एथलेटिक्स : तंगहाली की मार, पर हौसला अडिग और हिम्मत अपार, संघर्ष कर हासिल किया मुकाम
मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में डिस्कस थ्रो का अभ्यास करने वाले कानपुर के अरुण सिंह को अपनी मंजिल हासिल करने का जुनून इस कदर चढ़ा कि इसके लिए वे रोज 140 किमी साइकिल चलाने से भी पीछे नहीं हटे।
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जीवन में आर्थिक तंगी की बेड़ियां आड़े आ जाएं तो इससे निकलना आसान नहीं होता। हालांकि, जो लोग इन बेड़ियों को तोड़कर सफलता के शिखर पर पहुंच जाते हैं, वे ही समाज के लिए नजीर बन जाते हैं। अमर उजाला की ओर से राष्ट्रीय खेल दिवस (29 अगस्त) के उपलक्ष्य में ऐसे ही एथलीटों के जुनून और संघर्ष पर पेश है रिपोर्ट।
गेंदबाजी करते-करते डिस्कस थ्रो से हुआ राब्ता, रोज 140 किमी साइकिल चलाकर मंजिल हासिल करने की ठानी
मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में डिस्कस थ्रो का अभ्यास करने वाले कानपुर के अरुण सिंह को अपनी मंजिल हासिल करने का जुनून इस कदर चढ़ा कि इसके लिए वे रोज 140 किमी साइकिल चलाने से भी पीछे नहीं हटे। कभी क्रिकेटर बनने का सपना देखने वाले अरुण हर रोज मैदान पर पसीना बहाते थे। इसके साथ ही टीवी पर अन्य खेलों को भी उत्साह से देखते थे। एक दिन उन्होंने टीवी पर डिस्कस थ्रो का खेल देखा और अगले दिन क्रिकेट मैच में गेंद फेंकते-फेंकते अरुण को अपनी प्रतिभा का अहसास हुआ। इसके बाद उनका रुझान डिस्कस थ्रो की तरफ बढ़ा और उनपर इस खेल का जुनून सवार हो गया।
कोचिंग न होने पर भी हार नहीं मांगी
कानपुर में डिस्कस थ्रो की कोचिंग न होने पर भी अरुण ने हार नहीं मानी। उन्हें पता चला कि कानपुर देहात के माती में कोचिंग है। इसके बाद उन्होंने किसान पिता रामसहाय सिंह और मां अंजू के सामने डिस्कस थ्रो में भविष्य बनाने की इच्छा जाहिर की। पिता ने कहा कि रोजाना 70 किलोमीटर जाने और आने में काफी किराया लग जाएगा। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते अरुण ने फैसला किया कि वह साइकिल से ही माती तक पहुंचेंगे।
इसके बाद हर रोज सुबह नौ बजे अरुण घर से निकलते और दोपहर तीन बजे मैदान पर पहुंचते। मैदान पर पसीना बहाने के बाद अरुण शाम साढ़े पांच बजे वापस निकलते और देर रात 11 बजे घर पहुंचते। परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों सभी ने कहा कि हर रोज इतनी लंबी दूरी तक साइकिल चलाना मुश्किल है, लेकिन अरुण ने हिम्मत नहीं हारी। अरुण बताते हैं उन्होंने किसी की नहीं सुनी और लगातार साइकिल से कैंप तक पहुंचते रहे। स्पोर्ट्स हॉस्टल के लिए ट्रायल दिया तो वर्ष 2018 में उन्हें प्रयागराज के हॉस्टल में दाखिला मिल गया।
अरुण दो बार रह चुके हैं चैंपियन
अरुण स्कूल नेशनल में दो बार के चैंपियन रह चुके हैं। वहीं, जूनियर नेशनल-2023 में हिस्सा ले चुके हैं और वर्ष 2020 में खेलो इंडिया प्रतियोगिता में मामूली अंतर से चूक कर चौथे स्थान पर रहे थे। इसके अलावा जूनियर नेशनल अंडर-20 में महज 30 सेमी की दूरी से पिछड़कर वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई करने से चूक गए थे। अरुण बताते हैं कि पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं है। कोच उनके लिए भगवान हैं, जो हर संभव मदद करते हैं। वहीं, सीनियर खिलाड़ी अंशु राम और चचेरे भाई अखिलेश सिंह भी उनकी मदद करते हैं।
