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हाईकोर्ट : किरायेदार और मकान मालिक बीच लंबित मुकदमे में तीसरे पक्षकार की दखल जरूरी नहीं

Sat, 12 Sep 2026 03:42 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 12 Sep 2026 03:42 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदार और मकान मालिक के बीच लंबित बेदखली के मुकदमे में किसी तीसरे पक्षकार की दखल जरूरी नहीं है। भले ही तीसरा पक्षकार संबंधित मकान पर खुद मालिकाना हक का दावा करता हो।

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Third-party intervention is not necessary in a pending dispute between a tenant and a landlord.
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदार और मकान मालिक के बीच लंबित बेदखली के मुकदमे में किसी तीसरे पक्षकार की दखल जरूरी नहीं है। भले ही तीसरा पक्षकार संबंधित मकान पर खुद मालिकाना हक का दावा करता हो। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने अलीगढ़ से जुड़े मामले में तीसरे व्यक्ति को मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की मांग खारिज कर दी।

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मामला दुकान की बेदखली और किराये की बकाया राशि से संबंधित था। वादी ने पांच सितंबर 2017 की बिक्री विलेख के आधार पर दुकान पर अपना मालिकाना हक बताते हुए किरायेदार से दुकान खाली कराने की मांग की थी। वहीं, याची ने खुद को मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की मांग करते हुए दावा किया कि उसके पास 19 जून 2017 का बिक्री विलेख है। आरोप था कि बाद की बिक्री विलेख उसके साथ धोखाधड़ी करके हासिल की गई। इस बिक्री विलेख को निरस्त कराने के लिए उसने वर्ष 2018 में अलग से मूल वाद भी दाखिल कर रखा है, जो अभी लंबित है।

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किरायेदार के लिखित बयान को बनाया था आधार

याची की ओर से दलील दी गई कि किरायेदार ने अपने लिखित बयान में उसे मकान मालकिन बताया है। ऐसे में बेदखली के मुकदमे में होने वाला कोई भी निष्कर्ष उसके अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए उसे मुकदमे का पक्षकार बनाया जाना जरूरी है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि याची के मालिकाना हक के दावे का फैसला करने के लिए दोनों बिक्री विलेखों की वैधता, उनके निष्पादन और कानूनी प्रभाव के अलावा धोखाधड़ी व गलत बयानी के आरोपों की भी जांच करनी होगी। ये सभी प्रश्न पहले से लंबित दीवानी मुकदमे में तय किए जाने हैं।

कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत पक्षकार बनाने की प्रक्रिया का इस्तेमाल इस उद्देश्य से नहीं किया जा सकता कि किसी अलग मालिकाना विवाद को लघुवाद न्यायालय के सामने लाकर वहां उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से फैसला कराया जाए। कोर्ट ने कहा कि पक्षकार बनाए जाने का प्रश्न इस बात पर निर्भर करता है कि मुकदमे में वास्तविक विवाद के प्रभावी और पूर्ण निपटारे के लिए उस व्यक्ति की मौजूदगी आवश्यक है या नहीं। केवल संपत्ति में स्वतंत्र अधिकार का दावा करना किसी व्यक्ति को अपने आप जरूरी पक्षकार नहीं बना देता।
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