निर्मल गंगा की पहल के लिए नीयत भी हो निर्मल
संगम की रेती पर बसे तंबुओं के शहर में एक बार फिर ‘अविरल-निर्मल गंगा’ की गूंज है। शंकराचार्यो के शिविरों से लेकर दंडी स्वामियों, संतों, आचार्यों, तीर्थपुरोहितों और अनेक संस्थाओं की ओर से सभा, गोष्ठियों, जनजागरुकता अभियान सहित उपवास, आंदोलन तक होते रहे हैं लेकिन मेले से पहले होने वाली पहल, मेले की शुरुआत या एक दो स्नानपर्वों के बाद टांय-टायं फिस्स हो जाती है।
आरोप है कि कभी प्रचार तो कभी कुछ सुविधाएं हासिल करने के लिए शासन-प्रशासन पर दबाव तक की आंदोलन सीमित रहे हैं। वहीं प्रशासन की ओर से भी हर बार जैसे-तैसे टालने की नीति से कोरे आश्वासनों से आंदोलनों की हवा निकालने की पुरजोर कोशिश होती है। मेला बीतने के साथ ही संत अपने तलवार म्यान में और प्रशासन अपना ढाल शासन को सौंपकर अगले वर्ष तक के लिए निश्चिंत हो जाता है।
एक बार फिर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की अगुवाई में गंगा सेवा अभियानम और शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती की अगुवाई में आदित्य वाहिनी के अतिरिक्त स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ, काशी सुमेरूपीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती, टीकरमाफी आश्रम के स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी, गंगा सेना के स्वामी आनंद गिरि, दंडी संन्यासी प्रबंध समिति के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम, अध्यक्ष स्वामी विमलदेवाश्रम, महामंत्री स्वामी ब्रह्माश्रम आदि की ओर से निर्मल गंगा मुद्दे पर तरह-तरह के कार्यक्रमों की योजना है लेकिन आयोजकों की इच्छाशक्ति और प्रशासन की मंशा के बीच ऐसे आंदोलनों की अकाल मौत भी तय है।
यह बताने की जरूरत नहीं कि कानपुर पहुंचते ही गंगोत्री से चली गंगा ‘कोमा’ में पहुंच जाती है। टिहरी, हरिद्वार और नरौरा के बाद मूल गंगाजल इलाहाबाद तक एक प्रतिशत भी नहीं पहुंचता। कानपुर में नालों और टेनरियों के बाद अकेले इलाहाबाद में गंगा और यमुना में छोटे-बड़े तमाम नाले मिलते हैं। मेले के दौरान भले ही ज्यादातर नाले टेप कर दिए जाते हैं, वावजूद इसके कई नालों का प्रदूषित पानी नदियों में बेरोकटोक मिलता है। उधर, ट्रीटमेंट का आलम यह है कि सलोरी और मेहंदौरी एसटीपी पर जब ज्यादा दबाव पड़ता है तो रात में चुपके से बिना ट्रीटमेंट किया हुआ पानी बेरोकटोक गंगा में छोड़ दिया जाता है।
निर्मल गंगा के लिए जितनी भी पहल और प्रयास किए जाएं, वे सुखद और स्वागतयोग्य हैं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह कि अविरल-निर्मल गंगा को लेकर की जाने वाली पहल और प्रयास का श्रेय लेने की होड़ में संतों का बंटा होना मुद्दे को कमजोर करता है। मेला बीतने के साथ ही संत और संस्थाओं की कोशिशें दिशा बदल लेती हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति और ईमानदार कोशिश केअभाव में मेले के दौरान उठी आवाजें मेला खत्म होते ही रेती में दब जाती हैं।
गंगाविदें का मानना है कि सिर्फ मेले ही नहीं बल्कि वर्षपर्यंत कोशिशें हों तो स्नानपर्वों पर स्थितियां अलग होंगी। वर्ष 2002 से अविरल-निर्मल गंगा को लेकर संगम की रेती से कोशिशें शुरू हुईं थीं लेकिन चौदह बरस बाद भी निर्मल गंगा का वनवास पूरा नहीं हुआ तो सिर्फ इसलिए क्योंकि निष्ठा, नीयत और ईमानदार कोशिश गंगा के साथ नहीं अब भी तट पर तमाशबीन हैं।