रगों में बसी कुश्ती, पर धावक बनने की चाह से बना रहे अलग राह
मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में वर्ष 2022 में प्रवेश पाने वाले कुशीनगर के दौलत साहनी के पिता, भाई, चाचा और मामा सभी पहलवान हैं। परिवार की रगों में कुश्ती बसी होने के बावजूद दौलत का अलग ही सपना है। प्रसिद्ध धावक मिल्खा सिंह से प्रेरित दौलत भी उनकी ही तरह धावक बनने का सपना देखते हैं और देश के लिए पदक जीतना चाहते हैं। दौलत ने कुशीनगर से रोजाना 50 किलोमीटर दूर गोरखपुर स्थित स्टेडियम जाकर प्रशिक्षण प्राप्त करना शुरू किया और कुछ ही महीनों के बाद उन्हें प्रयागराज के स्पोर्ट्स हॉस्टल में दाखिला मिल गया।
दौलत बताते हैं कि पिता पहलवान मोतीलाल साहनी कृषि करते हैं। आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं होने के चलते कई बार परिवार के लोगों ने मना भी किया, लेकिन अंत में प्रयागराज आने के लिए सभी घरवालों को मना ही लिया। हालांकि, कई बार पैसों की तंगी के चलते डाइट भी मेन्टेन नहीं हो पाती है। लेकिन सपना देश के लिए मेडल जीतने का है और इसे किसी भी तरह पूरा करना है। उनका कहना है कि एक ही मेडल उनके और उनके परिवार की तंगहाली दूर कर देगा। दौलत विद्या भारती स्कूल की राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तर की स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।
अभावों को रौंदकर सपनों के मार्ग पर बढ़ रहे आगे
एथलेटिक्स में 400 मी. की दौड़ का प्रशिक्षण लेने वाले मिर्जापुर के अमन कुशवाहा अभावों को रौंदकर अपने सपनों के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। कोरोना काल में पिता राजेंद्र प्रसाद का निधन हो गया तो अमन की पढ़ाई छूट गई। मां कौशल्या देवी खेत में मजदूरी करके बच्चों का पालन पोषण करने लगीं। बड़ा भाई आकाश कुमार भी सूरत में जाकर कुछ पैसे कमाकर घर का खर्च चलाने में मां की मदद करने लगा। अमन भी घर के खर्च में हाथ बंटाने और मां का बोझ हल्का करने के लिए शादी ब्याह में रिकॉर्डिंग का काम करने लगा। अमन का कहना है कि शादी का भी सीजन होता है, ऐसे में कुछ समय के लिए तो काम मिलता था और कमाई होती थी।
हालांकि, बाकी समय खाली बैठना पड़ता था। एक दिन मालूम हुआ कि खेल कोटे से आर्मी और पुलिस में भर्ती की राह थोड़ी आसान हो जाती है। बस उसी दिन रिकॉर्डिंग का काम छोड़कर एथलेटिक्स का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। सपना बस इतना है कि मेडल जीतकर नौकरी हासिल करूं और परिवार की तंगहाली को दूर करूं। साथ ही देश का तिरंगा वैश्विक फलक पर फहराऊं। अमन बताते हैं कि घर पर पैसे के लिए वह कभी भी फोन नहीं करते हैं। कई बार प्रतियोगिता में फटे जूते पहनकर दौड़ते हैं। हालांकि, अमन को पूरा यकीन है कि वे हालातों से पार पा जाएंगे, चाहें इसके लिए उन्हे कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े। अमन फैजाबाद में स्टेट स्तर के ट्रायल में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।
नीरज चोपड़ा से प्रेरित होकर शुरू किया खेल, जीत रहे गोल्ड
पिछले साल मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में आए कुशीनगर के अरविंद गुप्ता ने नीरज चोपड़ा को मेडल जीतता देखा तो उनके भी दिल में खेल के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाने का सपना पला। अरविंद की माली हालत बेहद खराब है, पिता रामबदन गुप्ता मजदूरी करते हैं। मजदूरी की कमाई से घर का खर्च चलाना भी मुश्किल था। ऐसे में अरविंद सूरत में जाकर वेल्डिंग का काम कर घर के खर्च में सहयोग करने लगे। नीरज चोपड़ा ने ओलंपिक में मेडल जीता तो देश भर में उनके जयकारे देख अरविंद के मन में भी इस क्षेत्र में नाम कमाने की इच्छा उठी।
