फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   The political existence of the left declined with time, now limited to movements.

Left Party : समय के साथ अस्त होता गया वामपंथ का सियासी वजूद, अब आंदोलनों में सिमटी

Wed, 27 Mar 2024 01:58 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 27 Mar 2024 01:58 PM IST
सार

2019 में सीपीआई ने इलाहाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। पार्टी के उम्मीदवार गिरिधर गोपाल त्रिपाठी 10,403 मत प्राप्त कर चौथे स्थान पर रहे। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।

विज्ञापन
The political existence of the left declined with time, now limited to movements.
वामपंथी दल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संगमनगरी की राजनीति में वामपंथी विचारधारा ने लंबे समय तक सियासत के दंगल में अपना दमखम दिखाया। कई दशक तक चुनावों में असरदार रहने वाले वामपंथी दलोंं का दायरा शहर में सिमटता रहा।1957 के विधानसभा चुनाव में पहली बार वामपंथी दल सीपीआई ने शहर दक्षिणी से जेडए अहमद को प्रत्याशी बनाया, जिसमें वह दूसरे स्थान पर रहे।

विज्ञापन


सामने कांग्रेस के उम्मीदवार विश्वंभर नाथ पांडेय (बाद में उड़ीसा के राज्यपाल रहे) थे, जबकि सप्रास से छुन्नन गुरु उम्मीदवार थे। इनका नामांकन साजिशन खारिज करा दिया गया। विश्वंभर नाथ ने जीत गए, लेकिन छुन्नन गुरु की याचिका पर न्यायालय ने चुनाव निरस्त कर दिया। उपचुनाव में छुन्नन गुरु ने सीपीआई से समर्थन लिया और जीत हासिल की।
विज्ञापन


इसके बाद वामपंथी दलों का प्रभाव मजदूर, आदिवासी व महिलाओं के आंदोलनों में दिखता रहा। 1964 में चीन-भारत की लड़ाई के बाद पार्टी में मतभेद हुआ। साथ हीशहर में भी सीपीआई व सीपीएम के अलग-अलग कार्यालय हो गए। सीपीएम ने मेजा (अब कोरांव) विधानसभा सीट पर दमदारी से चुनाव लड़ा। उस वक्त जिला सचिव रहे हरिश्चंद्र द्विवेदी के नेतृत्व में पार्टी के उम्मीदवार रामकृपाल ने 1996 और 2002 में लगातार दो बार विधानसभा चुनाव जीते।
विज्ञापन
विज्ञापन


नसीम अंसारी के नेतृत्व में सीपीआई ने छह सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। बाद में सोरांव क्षेत्र में सीपीएम की ओर से राजनाथ पटेल और इंद्रदेव सरोज जिला पंचायत सदस्य चुने गए। 2019 में सीपीआई ने इलाहाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। पार्टी के उम्मीदवार गिरिधर गोपाल त्रिपाठी 10,403 मत प्राप्त कर चौथे स्थान पर रहे। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।

आंदोलनों की कहलाती थी पार्टी

वामपंथी संगठनों के संघर्षों व आंदोलन की लंबी परंपरा है। यमुनापार के पठार, गंगापार, सिराथू आदि क्षेत्रों में मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, बंधुआ मजदूरों के हक के लिए लड़ाई लड़ने के नाम पर वामपंथी पार्टियों को जाना जाता है। मेजा (अब कोरांव) के देवरी बरहा के आदिवासियों पर पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ कलेक्ट्रेट में 30 दिनों तक दिन रात धरना-प्रदर्शन हुआ, जिसमें हजारों लोगों ने कलक्ट्रेट से नैनी जेल तक मार्च निकालकर गिरफ्तारी दी। जेल में जगह न होने पर 1700 लोग ही गिरफ्तार किए गए। 1977-78 में महंगाई, बेरोजगारी के मुद्दे पर आंदोलन चला, जिसमें 300 लोग गिरफ्तार हुए। इसकी अगुआई प्रदेश सचिव शंकर दयाल तिवारी ने की।

