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High Court : मानसिक रूप से अक्षम कर्मचारी का वीआरएस आवेदन लंबित आरोपों के बावजूद निपटाया जाए
Fri, 14 Nov 2025 01:01 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 14 Nov 2025 01:01 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी चिकित्सकीय रूप से विभागीय जांच का सामना करने में असमर्थ हो तो उसके विरुद्ध लंबित कदाचार के आरोप स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) आवेदन पर विचार में बाधक नहीं बन सकते।
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अदालत(सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी चिकित्सकीय रूप से विभागीय जांच का सामना करने में असमर्थ हो तो उसके विरुद्ध लंबित कदाचार के आरोप स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) आवेदन पर विचार में बाधक नहीं बन सकते। न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह फैसला दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड, अलीगढ़ की विशेष अपील पर दिया है।
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अलीगढ़ निवासी याची मनोहर सिंह विद्युत विभाग में तकनीशियन ग्रेड-द्वितीय के पद पर कार्यरत था। संबंधित कर्मचारी को विभाग ने बर्खास्त कर बड़ी वसूली का आदेश दिया था। विभागीय जांच के खिलाफ याचिका दाखिल की। उच्च न्यायालय ने पूर्व में बर्खास्तगी निरस्त कर निर्देश दिया था कि केवल तभी पुनः विभागीय कार्यवाही हो, जब मेडिकल बोर्ड यह प्रमाणित करे कि कर्मचारी जांच का सामना करने योग्य है। बाद में मेडिकल बोर्ड ने रिपोर्ट दी कि कर्मचारी को कई ब्रेन स्ट्रोक के कारण गंभीर शारीरिक और मानसिक अक्षमता है। वह न संवाद कर सकते हैं और न ही कार्यवाही को समझ सकते हैं।
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इस पर कर्मचारी की पत्नी ने जुलाई 2024 में मेडिकल आधार पर वीआरएस के लिए आवेदन किया, जिस पर विभाग ने कोई निर्णय नहीं लिया। इस पर दायर याचिका में एकल पीठ ने विभाग को आदेश दिया कि आरोपों की परवाह किए बिना आवेदन पर निर्णय करें। विभाग ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी। इस दौरान कोई के निर्देश पर याची की एम्स में जांच हुई और रिपोर्ट में कर्मचारी की स्थायी अक्षमता की पुष्टि हुई। खंडपीठ ने कहा कि जब जांच संभव ही नहीं है तो विभागीय कार्रवाई का औचित्य समाप्त हो जाता है। अतः विभाग को चार सप्ताह के भीतर कर्मचारी का वीआरएस आवेदन निपटाना होगा।
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