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उपाय: दिल्ली में कृत्रिम बारिश की तैयारी, दिवाली और छठ के बाद होगा प्रयोग; पिछले साल हुई थी सरकार की किरकिरी

Fri, 06 Nov 2026 03:29 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 06 Nov 2026 03:29 AM IST
सार

पिछले साल दो दौर के प्रयोग के बावजूद बारिश नहीं होने और सरकार की किरकिरी के बाद इस बार सरकार सार्वजनिक रूप से अभियान की घोषणा करने से बच रही है।

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विस्तार

दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश कराने की योजना पर सरकार ने फिर काम शुरू कर दिया है। पिछले 15 दिनों में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के आसपास क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल हुए हैं। दिवाली और छठ के बाद कुछ और प्रयोग किए जाने की संभावना है। हालांकि, पिछले साल दो दौर के प्रयोग के बावजूद बारिश नहीं होने और सरकार की किरकिरी के बाद इस बार सरकार सार्वजनिक रूप से अभियान की घोषणा करने से बच रही है।

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दिल्ली सरकार ने पिछले साल सर्दियों में प्रदूषण से निपटने के लिए आईआईटी कानपुर के सहयोग से क्लाउड सीडिंग परियोजना शुरू की थी। इसके लिए पर्यावरण विभाग और आईआईटी कानपुर के बीच समझौता हुआ था। अक्तूबर में दो दौर के ट्रायल किए गए। हरएक प्रयोग में सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड वाले चार-चार रासायनिक फ्लेयर छोड़े गए थे। इसके बावजूद बारिश नहीं हुई।
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बाद में सरकार ने दावा किया था कि बारिश नहीं होने के बावजूद लक्षित क्षेत्रों में प्रदूषणकारी कणों का स्तर घटा था। पिछले साल दिल्ली सरकार ने क्लाउड सीडिंग के परीक्षणों के लिए करीब 3.21 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया था। एक बार क्लाउड सीडिंग की उड़ान या परीक्षण पर लगभग 55 लाख रुपये तक का खर्च आता है। विशेषज्ञों की मानें तो सर्दियों के मौसम में यदि करीब 12 बार क्लाउड सीडिंग की जाती है, तो इसका कुल खर्च लगभग 25 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
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अनुकूल बादल और नमी होना जरूरी
क्लाउड सीडिंग मौसम में कृत्रिम बदलाव की तकनीक है। इसमें अनुकूल बादलों के भीतर सिल्वर आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड जैसे पदार्थ छोड़े जाते हैं। इससे पानी की बूंदें या बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया तेज होती है और बारिश की संभावना बढ़ती है। हालांकि, इसके लिए वातावरण में पर्याप्त नमी और अनुकूल बादलों का होना जरूरी है। ऐसे में कृत्रिम बारिश प्रदूषण नियंत्रण का स्थायी समाधान नहीं, बल्कि अनुकूल मौसमी परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाने वाला एक अस्थायी उपाय है।

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