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Prayagraj News: 1826 से कायम है ऐतिहासिक रामलीला, रानी गोमती ने रखी थी नींव
Wed, 14 Oct 2026 02:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Wed, 14 Oct 2026 02:19 AM IST
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फूलपुर में रामलीला का मंचन करते स्थानीय कलाकार।
1826 में फूलपुर स्टेट की रानी गोमती ने रामलीला की जो परंपरा शुरू की थी, वह आज भी कस्बे की पहचान बनी हुई है। वर्ष 1904 से गोमती इंटर कॉलेज के मैदान में हो रहा मंचन स्थानीय कलाकारों के अभिनय से जीवंत है। हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता की मिसाल बनी इस ऐतिहासिक रामलीला का मंचन इस वर्ष भी 11 अक्तूबर से शुरू हो चुका है।
बुजुर्गों के मुताबिक, फूलपुर की ऐतिहासिक रामलीला की नींव रानी गोमती ने रखी थी। शुरुआती दौर में इसका मंचन रानी की कोठी परिसर में होता था। रामलीला का पूरा खर्च रानी स्वयं उठाती थीं। बाद में उनकी पहल पर कस्बे के अलग-अलग मोहल्लों और आसपास के गांवों में भी मंचन शुरू हुआ। स्थानीय लोग ही राम, लक्ष्मण, सीता सहित विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते थे।
नौ दिन तक चलने वाली रामलीला के लिए मंचन का सामान बैलगाड़ियों पर लादकर अलग-अलग स्थानों पर ले जाया जाता था। रानी की कोठी और कस्बे के मोहल्लों के अलावा परासिनपुर नहर के बगल स्थित देवी चौरा परिसर तथा बौड़ई गांव में भी लीलाओं का मंचन होता था। बौड़ई गांव में सड़क किनारे लंका दहन की लीला आयोजित की जाती थी। स्थानीय मान्यता है कि तभी से उस मैदान का नाम लंका मैदान पड़ गया।
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90 वर्षीय बुजुर्ग एवं पूर्व चेयरमैन मोतीलाल जायसवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल कृष्ण द्विवेदी उर्फ राजा बाबू ने बताया कि उस दौर में आसपास के कई किलोमीटर तक रामलीला का आयोजन नहीं होता था। फूलपुर की रामलीला दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। इसमें सभी जातियों के लोग भाग लेते थे। मुस्लिम बिरादरी के मटरू दर्जी जैसे स्थानीय हास्य कलाकारों के प्रहसन दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहते थे। उनके अभिनय को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। संवाद
फूलपुर की सांस्कृतिक पहचान बना रामलीला
स्थानीय लोगों के अनुसार, इसकी ख्याति प्रयागराज के अलावा वाराणसी, भदोही, प्रतापगढ़, जौनपुर और कौशांबी तक रही है। वर्ष 1904 में रामलीला का मंचन गोमती इंटर कॉलेज के मैदान में शुरू हुआ। तब से स्थानीय कलाकार इसी मैदान में रामलीला का मंचन करते आ रहे हैं। करीब दो शताब्दियों की यात्रा में यह आयोजन फूलपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
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बुजुर्गों के मुताबिक, फूलपुर की ऐतिहासिक रामलीला की नींव रानी गोमती ने रखी थी। शुरुआती दौर में इसका मंचन रानी की कोठी परिसर में होता था। रामलीला का पूरा खर्च रानी स्वयं उठाती थीं। बाद में उनकी पहल पर कस्बे के अलग-अलग मोहल्लों और आसपास के गांवों में भी मंचन शुरू हुआ। स्थानीय लोग ही राम, लक्ष्मण, सीता सहित विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते थे।
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नौ दिन तक चलने वाली रामलीला के लिए मंचन का सामान बैलगाड़ियों पर लादकर अलग-अलग स्थानों पर ले जाया जाता था। रानी की कोठी और कस्बे के मोहल्लों के अलावा परासिनपुर नहर के बगल स्थित देवी चौरा परिसर तथा बौड़ई गांव में भी लीलाओं का मंचन होता था। बौड़ई गांव में सड़क किनारे लंका दहन की लीला आयोजित की जाती थी। स्थानीय मान्यता है कि तभी से उस मैदान का नाम लंका मैदान पड़ गया।
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90 वर्षीय बुजुर्ग एवं पूर्व चेयरमैन मोतीलाल जायसवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल कृष्ण द्विवेदी उर्फ राजा बाबू ने बताया कि उस दौर में आसपास के कई किलोमीटर तक रामलीला का आयोजन नहीं होता था। फूलपुर की रामलीला दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। इसमें सभी जातियों के लोग भाग लेते थे। मुस्लिम बिरादरी के मटरू दर्जी जैसे स्थानीय हास्य कलाकारों के प्रहसन दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहते थे। उनके अभिनय को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। संवाद
फूलपुर की सांस्कृतिक पहचान बना रामलीला
स्थानीय लोगों के अनुसार, इसकी ख्याति प्रयागराज के अलावा वाराणसी, भदोही, प्रतापगढ़, जौनपुर और कौशांबी तक रही है। वर्ष 1904 में रामलीला का मंचन गोमती इंटर कॉलेज के मैदान में शुरू हुआ। तब से स्थानीय कलाकार इसी मैदान में रामलीला का मंचन करते आ रहे हैं। करीब दो शताब्दियों की यात्रा में यह आयोजन फूलपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।