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सफरनामा जंगे आजादी : अंग्रेजों ने तबाह कर दिए थे समदाबाद, छीतपुर गांव
Tue, 03 Aug 2021 10:50 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 03 Aug 2021 10:50 AM IST
सार
- बाद में संवार-सुधार कर यहीं बसाई गई कंपनी, नया नामकरण हुआ कंपनी बाग
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prayagraj news : चंद्रशेखर आजाद पार्क।
- फोटो : prayagraj
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विस्तार
सींचा है इसे खून से हम तस्ना लबों ने, तब जाके इस अंदाज का मयखाना बना है’, जैसी आवाजें भले ही कहीं गुम हो गई हों, पर सच तो यह है कि जाने कितने जांबाजों ने अपनी जान गंवा कर हमें आजादी का तोहफा दिया। और इन जांबाज शहीदों में मेवातियों का नाम सबसे ऊपर आएगा। उन्होंने हर मोड़ पर न सिर्फ अंग्रेजों से लोहा लिया बल्कि उन्हें करारी मात भी दी। शहर के बीचोबीच बसे कंपनी बाग या अल्फ्रेड पार्क और अब चंद्रशेखर आजाद पार्क की मिट्टी आज भी इसकी गवाही देती है।
इतिहास के पन्ने मेवातियों के बलिदान की गौरवगाथा सुनाते हैं। पार्क के दक्षिणी कोने पर समदाबाद और छीतपुर नाम से मेवातियों के गांव थे, जहां पर आज मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज है। सन् 1857 के गदर में इन गांवों के लोगों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। बाद में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बागी घोषित करते हुए दोनों गांवों को पूरी तरह से तबाह कर दिया।
और यह जगह संवार-सुधार कर यहां कंपनी बसा दी गई और इसका नया नामकरण किया गया, कंपनी बाग। छीतपुर और समदाबाद के मेवातियों के अतिरिक्त रसूलपुर के मेवाती, महगांव, कोल्हा, सराय सलीम, सिरोधा, फतेहपुर, बरमहर, मुख्य चायल, भिकपुर, पावन, शेखपुर, मसीहा, बारागांव, मुइनुद्दीनपुर गौस, बेगम सराय, ओदानी, बेली, बधरा, नीमीबाग, चेतपुर, रसूलपुर देहू, मिनहाजपुर, रोही, गयासुद्दीनपुर, कसमनदा, सराय भोजाह, उमरापुर शेवान आदि गांवों के लोग भी मेवातियों के साथ आजादी की लड़ाई में शरीक रहे।
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दरअसल चार जून को जब इलाहाबाद खबर पहुंची कि बनारस में सिख रेजीमेंट नंबर 11 के कई सिपाही बिगड़कर इधर आ रहे हैं, तो यहां की पल्टन में भी उथल-पुथल शुरू हो गई। छह जून की शाम दो तोपों के साथ पल्टन की एक कंपनी लेफ्टीनेंट हिक्स और हारवर्ड के नेतृत्व में दारागंज में नाव के पुल की रक्षा के लिए भेजी गई। पर विद्रोही सिपाहियों के बीच अंग्रेजों की एक न चली। ठीक नौ बजे सिपाहियों ने आतिशबाजी का एक बान (हवाई) छोड़ा, जिसके जवाब में छावनी से भी बान छोड़ा गया।
विद्रोही रुख देख दारागंज से लेफ्टीनेंट हिक्स और अलोपीबाग से लेफ्टीनेंट हारवर्ड ने किसी तरह भागकर किले में पनाह ली। उसी रात चैथम लाइन छावनी के मेस हाउस में भी सिपाही विद्रोही हो उठे तो यहां के अंग्रेज अफसरों ने भी भागकर किले में शरण ली। इसी आपाधापी में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के सभी मकान जला दिए थे। इतना ही नहीं विद्रोहियों ने सरकारी खजाने से तीस लाख रुपये भी लूट लिए थे। जेल से तीन हजार कैदियों को मुक्त करा लिया गया था, जिसमें से अधिकतर विद्रोदियों के साथ मिल गए। शहरियों और पुलिस ने भी उनका साथ दिया। क्रांतिकारियों का जोश ऐसा था कि अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी।
