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संतों को जोड़ने की कला के जादूगर थे हंस देवाचार्य

Sat, 23 Feb 2019 01:24 AM IST
विनोद सिंह अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 23 Feb 2019 01:24 AM IST
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The magicians of art of connecting saints were Hansdevacharya
hans devacharya - फोटो : अमर उजाला, प्रयागराज
‘मैं सुबह आपसे जरूर मिलकर जाऊंगा, बिना मिले नहीं जाऊंगा’, लेकिन रामानंदाचार्य जगद्गुरु स्वामी हंसदेवाचार्य का कहा अधूरा ही रह गया। मार्ग दुर्घटना में दिवंगत होने की खबर सुनकर स्तब्ध रह गए उनके करीबी संत मित्र निर्मल पंचायती अखाड़े के सचिव महंत देवेंद्र सिंह शास्त्री ने कहा, सपने में भी नहीं सोचा था कि तीस वर्षों की मित्रता तीन घंटे में टूटकर बिखर जाएगी। बृहस्पतिवार की रात भी हम दोनों ने साथ ही भोजन किया। उनके शिविर से मैं अखाड़े लौट आया लेकिन आधी रात को उन्होंने फोन करके सुबह आने का वायदा किया था जो अब कभी नहीं पूरा हो सकेगा।
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बोले, वह जब कभी भी प्रयागराज आए तो कीडगंज स्थित निर्मल पंचायती अखाड़े में ही रुके। उनके लिए शुक्रवार की सुबह भी अखाड़े के कमरा नंबर तीन की साफ-सफाई कराई जा रही थी कि मेरे सेवादार मनोज दुबे के पास उनके सेवादार गुरुमाल सिंह ने फोन करके दुर्घटना की जानकारी दी। और कुछ ही देर में सबकुछ खत्म हो गया। काली-संगम लोअर मार्ग चौराहे पर स्थित शिविर में कथा के समापन के बाद उन्होंने माघी पूर्णिमा पर डुबकी लगाई थी। उनके सेवादार गुरुमाल सिंह के मुताबिक भोर में ही कुंभ शिविर से निकल गए थे। लखनऊ होते हुए हरिद्वार पहुंचना था।
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रामानंदाचार्य जगद्गुरु स्वामी हंसदेवाचार्य विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। संतों को एकत्र करने की उनकी अद्भुत कला के सभी कायल थे।अच्छे व्यवहार से ही लोग उनसे जुड़ते गए। बैरागियों के जगद्गुरु होने के साथ ही शैव, उदासीन और निर्मल अखाडे़ के साथ भी उनके अच्छे रिश्ते थे। अयोध्या से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक राम मंदिर के मुद्दे पर सार्थक तौर पर आंदोलन छेड़ने और जनसमर्थन जुटाने वाले जगद्गुरु हंसदेवाचार्य अबकी कुंभपर्व में भी विहिप की धर्मसंसद से लेकर संत सम्मेलन तक में धर्म, समाज, राम मंदिर सहित देश के कई प्रमुख मुद्दों पर मुखर रहे।
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सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ से उनके मित्रवत संबंध थे, जिसे कुंभाभिषेक समारोह में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर मंच से कहा भी था। मुख्यमंत्री से इसी निकटता के कारण वह मेले के संकटमोचक की भूमिका में शासन और संतों के बीच सेतु बनकर कई तरह की दिक्कतें दूर कराते रहे। बैरागी अखाड़ों की धर्मध्वजा स्थापना से लेकर निर्मल अखाड़े के गुरुद्वारे के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री की उपस्थिति के पीछे उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उनके जाने से पूरा संत समाज आहत है। महंत देवेंद्र सिंह शास्त्री सहित कई संत हरिद्वार में उनके अंतिम संस्कार में शामिल होंगे।


प्रतिभा और परिश्रम से हासिल की थी प्रतिष्ठा
हरिद्वार के भीमगोडा के पास जगन्नाथ धाम का परमाअध्यक्ष बनने के बाद वह पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के महामंडलेश्वर भी बने लेकिन किन्हीं मतभेदों के चलते उससे अलग हो गए। बीते हरिद्वार कुंभ पर्व में उन्हें सर्वसम्मति से जगद्गुरु की पदवी से विभूषित किया गया था। फिलहाल वह संत समिति के संरक्षक भी थे।
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