इविवि छात्रसंघ में भी रहा कब्जा

इविवि में अनुग्रह नारायण सिंह दो बार स्वतंत्र चुनाव लड़े, लेकिन बाद में एसएफआई से अध्यक्ष चुने गए थे। वरिष्ठ अधिवक्ता केके राय पीएसओ, पूर्व उपाध्यक्ष धीरेंद्र सिंह, वीरभद्र प्रताप सिंह, लाल बहादुर सिंह, अखिलेंद्र प्रताप सिंह, कुमुदनी पति भी पदाधिकारी निर्वाचित हुई। केंद्रीय दर्जा मिलने के बाद शालू यादव, नीलू जायसवाल और अंकुश ने चुनाव जीता।

1936 में खुला था कार्यालय
सिविल लाइंस के रहने वाले सज्जाद जहीर के आवास पर एक दिसंबर, 1935 को प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की नींव पड़ी थी। फिलहाल, यह सेंट्रल एक्साइज दफ्तर का हिस्सा है। इसके ठीक अगले वर्ष 1936 में कम्युनिस्ट पार्टी की नींव शहर में पड़ी। जानसेनगंज में पार्टी का कार्यालय खोला गया।

निकले कई दिग्गज नेता, जिन्होंने दिखाई दिशा

जेडए अहमद, जियाउल हक, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सीनियर कामेश्वर अग्रवाल, एडवोकेट कामेश्वर आग्रवाल, सौ से अधिक रशियन किताबों की हिंदी में अनुवाद करने वाले रमेश सिन्हा, इविवि के प्रोफेसर आशाराम, प्रो.मो.अकिल रिजवी, प्रो.एहतराम रिजवी, डॉ.उदय नारायण तिवारी, प्रो.पीसी गुप्ता, प्रो. अजहर अंसारी, प्रो.नरवानी, डॉ.पीसी जोशी, जीपी सिंह समेत विद्वानों ने वामपंथ विचारधारा को संगमनगरी में आगे बढ़ाया। वरिष्ठ नेता हरिश्चंद्र द्विवेदी बताते हैं कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पास सदस्यता का नवीनीकरण कराने का पैसा नहीं था तो उन्होंने उस समय जिला सचिव रहे जियाउल हक से उधार पैसे लेकर सदस्यता ली।

इमरजेंसी के बाद के चुनाव में दिखा प्रभाव

इमरजेंसी के दौरान सीपीआई से कृपा शंकर, नसीम अंसारी, हीरा लाल, पंडित सीता राम, राधेश्याम जायसवाल व ओपी सिंह और सीपीएम से हरिराम पांडेय गिरफ्तार किए गए। इसके बाद 1988 में इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव हुआ, जिसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह जनता दल के उम्मीदवार थे। इस चुनाव पर दुनियाभर की निगाहें थीं। कम्युनिस्ट पार्टी ने इस चुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह को समर्थन दिया। पार्टी के बड़े-बड़े नेता सी. राजेश्वर राव, जेडए अहमद, काली शंकर शुक्ला, सरजू पांडे, मौलाना इसहा संभली के अलावा कई बड़े नेताओं ने पार्टी कार्यालय में डेरा डाल दिया। जानसेनगंज स्थित कार्यालय से मुट्ठीगंज तक माइक बांधे गए और हर रोज सभाएं हुईं। वीपी सिंह चुनाव जीत गए।

मंडल-कमंडल में निपट गए वामपंथी दल

साल 1990 के दशक में जातीय राजनीति और राम मंदिर आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में दिखने लगा था। कम्युनिस्ट पार्टियां किसान एकता, मजदूर एकता, कर्मचारी एकता की बात करती रहीं, लेकिन यह वर्ग मंडल-कमंडल की राजनीति के बाद वामपंथी दलों से छिटक गया। इसके बाद संगमनगरी में कम्युनिस्ट पार्टियों के वोट बैंक का भी सफाया होने लगा। पार्टी के एकमात्र विधायक रामकृपाल ने भी पार्टी का दामन छोड़ कांग्रेस की सदस्यता ले ली।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed