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वृद्ध कैदियों की समय पूर्व रिहाई न होना दुखद: हाईकोर्ट

Fri, 06 May 2016 02:15 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 06 May 2016 02:15 AM IST
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The absence of early release of prisoners aged tragic : HC
अदालत - फोटो : file
 प्रदेश की जेलों में लंबे समय से बंद और वृद्ध हो चुके कैदियों की समय पूर्व रिहाई न होने को हाईकोर्ट ने दुखद बताया है। कोर्ट ने नैनी जेल में बांदा के दो कैदियों रामेश्वर और शिवसरन की रिहाई पर डीएम बांदा से रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने सरकार को एक माह में रिहाई पर निर्णय लेने का आदेश दिया है। दोनों बंदियों की उम्र 80 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वह बीमार चल रहे हैं। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि समय पूर्व रिहाई को लेकर उसकी क्या नीति है। इस बात पर चिंता भी जताई है कि जेलों में क्षमता के अनुपात से कहीं अधिक बंदी रह रहे हैं। उनको मूलभूत सुविधाएं भी सरकार नहीं दे पा रही है।
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लवकुश की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने सरकार से कहा है कि यदि उसके पास समय पूर्व रिहाई की कोई नीति नहीं है तो कम से कम ऐसे बंदियों की मॉनिटरिंग को लेकर कोई नियम बनाए। याचिका में 87 वर्षीय रामेश्वर की रिहाई का मामला उठाया गया। रामेश्वर को 14 दिसंबर 1984 को हत्या के मामले में बांदा की अदालत से उम्रकैद की सजा हुई। उसे नैनी जेल में रखा गया है। याची का कहना है कि बंदी बीमार है और उम्र इतनी अधिक हो चुकी है कि उसके दोबारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है। ऐसे में उसे जेल में निरुद्ध रखने का कोई औचित्य नहीं है।
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कोर्ट ने इस मामले में नैनी जेल अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट में बताया गया कि बंदी का ऑपरेशन हुआ है। उसकी रिहाई को लेकर 12 अगस्त 2015 को नैनी जेल से डीएम बांदा को रिपोर्ट और रिहाई का प्रस्ताव भेजा गया मगर डीएम की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया जिसकी वजह से रिहाई नहीं हो पा रही है। कोर्ट ने डीएम बांदा को इस मामले में रिपोर्ट भेजने तथा सरकार को एक माह में रिहाई पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। प्रमुख सचिव गृह से भी सरकारी नीति की जानकारी मांगी है।
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