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वेदों से न्याय के सिद्धांत अपनाना जरूरी
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 20 Mar 2016 01:58 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष ने कहा है कि न्याय प्रक्रिया में समानता का व्यवहार जरूरी है। इसलिए भेदभाव नहीं करना चाहिए। प्राचीन भारत में न्याय, वेदों के सिद्धांत से ही संचालित थे। मौजूदा न्यायालयों को भी वेदों में वर्णित उन न्यायिक सिद्धांतों को अपनाना चाहिए क्योंकि राजा की तरह ही न्यायालयों पर भी धर्म का मान्य बंधन है। ऐसे में न्यायालयों का दायित्व बनता है कि वे उन सिद्धांतों का परिपालन करें।
श्री राधा कृष्ण वेद विद्यालय एवं महर्षि संदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान की ओर से सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में आयोजित ‘वैदिक कान्सेप्ट ऑफ लॉ एंड ज्यूरिसप्रुडेंसी’ विषय सेमिनार के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति घोष ने कहा, न्याय के सिद्धांत का उद्देश्य सत्य की खोज है और सत्य सदैव अपने भीतर और बाहर होता है। बस इसे खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।
बतौर अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति डी.एम.धर्माधिकारी ने कहा, हमें न्यायिक प्रक्रिया में दूसरे देशों के न्याय के सिद्धांतों को लेने की जरूरत नहीं थी। अंग्रेजों ने दूसरे देशों के न्यायिक सिद्धांतों को हम पर लाद दिया, जबकि उसकी कोई जरूरत नहीं है। हमारे वैदिक सिद्धांतों का स्वरूप वैश्विक है, इसीलिए इसे अपनाने पर परिवार टूट रहे हैं। जंगलों में रहकर भी हमारे हमारे ऋषि-मुनि वैश्विक दृष्टि रखते थे। वे अधिकारों की बजाय कर्तव्यों की चर्चा करते हैं। पश्चिमी संस्कृति भौतिकवादी है, इसका सरोकार मानवीय मूल्यों से नहीं है, जबकि वैदिक संस्कृति पूरी तरह आध्यात्मिक है, हमें इसी पर आगे बढ़ना चाहिए। आज जरूरत है कि धर्मगुरु धर्म को नए परिप्रेक्ष्य में स्थापित करें।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्णा, न्यायमूर्ति एमके शर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान का कहना था कि वैदिक काल में कोई नियम कानून नहीं था। रीति-रिवाजों से ही सारे काम होते थे। धर्म ही समाज में मुख्य भूमिका निभाते थे। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफड़े ने भी अपने विचार रखे। स्वागत कार्यक्रम के संरक्षक न्यायमूर्ति सुधीर नारायण, संचालन बीके श्रीवास्तव और धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के ईसी अग्रवाल ने किया। मोनिका शुक्ला, कविता शुक्ला, अनूप त्रिपाठी ने वैदिक राष्ट्रगान प्रस्तुत किया। संस्थान की ओर से शाल ओढ़ाने के बाद स्मृति चिह्न देकर अतिथियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में ओम प्रकाश अग्रवाल, ईसी अग्रवाल, प्रतापानंद झा, राधाकांत ओझा, सचिव अरुण कुमार आदि मौजूद थे। उद्घाटन सत्र के बाद तकनीकी सत्र चला।
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श्री राधा कृष्ण वेद विद्यालय एवं महर्षि संदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान की ओर से सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में आयोजित ‘वैदिक कान्सेप्ट ऑफ लॉ एंड ज्यूरिसप्रुडेंसी’ विषय सेमिनार के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति घोष ने कहा, न्याय के सिद्धांत का उद्देश्य सत्य की खोज है और सत्य सदैव अपने भीतर और बाहर होता है। बस इसे खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।
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बतौर अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति डी.एम.धर्माधिकारी ने कहा, हमें न्यायिक प्रक्रिया में दूसरे देशों के न्याय के सिद्धांतों को लेने की जरूरत नहीं थी। अंग्रेजों ने दूसरे देशों के न्यायिक सिद्धांतों को हम पर लाद दिया, जबकि उसकी कोई जरूरत नहीं है। हमारे वैदिक सिद्धांतों का स्वरूप वैश्विक है, इसीलिए इसे अपनाने पर परिवार टूट रहे हैं। जंगलों में रहकर भी हमारे हमारे ऋषि-मुनि वैश्विक दृष्टि रखते थे। वे अधिकारों की बजाय कर्तव्यों की चर्चा करते हैं। पश्चिमी संस्कृति भौतिकवादी है, इसका सरोकार मानवीय मूल्यों से नहीं है, जबकि वैदिक संस्कृति पूरी तरह आध्यात्मिक है, हमें इसी पर आगे बढ़ना चाहिए। आज जरूरत है कि धर्मगुरु धर्म को नए परिप्रेक्ष्य में स्थापित करें।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्णा, न्यायमूर्ति एमके शर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान का कहना था कि वैदिक काल में कोई नियम कानून नहीं था। रीति-रिवाजों से ही सारे काम होते थे। धर्म ही समाज में मुख्य भूमिका निभाते थे। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफड़े ने भी अपने विचार रखे। स्वागत कार्यक्रम के संरक्षक न्यायमूर्ति सुधीर नारायण, संचालन बीके श्रीवास्तव और धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के ईसी अग्रवाल ने किया। मोनिका शुक्ला, कविता शुक्ला, अनूप त्रिपाठी ने वैदिक राष्ट्रगान प्रस्तुत किया। संस्थान की ओर से शाल ओढ़ाने के बाद स्मृति चिह्न देकर अतिथियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में ओम प्रकाश अग्रवाल, ईसी अग्रवाल, प्रतापानंद झा, राधाकांत ओझा, सचिव अरुण कुमार आदि मौजूद थे। उद्घाटन सत्र के बाद तकनीकी सत्र चला।