हाईकोर्ट : बीस साल पहले समाप्त हो गई प्रक्रिया को तहसीलदार द्वारा पुन: शुरू करने की कार्यवाही पर कोर्ट ने लगाई
याची के अनुसार गाटा संख्या 190 में 20.50 वर्ग फुट में 1945 में मकान का निर्माण कर रहता चला आ रहा था। ग्राम पंचायत ने 1996 में इसे सरकारी जमीन माना और जमींदारी विनाश तथा भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 122 बी के तहत ग्राम पंचायत की जमीन से बेदखल करने की कार्यवाही शुरू की।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तहसीलदार कर्वी, चित्रकूट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिससे ग्राम पंचायत की जमीन पर कब्जा दखल को लेकर उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश तथा भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 की धारा 122 बी के तहत समाप्त हो गई प्रक्रिया को करीब 20 साल बाद पुन: शुरू करने की कार्यवाही शुरू की गई है। कोर्ट ने राज्य सरकार व विपक्षियों से छह सप्ताह में जवाब मांगा है।
ग्राम पंचायत रानीपुर भट्ट निवासी मुन्ना द्वारा दाखिल याचिका की सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र ने दिया है।याची के अनुसार गाटा संख्या 190 में 20.50 वर्ग फुट में 1945 में मकान का निर्माण कर रहता चला आ रहा था। ग्राम पंचायत ने 1996 में इसे सरकारी जमीन माना और जमींदारी विनाश तथा भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 122 बी के तहत ग्राम पंचायत की जमीन से बेदखल करने की कार्यवाही शुरू की।
तहसीलदार कर्वी ने 11 जून 2001 को याची पर 10000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए उसे बेदखल करने का आदेश दिया। जिसे अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व चित्रकूट के समक्ष निगरानी दाखिल कर चुनौती दी गई। एडीएम ने तहसीलदार कर्वी के एकपक्षीय आदेश को निरस्त कर दिया और मेरिट के आधार पर सुनवाई कर आदेश पारित करने को कहा।
तहसीलदार कर्वी ने भूमि प्रबंध समिति के अध्यक्ष, तत्कालीन ग्राम प्रधान और समिति के सचिव, तत्कालीन लेखपाल के लिखित बयान एवं याची को सुनने के बाद 24 जुलाई 2003 को याची के पक्ष मे आदेश पारित किया और 122 बी की कार्यवाही समाप्त कर दिया।
इसी मामले में ग्राम पंचायत रानीपुर भट्ट की भूमि प्रबंधक समिति ने 10 जनवरी 2023 को धारा 201 एलआर एक्ट और राजस्व संहिता 2006 की धारा 209 के तहत पुराने केस की पुनस्र्थापना पत्र तहसीलदार कर्वी के समक्ष प्रस्तुत किया। तहसीलदार कर्वी ने करीब 20 साल के बाद प्रस्तुत किए गए पुनस्र्थापना पत्र पर संज्ञान लेकर याची को नोटिस जारी की। इसी नोटिस को याचिका मे चुनौती दी गई है। इस कार्यवाही को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की है।