सूरत में नौकरी छोड़कर वह खेल के उद्देश्य से गोरखपुर पहुंच गए। वहां उन्होंने एक शॉपिंग मॉल में नौकरी शुरू की और गोरखपुर स्टेडियम में एथलेटिक्स का प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे। किराये का कमरा महंगा था, इसलिए रिश्तेदार के घर में ही रहने लगे। अरविंद का चयन प्रयागराज स्टेडियम के हॉस्टल में हुआ तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। छात्रावास में आकर अरविंद ने अपने खेल को तो निखारा, लेकिन वह घर से पैसे मांगने की ताकत नहीं बटोर सके।
मजदूर पिता घर का खर्च ही चला लें तो बड़ी बात है। ऐसे में अरविंद घर से कोई भी मदद नहीं लेते हैं। साथी खिलाड़ी और कोच की मदद से वह अपनी कुछ जरूरतों को पूरा कर लेते हैं। अरविंद वाराणसी, लखनऊ, सैफई और गाजियाबाद में हुई राज्य स्तर की प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। इसके अलावा वह स्कूल नेशनल में स्वर्ण जीतने के साथ नेशनल अंडर-18 यूथ प्रतियोगिता का भी हिस्सा रह चुके हैं। सपना बस एक है कि देश के लिए मेडल जीतकर मजदूर पिता को गौरवान्वित करें।
घर का खर्च खुद उठाने की जिद ने बना दिया धावक
मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में इस वर्ष प्रवेश पाने वाले वाराणसी के आकाश राजभर के पिता सुरेंद्र भारद्वाज का निधन चार साल पहले हो गया। भाई बेरोजगार है। घर का खर्च मामा चलाते हैं, जो खुद ड्राइवर हैं। ड्राइवर की मामूली सी कमाई में भी मामा खुद और बहन का खर्च उठा रहे हैं। आकाश का कहना है कि कम उम्र में उन्हें कुछ समझ नहीं आया कि क्या काम करें। कोई भी काम करते तो मामूली पैसे ही मिलते। घर का खर्च चलाने के लिए पैसों की जरूरत तो होती ही है।
इसी बीच एक दिन आकाश के मोहल्ले में रहने वाले एक धावक ने मैराथन में मेडल जीता। बस उन्हीं से प्रेरित होकर आकाश ने धावक बनने का ख्वाब बुन लिया। उनका लक्ष्य एक ही था कि इस खेल के जरिये नौकरी पानी है और घर का खर्च खुद उठाना है। सबने मना किया, लेकिन आकाश ने ठान ली और दौड़ना शुरू कर दिया। 30 किलोमीटर दौड़ लगाना आकाश की दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इसी बीच ट्रायल दिया तो प्रयागराज के छात्रावास में प्रवेश मिल गया। आकाश 600 मी. की स्पर्धा के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। पटना में पिछले साल नवंबर में हुई डिस्ट्रिक्ट नेशनल प्रतियोगिता में अंडर-14 वर्ग में आकाश ने छठवां स्थान प्राप्त किया।
जब तक खिलाड़ियों में जुनून नहीं होगा, तब तक वह मैदान पर मेहनत नहीं करेंगे और इसका परिणाम भी नहीं दिखाई देगा। कई खिलाड़ी आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे हैं। यही तंगहाली उनके अंदर जुनून पैदा करती है और वह मैदान पर अपने खेल में लगातार निखार लाने का प्रयास करते रहते हैं। ऐसे खिलाड़ी जो जुनून से खेलते हैं, अंत में वे ही सफलता का स्वाद चखते हैं। प्रयागराज से एथलेटिक्स के दिग्गज नामचीन खिलाड़ी निकले हैं। आगे भी एथलेटिक्स के खेल में खिलाड़ी इस शहर का झंडा बुलंद रखेंगे। - देवी प्रसाद, उपक्रीड़ाधिकारी व एथलेटिक्स प्रशिक्षक