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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   tradition of Kumbh Mela settlement is centuries old, all the Akharas got land in Prayag in the 18th century

Mahakumbh : सदियों पुरानी है कुंभ मेला बसावट की परंपरा, 18वीं सदी में प्रयाग में सभी अखाड़ों को मिली थी भूमि

Sat, 21 Dec 2024 04:04 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 21 Dec 2024 04:04 PM IST
सार

18वीं शताब्दी में सभी अखाड़ों के लिए भूमि आवंटन के उल्लेख मिलते हैं। विश्व के इस सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन की महिमा का वर्णन वेदों में तो मिलता ही है, दशनाम नागा संन्यासी नामक पुस्तक में महंत लालपुरी ने भी इसका विस्तार से उल्लेख किया है। वह लिखते हैं कि आज यह सांस्कृतिक आयोजन भले ही व्यावसायिक रूप ले चुका है, लेकिन पहलेे यहां की भूमि का आवंटन सिर्फ यज्ञ-अनुष्ठानों के लिए ही होता था।

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tradition of Kumbh Mela settlement is centuries old, all the Akharas got land in Prayag in the 18th century
महाकुंभ। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

संगम तट पर कुंभ की संस्कृति इतिहास से पुरातन और परंपराओं से भी पुरानी है। कुंभ में यहां फूस-कपड़े की छावनियां बनाकर कल्पवास और जप-तप-ध्यान करने की सदियों पुरानी रीति रही है। कुंभ-महाकुंभ का कारवां मुगल काल में भी नहीं थमा। 18वीं शताब्दी में सभी अखाड़ों के लिए भूमि आवंटन के उल्लेख मिलते हैं। विश्व के इस सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन की महिमा का वर्णन वेदों में तो मिलता ही है, दशनाम नागा संन्यासी नामक पुस्तक में महंत लालपुरी ने भी इसका विस्तार से उल्लेख किया है। वह लिखते हैं कि आज यह सांस्कृतिक आयोजन भले ही व्यावसायिक रूप ले चुका है, लेकिन पहलेे यहां की भूमि का आवंटन सिर्फ यज्ञ-अनुष्ठानों के लिए ही होता था।

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उन्होंने कुंभ के गुप्तकालीन आयोजनों की भी चर्चा की है। लिखा है, गुप्तकाल में पुराण और ज्योतिष गणना को आधार मानकर कुंभ पर्व के स्नान का निर्णय किया जाता था। कई इतिहासविद सम्राट हर्षवर्धन के काल से संगम पर कुंभ के आयोजन की बात करते हैं, लेकिन यही बात अंतिम नहीं है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा है कि हर छठवें वर्ष संगम तट पर सम्राट हर्षवर्धन की ओर से कुंभ का आयोजन होता था। सम्राट यहां धन-वस्त्र ही नहीं, शासन केे प्रतीक चिह्न राजदंड को भी दान कर देते थे। फिर, बहन राज्यश्री से चीवर (वस्त्र का टुकड़ा) मांगकर पहनते और अपने राज्य कन्नौज लौट जाते थे।
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महंत लालपुरी की पुस्तक में 1840 में प्रयाग में हुए अर्धकुंभ का विवरण भी दिया गया है। वह लिखते हैं कि तब सभी अखाड़ों की बसावट के लिए भूमि आवंटित की गई थी। इसमें देश भर से लोग आए थे। बड़ी संख्या में संतों-भक्तों ने गंगा तट पर जप, तप, ध्यान शुरू कर दिया था। अखाड़ों की छावनियों में ध्वजाएं फहराई गई थीं। ध्वज दंड के पीछे ऊंचे स्तूप बनाए गए थे। स्तूपों की चोटी पर कहीं शंख तो कहीं पुष्प पात्र और देवी-देवताओं की मूर्तियां भी उकेरी गई थीं।
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कुछ जगह शामियाना भी लगाया गया था, जिसके चारों कोने लटक रहे थे।तब निर्वाणी अखाड़े का संन्यासी सात हाथियों पर लगे सुसज्जित हौदों पर सवार होकर शाही स्नान के लिए निकले थे। 1882 के कुंभ पर्व के समय सभी अखाड़ों को ब्रिटिश हुकूमत ने आमंत्रित किया था। तब भी अखाड़ों की बसावट के लिए भूमि आवंटित की गई थी।

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