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आप की हसरतों पर पानी फेर रहीं कार कंपनियां

Thu, 19 May 2016 01:48 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 19 May 2016 01:48 AM IST
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You were ruined Hsrton Car Companies
स्वचालित कार - फोटो : Google
अपनी इच्छा और उम्मीदों से आपने जो कार खरीदी है, जरूरी नहीं कि वह हर तरह से सुरक्षित ही हो क्योंकि मारुति, रेनॉ, महिंद्रा और ह्यूंडई जैसी नामीगिरानी कंपनियों की कारों के कई मॉडल सवालों के घेरे में आ गए हैं। इनकी जिस कार को आप बेहद सुरक्षित मानकर सड़कों पर दौड़ा रहे हैं, क्रैश टेस्ट में वह फेल हो गई हैं। स्पष्ट है कि इन कंपनियों की कारों के कई मॉडल सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं हैं।
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इलाहाबाद जैसे शहर में आम आदमी अपनी हैसियत के हिसाब से पांच-छह लाख रुपये या फिर अधिकतम नौ-दस लाख रुपये तक की कार को तरजीह देता है। शहर में इस श्रेणी की कारें बड़ी संख्या में लोगों के पास हैं। कार खरीदने के पहले वह उसमें हर चीज ठोक बजाकर देख लेना चाहता है क्योंकि वह यह मानकर चलता है कि अगले आठ-दस वर्ष उसकी सवारी करनी है। शोरूमों में कार की खूबियां बताकर ग्राहकों को हर तरह से संतुष्ट भी किया जाता है। कार लेने के बाद लोग अपनी सुविधा के अनुसार चलाते हैं। अक्सर परिवार के साथ शहर के बाहर भी जाते है। इस दौरान हाई-वे पर 70-80 से लेकर सौ किलोमीटर प्रतिघंटा तक की रफ्तार से कारें दौड़ाई जाती हैं क्योंकि लोग मानते हैं कि वे जिस कार में बैठें हैं, हर तरह से सुरक्षित है लेकिन कारों की सुरक्षा को लेकर सच्चाई इसके विपरीत है।
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कई बार इन कारों से बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। पता चलता है कि कार में सुरक्षा के लिए एयर बैग तो लगे हैं लेकिन दुर्घटना के वक्त खुले ही नहीं, या फिर कार की बॉडी इतनी हल्की थी कि दूसरे वाहन से टक्कर होते ही, उसके परखच्चे उड़ गए। ऐसे में सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लाजिमी भी हैं। देश में सबसे ज्यादा कारें मारुति कंपनी की बिकती हैं। इलाहाबाद की सड़कों पर भी हर दूसरी या तीसरी कार मारुति की ही दिख जाएगी लेकिन व्हीकल सेफ्टी ग्रुप ग्लोबल एनसीएपी के क्रैश टेस्ट में मारुति सेलेरियो फेल हो गई।
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महिंद्रा की स्कार्पियो, जिसे लोग बेहद मजबूत मानकर खरीदते हैं और देखने में भी भारी-भरकम है, वह भी क्रैश टेस्ट पास नहीं कर सकी।  रेनॉ की क्विड और ह्यूंडई की इयॉन कार का भी यही हाल है जो क्रैश टेस्ट में फेल हो गईं। संस्था ने फिलहाल अभी इन कारों की ही क्रैश टेस्टिंग की है। बड़ी बात नहीं कि आगे अन्य नामीगिरानी कंपनियों की कारें भी क्रैश टेस्ट में फेल हो जाएं। इन कंपनियों की कार बेचने वाले स्थानीय डीलर इस बारे में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।

‘छोटी कारें बनाने वाली कंपनियां तय सुरक्षा मानकों की भी अनदेखी करती हैं। पांच-छह लाख से आठ लाख रुपये तक की अधिकतर कारें बिना एयरबैग के होती हैं। पिछले कुछ समय में तमाम कंपनियों ने इस श्रेणी की कारों की बॉडी को भी पहले से हल्का कर दिया है। इसकी वजह से बड़ी दुर्घटना तो दूर हल्की टक्कर या हाथ के दबाव से भी बॉडी दब जाती है। ऐसे में क्रैश टेस्ट में फेल होना लाजिमी है। 

0 रितेश अग्रवाल, ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट

‘70-80 किलो मीटर प्रतिघंटा रफ्तार से चल रही कार के दुर्घटनाग्रस्त होने पर ही एयरबैग खुलते हैं। कार के डोर में साइड इम्पेक्ट बीम लगी होती है, जो दुर्घटना में सुरक्षा करती है। कार की बॉडी में भारी मेटेरियल इस्तेमाल करने पर पॉवर टू वेट रेसियो घट जाएगा। इसका सीधा असर एवरेज।’ 
0 रौनक शरदा, ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट
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