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पुलिसकर्मियों को सत्यनिष्ठा रोकने का दंड गैरकानूनी: हाईकोर्ट

Sat, 28 May 2016 01:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 28 May 2016 01:26 AM IST
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The integrity of the criminal police to prevent illegal : HC
अदालत - फोटो : file
पुलिस विभाग में कार्यरत कर्मियों को खराब आचरण पर सत्यनिष्ठा रोकने और सेंसर इंट्री देने का दंड आम बात है। दशकों से विभाग में अधिकारियों को दंडित करने का यह तरीका लागू है। मगर शायद पुलिस अधिकारियों को भी यह पता नहीं कि सत्यनिष्ठा रोकने का दंड गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने एक दंडित पुलिसकर्मी चंद्रदत्त गौतम की याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्यनिष्ठा रोकने के दंड को गैरकानूनी करार दिया है। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस एमसी त्रिपाठी ने कहा कि पुलिस अधिकारी दंड एवं अपील नियमावली 1991 में इस प्रकार का दंड देने का नियम नहीं है। कोर्ट ने सेंसर इंट्री के आधार पर पांच वर्ष की अवधि बीतने के बाद भी कर्मचारी का प्रमोशन रोकने को गलत करार दिया है। सेंसर इंट्री का दंड पांच वर्ष बाद निष्प्रभावी हो जाता है।
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याची वकील विजय गौतम ने अदालत के समक्ष नियमावली प्रस्तुत करते हुए बताया कि याची को दिए गए सत्यनिष्ठा रोकने के दंड का नियमावली में कोई प्रावधान ही नहीं है। इसी प्रकार से सेंसर इंट्री का दंड देने के पांच वर्ष बाद भी इसके आधार पर याची की प्रोन्नति रोक दी गई, जबकि सेंसर इंट्री पांच वर्ष बाद निष्प्रभावी हो जाती है। इसके बाद सेवाजनित लाभ से कर्मचारी को वंचित करना गलत है। कोर्ट ने दलील स्वीकार करते हुए याची की सत्यनिष्ठा रोकने और सेंसर इंट्री के आदेश को रद्द कर दिया है।
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याची चंद्रदत्त पीएसी में कांस्टेबल है। उसे 31 अक्तूबर 1996 और 25 नवंबर 1998 के दो अलग-अलग आदेशों से सेंसर इंट्री दी गई। तीन अगस्त 2000 को कमांडेंट ने उसकी सत्यनिष्ठा रोकने का आदेश दिया। इन तीनों आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि पांच वर्ष बाद प्रभावहीन हो चुके आदेश को प्रभावी बनाए रखना गैरकानूनी है। 
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