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सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सच हुआ सपना

Thu, 25 Dec 2014 01:35 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद Updated Thu, 25 Dec 2014 01:35 AM IST
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The dream came true with the highest civilian honor
इलाहाबाद। देर से ही सही, महामना मदन मोहन मालवीय के परिजनों ने जो सपना संजोया था, वह सच हुआ। उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा हुई तो परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सूचना के साथ ही जार्जटाउन स्थित महामना के प्रपौत्र जस्टिस गिरिधर मालवीय के बंगले पर बधाइयों का तांता लग गया। जस्टिस मालवीय के मोबाइल और टेलीफोन की घंटियां लगातार घनघनाती रहीं। उन्हें महामना को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की घोषणा की जानकारी राष्ट्रपति के ट्वीट से हुई। सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और कुछ पलों बाद ही महामना का नाम भी ट्वीट कर दिया गया।
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जस्टिस मालवीय को सरकार से कोई शिकायत नहीं है। मोदी सरकार ने अपने वायदे के अनुरूप घोषणा में कोई देरी नहीं की। बोले, महामना की जयंती की पूर्व संध्या पर भारत रत्न देने की घोषणा ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। यह शिकायत जरूर है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में महामना के नाम पर विचार क्यों नहीं हुआ। महामना को भारत रत्न दिए जाने का निर्णय युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का विषय है।
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बकौल जस्टिस मालवीय महामना अंग्रेजों की तत्कालीन शिक्षा पद्धति से भारतीयों को बाहर लाने के लिए ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। उनका दृष्टिकोण शिक्षा को लेकर बिल्कुल अलग था। उन्होंने कभी भी युवाओं को पढ़लिखकर नौकरी करने के लिए प्रेरित नहीं किया। वह हमेशा भारत निर्माण की बात करते रहे। बीएचयू में इंजीनियरिंग और तकनीकी विषयों की शिक्षा भी इसी उद्देश्य से शुरू कराई कि देश के युवा सिर्फ नौकरी के बारे में नहीं, राष्ट्र निर्माण के बारे में भी सोचें। शिक्षा की मौजूदा हालत पर उन्होंने कहा कि महामना के दृष्टिकोण को अपनाया गया होता तो देश में आज मैकॉले की शिक्षा पद्धति लागू नहीं होती न ही हर तरफ अंग्रेजियत छाई होती।
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महामना मदनमोहन मालवीय ने ही सबसे पहले ‘मालवीय’ की पदवी लगाना शुरू किया। उनके पूर्वज मूलरूप से मध्यप्रदेश के मालवा से आए थे।  जस्टिस गिरिधर मालवीय के मुताबिक तकरीबन चार सौ साल पहले उनके पूर्वज बृजनाथ चतुर्वेदी यहां आए थे। उन्हें यहां के लोग मल्लई कहते थे। महामना ने इसे अपभ्रंश माना और ‘मालवीय’ का टाइटिल लगाना शुरू कर दिया। उनका परिवार मूलरूप से उज्जैन के खेदुर गांव से आया था।

महामना अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे। परिस्थितियां जैसी भी हों, उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। कालाकांकर के महराजा रामपाल सिंह ने जब उनसे हिंदुस्थान समाचार पत्र के संपादकीय का दायित्व संभालने का आग्रह किया तो मालवीय जी ने शर्त रख दी कि राजा साहब कभी भी शराब पीकर उनसे बात करने नहीं आएंगे। मालवीय जी ने अखबार का दायित्व बखूबी संभाला और एक दिन जब राजा रामपाल भूलवश उनके पास शराब पीकर कुछ बात करने पहुंचे तो महामना ने अखबार तत्काल छोड़ दिया। बाद में राजा रामपाल के कहने पर ही महामना ने वकालत की पढ़ाई की और उस वक्त के चोटी के वकीलों में उनका नाम शामिल हुआ।

महामना की प्रपौत्री रंजना मालवीय भारत रत्न की घोषणा से काफी खुश हैं। रंजना महामना के पौत्र श्रीधर मालवीय की पुत्री हैं। वह अपनी मां सरस्वती मालवीय और बहन वीणा मालवीय के साथ जार्जटाउन में ही रहती हैं। भारत रत्न देने की घोषणा पर उनकी टिप्पणी थी कि मोदी सरकार ने जो वादा किया, उसे निभा दिया।
यह पूछे जाने पर कि महामना को भारत रत्न देने का निर्णय देर से लिया गया, रंजना का कहना था कि यह राजनीतिक  कारणों से हुआ। कांग्रेस ने हमेशा नेहरू परिवार को ही आगे बढ़ाया। देश पर मर मिटने वालों की कोई कमी नहीं थी लेकिन जब नाम आगे बढ़ाने की बात आई तो सामने नेहरू परिवार के सदस्य ही खड़े नजर आए। देश की रंजना मालवीय परिवार के योगदान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में कूदने के बाद परिवार के आर्थिक स्नोत कम हो गए। उनके बाबा श्रीधर मालवीय और बाबा रमाकांत मालवीय का काफी समय जेल में बीता। जेल में उनको खराब गुणवत्ता वाला खाना दिया जाता था, जिसकी वजह से समय से पहले उनकी मृत्यु हो गई।

महामना को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा होने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों में भी खुशी की लहर दौड़ गई। हिंदू हॉस्टल के अंत:वासियों ने जश्न मनाते हुए हॉस्टल के सामने स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और देश की आजादी में उनके योगदान को याद किया। छात्रों ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में महामना के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इलाहाबाद में हिंदू हॉस्टल की स्थापना कर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय को बड़ा तोहफा दिया। छात्र हमेशा उनके ऋणी रहेंगे। छात्राें ने खुशी में एक-दूसरे को मिठाइयां भी खिलाईं। छात्रनेता अमरेंदु सिंह ने कहा कि हॉस्टल में बृहस्पतिवार को उनकी 151वीं जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी। इस मौके पर प्रमोद शर्मा, विश्व प्रताप, पंकज गुप्ता, अंकुर मिश्र, प्रशांत मिश्र, प्रदीप त्रिपाठी, सर्वेश मिश्र, ज्ञान शुक्ला, राजबहादुर, सच्चितांनद मिश्र आदि मौजूद रहे।

महामना की महानता, प्रतिभा तथा देशभक्ति पूरा देश जानता है। महात्मा गांधी तो महामना को अपना बड़ा भाई मानते थे। वह कहते थे, मैं तो मोहनदास हूं, आप तो मदनमोहन हैं, मैं तो आपका दास हूं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के मशहूर वकील महामना यूपी लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए चुनाव लड़े और जीते।


उन्होंने इलाहाबाद में छात्रों के लिए हिन्दू छात्रावास बनवाया। उन्हें जब भी समय मिलता था, बच्चों को अपने पास बिठा कर महापुरुषों के उपदेश तथा धार्मिक ग्रंथों की कहानियां सुनाते और उनसे भी कविताएं व श्लोक सुना करते थे। घर से बाहर निकलते समय हमेशा नारायण को याद करते थे। उनका गाउन इलाहाबाद का एक विशेष दर्जी बनाता था।
जिस मोहल्ले में महामना का जन्म हुआ था, उसे लालडिग्गी कहा जाता था, फिर उसे अहियापुर और अब उसे महामना मालवीय नगर कर दिया गया है।
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