डाक्यूमेंट्री बताएगी मेवातियों की गौरवगाथा
इलाहाबाद संग्रहालय के निदेशक डॉ.सुनील गुप्ता के मुताबिक छीतपुर और समदाबाद के मेवातियों के बलिदान पर डाक्यूमेंट्री तैयार करने की योजना है। स्वतंत्रता संग्राम के अविस्मरणीय पलों को सहेजने वाली यह डाक्यूमेंट्री हमें मेवातियों की गौरवगाथा बताएगी।
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इतिहास के पन्ने मेवातियों के बलिदान की गौरवगाथा सुनाते हैं। पार्क के दक्षिणी कोने पर समदाबाद और छीतपुर नाम से मेवातियों के गांव थे, जहां पर आज मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज है। सन् 1857 के गदर में इन गांवों के लोगों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। बाद में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बागी घोषित करते हुए दोनों गांवों को पूरी तरह से तबाह कर दिया।
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और यह जगह संवार-सुधार कर यहां कंपनी बसा दी गई और इसका नया नामकरण किया गया, कंपनी बाग। छीतपुर और समदाबाद के मेवातियों के अतिरिक्त रसूलपुर के मेवाती, महगांव, कोल्हा, सराय सलीम, सिरोधा, फतेहपुर, बरमहर, मुख्य चायल, भिकपुर, पावन, शेखपुर, मसीहा, बारागांव, मुइनुद्दीनपुर गौस, बेगम सराय, ओदानी, बेली, बधरा, नीमीबाग, चेतपुर, रसूलपुर देहू, मिनहाजपुर, रोही, गयासुद्दीनपुर, कसमनदा, सराय भोजाह, उमरापुर शेवान आदि गांवों के लोग भी मेवातियों के साथ आजादी की लड़ाई में शरीक रहे।
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दरअसल चार जून को जब इलाहाबाद खबर पहुंची कि बनारस में सिख रेजीमेंट नंबर 11 के कई सिपाही बिगड़कर इधर आ रहे हैं, तो यहां की पल्टन में भी उथल-पुथल शुरू हो गई। छह जून की शाम दो तोपों के साथ पल्टन की एक कंपनी लेफ्टीनेंट हिक्स और हारवर्ड के नेतृत्व में दारागंज में नाव के पुल की रक्षा के लिए भेजी गई। पर विद्रोही सिपाहियों के बीच अंग्रेजों की एक न चली। ठीक नौ बजे सिपाहियों ने आतिशबाजी का एक बान (हवाई) छोड़ा, जिसके जवाब में छावनी से भी बान छोड़ा गया।
विद्रोही रुख देख दारागंज से लेफ्टीनेंट हिक्स और अलोपीबाग से लेफ्टीनेंट हारवर्ड ने किसी तरह भागकर किले में पनाह ली। उसी रात चैथम लाइन छावनी के मेस हाउस में भी सिपाही विद्रोही हो उठे तो यहां के अंग्रेज अफसरों ने भी भागकर किले में शरण ली। इसी आपाधापी में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के सभी मकान जला दिए थे। इतना ही नहीं विद्रोहियों ने सरकारी खजाने से तीस लाख रुपये भी लूट लिए थे। जेल से तीन हजार कैदियों को मुक्त करा लिया गया था, जिसमें से अधिकतर विद्रोदियों के साथ मिल गए। शहरियों और पुलिस ने भी उनका साथ दिया। क्रांतिकारियों का जोश ऐसा था कि अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी।
डाक्यूमेंट्री बताएगी मेवातियों की गौरवगाथा
इलाहाबाद संग्रहालय के निदेशक डॉ.सुनील गुप्ता के मुताबिक छीतपुर और समदाबाद के मेवातियों के बलिदान पर डाक्यूमेंट्री तैयार करने की योजना है। स्वतंत्रता संग्राम के अविस्मरणीय पलों को सहेजने वाली यह डाक्यूमेंट्री हमें मेवातियों की गौरवगाथा बताएगी।