई और फिनिशिंग का काम तेज किया गया है। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां 150 से 500 रुपये तक बिक रही हैं। हर साल दीपावली के मौके पर उनके घर से तैयार हुई मूर्तियां आसपास के क्षेत्रों के बाजारों में भी पहुंचती हैं। मिट्टी से जन्मी यह कला आज भी उनके परिवार की पहचान और जीवन का आधार है।
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ऑनलाइन बाजार से झटका
अशोक ने बताया कि बीते वर्षों में ऑनलाइन खरीदारी ने उनकी कमाई पर सीधा असर डाला है। अब लोग घर बैठे ऑर्डर कर रहे हैं। ग्राहक बाजारों में कम आते हैं, जिससे पारंपरिक बिक्री प्रभावित होती है। जीएसटी कम करने की बातें जरूर होती हैं, पर कच्चा माल अभी भी पहले के दामों पर ही मिलता है। ऐसे में अगर कीमत घटाई जाए तो मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पाता।
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