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साढ़े तीन दशक से है जिले में कांग्रेस को सफलता का इंतजार
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अंबेडकरनगर। जिले में होने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पिछले साढ़े तीन दशक से सफलता का इंतजार बना हुआ है। वर्ष 1984 में अंतिम बार कांग्रेस के टिकट पर रामपियारे सुमन सांसद चुने गए थे। इसके बाद से पार्टी को सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि कई बड़े चेहरों को भी पार्टी ने चुनाव मैदान में उतारा, इसके बावजूद वह चुनाव नहीं जीत सके। इस बार राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी के जरिए पार्टी कार्यकर्ता करिश्मे की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इसमें सफलता कितनी मिलेगी, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।
जिले में लोकसभा चुनाव की शुरुआत वर्ष 1952 में हुई थी। तब मौजूदा अंबेडकरनगर जनपद का अस्तित्व नहीं था। इस क्षेत्र की एक संसदीय सीट अकबरपुर सुरक्षित तत्कालीन फैजाबाद जनपद में आती थी। अकबरपुर सुरक्षित सीट पर हुए पहले चुनाव में कांग्रेेस के टिकट पर पन्नालाल चुनाव जीतने में सफल हुए थे। कांग्रेस के ही टिकट पर वे इसके बाद 1957 और 1962 में भी सांसद चुन लिए गए।
कांग्रेस पार्टी ने सफलता का क्रम जारी रखते हुए 1967 व 1971 में भी इस सीट पर जीत दर्ज की। दोनों बार कांग्रेस के टिकट पर रामजी राम सांसद निर्वाचित हुए। वर्ष 1977 की कांग्रेस विरोधी लहर में यह सीट भी कांग्रेस से छिन गई। तब यहां जनता पार्टी के टिकट पर मंगलदेव विशारद सांसद बने। 1980 में हुए चुनाव में कांग्रेस को फिर झटका लगा। जनता पार्टी सेकुलर के टिकट पर रामअवध सांसद बनने में कामयाब रहे।
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दो चुनाव के अंतराल के बाद वर्ष 1984 में कांग्रेस के लिए इस सीट पर फिर से खुशियां लौटीं। तब रामपियारे सुमन ने बतौर कांग्रेस प्रत्याशी जीत का परचम लहराया। इसके बाद से हुए चुनावों में कांग्रेस जीत के करीब तक नहीं पहुंच सकी। हालांकि पार्टी ने हर तरह के दांव आजमाए, लेकिन सफलता नहीं मिली।
पूर्व राज्यपाल माताप्रसाद, तत्कालीन कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष राजबहादुर एवं बहुचर्चित फूलनदेवी के पति उमेद निषाद को यहां से आजमाया गया। इन कद्दावर नेताओं के बूते भी पार्टी यहां जीत दर्ज नहीं कर पाई। वर्ष 2009 में अकबरपुर सीट परिसीमन के बाद अंबेडकरनगर में तब्दील हो गई।
सुरक्षित की बजाए यह सीट सामान्य श्रेणी की कर दी गई। इस परिवर्तन का भी कोई लाभ कांग्रेस के लिए सामने नहीं आ सका। ऐसे में लगभग साढ़े तीन दशक से पार्टी को सफलता का इंतजार बना हुआ है। पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रियंका के करिश्माई नेतृत्व के भरोसे इस बार उम्मीद बढ़ी है। उनकी यह उम्मीद कहां तक पहुंचेगी, यह आने वाले वक्त की बात है।
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जिले में लोकसभा चुनाव की शुरुआत वर्ष 1952 में हुई थी। तब मौजूदा अंबेडकरनगर जनपद का अस्तित्व नहीं था। इस क्षेत्र की एक संसदीय सीट अकबरपुर सुरक्षित तत्कालीन फैजाबाद जनपद में आती थी। अकबरपुर सुरक्षित सीट पर हुए पहले चुनाव में कांग्रेेस के टिकट पर पन्नालाल चुनाव जीतने में सफल हुए थे। कांग्रेस के ही टिकट पर वे इसके बाद 1957 और 1962 में भी सांसद चुन लिए गए।
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कांग्रेस पार्टी ने सफलता का क्रम जारी रखते हुए 1967 व 1971 में भी इस सीट पर जीत दर्ज की। दोनों बार कांग्रेस के टिकट पर रामजी राम सांसद निर्वाचित हुए। वर्ष 1977 की कांग्रेस विरोधी लहर में यह सीट भी कांग्रेस से छिन गई। तब यहां जनता पार्टी के टिकट पर मंगलदेव विशारद सांसद बने। 1980 में हुए चुनाव में कांग्रेस को फिर झटका लगा। जनता पार्टी सेकुलर के टिकट पर रामअवध सांसद बनने में कामयाब रहे।
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दो चुनाव के अंतराल के बाद वर्ष 1984 में कांग्रेस के लिए इस सीट पर फिर से खुशियां लौटीं। तब रामपियारे सुमन ने बतौर कांग्रेस प्रत्याशी जीत का परचम लहराया। इसके बाद से हुए चुनावों में कांग्रेस जीत के करीब तक नहीं पहुंच सकी। हालांकि पार्टी ने हर तरह के दांव आजमाए, लेकिन सफलता नहीं मिली।
पूर्व राज्यपाल माताप्रसाद, तत्कालीन कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष राजबहादुर एवं बहुचर्चित फूलनदेवी के पति उमेद निषाद को यहां से आजमाया गया। इन कद्दावर नेताओं के बूते भी पार्टी यहां जीत दर्ज नहीं कर पाई। वर्ष 2009 में अकबरपुर सीट परिसीमन के बाद अंबेडकरनगर में तब्दील हो गई।
सुरक्षित की बजाए यह सीट सामान्य श्रेणी की कर दी गई। इस परिवर्तन का भी कोई लाभ कांग्रेस के लिए सामने नहीं आ सका। ऐसे में लगभग साढ़े तीन दशक से पार्टी को सफलता का इंतजार बना हुआ है। पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रियंका के करिश्माई नेतृत्व के भरोसे इस बार उम्मीद बढ़ी है। उनकी यह उम्मीद कहां तक पहुंचेगी, यह आने वाले वक्त की बात है।