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मच्छर हजम कर रहे करोड़ों, नहीं थम रहा मलेरिया

Mon, 25 Apr 2016 01:03 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Mon, 25 Apr 2016 01:03 AM IST
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There are millions of mosquitoes digest , I am not the first malaria
hospital
एक छोटा सा मच्छर आदमी की नींद हराम करने के लिए काफी है। दिन भर का थका-मांदा आदमी सोने की कोशिश करे और उसके कानों पर मच्छर भनभनाने लगें तो फिर नींद गायब होना लाजिमी है। मच्छरों के काटने के डर से नींद खराब हो जाती है। लोगों के इसी डर का फायदा मच्छर मारने का उत्पाद बनाने वाली कंपनियों ने खूब उठाया। ऐसा हर उत्पाद मुनाफे का सौदा साबित हुआ। लोगों को न मच्छरों और न ही मलेरिया से मुक्ति मिली लेकिन मच्छरों को मारने वाले उत्पादों का धंधा चमक उठा।
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मच्छरों से बचाने के लिए गुडनाइट, ऑलआउट, मॉर्टिन, मैक्सो जैसी आधा दर्जन कंपनियां रीफिल (लिक्विड), क्वायल बनाकर बेच रही हैं। मच्छरों की तरह इसका धंधा भी सदाबहार हो गया है। इलाहाबाद और उसके आसपास के जिलों में अकेले रीफिल और क्वायल का धंधा करोड़ों रुपये का हो गया है। सिविल लाइंस स्थित एक बड़े जनरल मर्चेंट की दुकान के संचालक नितिन अग्रवाल, चौक के कारोबारी तरुण सहित शहर के आधा दर्जन से अधिक कारोबारियों का मानना है कि  मच्छरों से मुक्ति दिलाने वाले उत्पादों का सालाना कारोबार तकरीबन 20 करोड़ रुपये के आसपास है।
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इसके अलावा लोग हिट के स्प्रे, कछुआ छाप अगरबत्ती, ओडोमास जैसी क्रीम का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। जुलाई से नवंबर तक और जनवरी से मार्च तक के बीच मच्छरों को मारने वाले उत्पादों का कारोबार ज्यादा हो जाता है। इस समय नमी अधिक होने से मच्छर ज्यादा और तेजी से पनपते हैं। गांव के मुकाबले शहर में ऐसे उत्पादों का कारोबार अधिक है। गांवों में लोग मच्छरों को भगाने के लिए फिलहाल नीम की पत्ती जलाने जैसे घरेलू नुस्खे और मच्छरदानी का इस्तेमाल करते हैं लेकिन शहरों में लोग रीफिल, क्वायल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। धीरे-धीरे मच्छर ऐसे उत्पादों के आदि हो जाते हैं। इसके बाद ज्यादा असरकारक बनाने के लिए इन उत्पादों की क्षमता बढ़ाई जाती है जो आदमी की प्रतिरोधक क्षमता के लिए और भी ज्यादा घातक होती है।
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मलेरिया के नाम पर करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा करने वाले स्वास्थ्य विभाग के पास मलेरिया से संबंधित पूरे आंकड़े ही नहीं हैं। अस्पतालों में आने वाले मलेरिया के मरीजों की संख्या का सही आकलन विभाग के पास नहीं मौजूद है जबकि इसके लिए मलेरिया यूनिट स्थापित की गई है। विभाग के पास जिले के सामुदायिक, प्राथमिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, बेली, कॉल्विन में आने वाले मरीजों का आंकड़ा है जबकि जिले में एक हजार से अधिक छोटे-बड़े अन्य अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिक पर भी मलेरिया के मरीज उपचार को पहुंच रहे हैं।

मंडल के सबसे बड़े स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय, फाफामऊ स्थित राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, हंडिया स्थित आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हिम्मतगंज स्थित यूनानी मेडिकल कॉलेज में भी इसके मरीज उपचार कराने को आते हैं लेकिन मलेरिया विभाग इनके आंकड़े नहीं एकत्र करता।  मलेरिया विभाग से लोगों ने कई बार शिकायत की लेकिन उसका कोई फर्क नहीं पड़ा। जिला मलेरिया अधिकारी डॉ.केपी द्विवेदी मानते हैं कि इस बारे में सही आंकड़ें उपलब्ध नहीं हैं।


मच्छरों को मारने के लिए स्वास्थ्य विभाग हर वर्ष लाखों रुपये खर्च करता है। पिछले वर्ष इसके लिए 50 लाख रुपये तक खर्च कर दिए गए। इसके अलावा नगर निगम भी फागिंग कराता है। बावजूद इसके शहर में मच्छर कम नहीं हो रहे हैं। पुराने शहर के इलाके जैसे दारागंज, अल्लापुर, कीडगंज, मुट्ठीगंज, चौक, तेलियरगंज, कर्नलगंज, कटरा, मीरापुर, लीडररोड, खुसरोबाग सहित दर्जनों ऐसे मुहल्ले हैं जहां से मलेरिया के मरीज सबसे ज्यादा अस्पताल पहुंचते हैं।
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