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नौकरी त्याग आंदोलन में कूदे थे डॉ. जेतली
AmbedkarNagar
Updated Tue, 13 Aug 2013 05:34 AM IST
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अंबेडकरनगर। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सुनहरे पन्नों पर दर्ज है प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दिवंगत डॉ. गणेश कृष्ण जेतली का नाम। आजादी के आंदोलन में उन्होंने बढ़ चढ़कर योगदान दिया था। यहां तक कि उन्होंने अपने परिवार को आर्थिक संकट झेलने दिया, लेकिन चिकित्सक होते हुए भी उन्होंने सदैव आजादी के आंदोलन को ही प्राथमिकता दी। काशी के मारवाड़ी अस्पताल में अछूतों के इलाज पर प्रतिबंध के विरोध स्वरूप नौकरी को त्यागने वाले जेतली ने कई जेल यात्राएं भी की। वे आजादी के बाद अकबरपुर के पहले विधायक भी चुने गए।
उनके पुत्र पूर्व विधायक प्रियदर्शी जेतली एवं जानकारों के अनुसार तत्कालीन फैजाबाद जनपद के अकबरपुर नगर में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में 21 अगस्त 1905 को जन्मे थे डॉ. गणेशकृष्ण जेतली। पिता पंडित महादेव प्रसाद शर्मा कट्टर सनातनधर्मी व प्रसिद्ध वैद्य थे। इसके बावजूद डॉ. जेतली शुरू से ही जाति व धर्म भेद को लेकर आगे बढ़ते रहे। वे जब 15 वर्ष के थे, तो मां और 17 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। इन हालात ने ही उन्हें एक नई शक्ति व संकल्प दिलाया। वर्ष 1928 में लखनऊ मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद वे सर्जन के रूप में काशी मारवाड़ी अस्पताल में चयनित हो गए। अपने पिता की तरह ही उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र को चुना था, लेकिन उनके अंदर पीड़ित मानवता की सेवा की जो ज्वाला धधक रही थी। उसने पद पर ज्यादा दिन बने नहीं रहने दिया। दो वर्ष बाद 1931 में डॉ. जेतली ने अस्पताल की नौकरी को सिर्फ इसलिए ठोकर मार दी क्योंकि वहां अछूतों का भर्ती किया जाना मना कर दिया गया था। इसी के विरोध में उन्होंने अस्पताल की नौकरी छोड़ दी। इसी वर्ष बनारस में सांप्रदायिक विवाद हो गया। डॉ. जेतली ने बनारस की गलियों में घूम-घूमकर पीड़ित मानवता की सेवा की। बाद में उन्होंने वर्ष 1934 में बिहार में आए भूकंप में पीड़ितों की मदद का जिम्मा संभाला। उनको बाद में आजादी के आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें अन्य क्रांतिकारियों के साथ देवली नजरबंद कैंप भेजा गया। वहां उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लंबा संघर्ष छेड़ा। उसकी आवाज पूरे देश में गूंजी। आजादी के बाद डॉ. गणेशकृष्ण जेतली अकबरपुर के पहले विधायक चुने गए। उन्होंने अकबरपुर में दो शैक्षणिक संस्थाओं की भी नींव रखी थी। जिसका संचालन अपने पुत्र कर रहे हैं।
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उनके पुत्र पूर्व विधायक प्रियदर्शी जेतली एवं जानकारों के अनुसार तत्कालीन फैजाबाद जनपद के अकबरपुर नगर में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में 21 अगस्त 1905 को जन्मे थे डॉ. गणेशकृष्ण जेतली। पिता पंडित महादेव प्रसाद शर्मा कट्टर सनातनधर्मी व प्रसिद्ध वैद्य थे। इसके बावजूद डॉ. जेतली शुरू से ही जाति व धर्म भेद को लेकर आगे बढ़ते रहे। वे जब 15 वर्ष के थे, तो मां और 17 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। इन हालात ने ही उन्हें एक नई शक्ति व संकल्प दिलाया। वर्ष 1928 में लखनऊ मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद वे सर्जन के रूप में काशी मारवाड़ी अस्पताल में चयनित हो गए। अपने पिता की तरह ही उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र को चुना था, लेकिन उनके अंदर पीड़ित मानवता की सेवा की जो ज्वाला धधक रही थी। उसने पद पर ज्यादा दिन बने नहीं रहने दिया। दो वर्ष बाद 1931 में डॉ. जेतली ने अस्पताल की नौकरी को सिर्फ इसलिए ठोकर मार दी क्योंकि वहां अछूतों का भर्ती किया जाना मना कर दिया गया था। इसी के विरोध में उन्होंने अस्पताल की नौकरी छोड़ दी। इसी वर्ष बनारस में सांप्रदायिक विवाद हो गया। डॉ. जेतली ने बनारस की गलियों में घूम-घूमकर पीड़ित मानवता की सेवा की। बाद में उन्होंने वर्ष 1934 में बिहार में आए भूकंप में पीड़ितों की मदद का जिम्मा संभाला। उनको बाद में आजादी के आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें अन्य क्रांतिकारियों के साथ देवली नजरबंद कैंप भेजा गया। वहां उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लंबा संघर्ष छेड़ा। उसकी आवाज पूरे देश में गूंजी। आजादी के बाद डॉ. गणेशकृष्ण जेतली अकबरपुर के पहले विधायक चुने गए। उन्होंने अकबरपुर में दो शैक्षणिक संस्थाओं की भी नींव रखी थी। जिसका संचालन अपने पुत्र कर रहे हैं।
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