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गली-गली इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट कालेज खोलने पर लगे रोक
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 09 May 2016 01:57 AM IST
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Swami Shradhanand College
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भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने युवाओं और अभिभावकों को ठगने वाले शिक्षण संस्थानों से आगाह करने तथा महंगी होती शिक्षा की ओर इशारा करके गली-गली खुल रहे एमबीए और इंजीनियरिंग कालेजों की नीति को कटघरे में खड़ा कर दिया है। शिक्षाविदें का मानना है कि एमबीए करने वाले मात्र सात फीसदी युवाओं को ही नौकरी मिल रही है, ऐसे में एजुकेशन लोन में एनपीए का बढ़ना स्वाभाविक है। दरअसल सरकार दोहरी नीति अपना रही है। एक तरफ जहां क्वालिटी एजुकेशन की बात की जा रही हैं, वहीं मानक पूरा न करने वाले संस्थानों को मान्यता दी जा रही है। सरकार को इस बारे में नए सिरे से विचार करना होगा। अभिभावकों और छात्र-छात्राओं को भी समझना होगा कि एमबीए और बीटेक ही अंतिम लक्ष्य नहीं बल्कि इससे अलग भी रास्ते हैं। हां, मेहनत करने के साथ धैर्य भी जरूरी है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग के निदेशक तथा मोतीलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (मोनिरबा) के निदेशक प्रोफेसर जेएन भार्गव कहते हैं, मांग बढ़ी तो जगह-जगह प्रबंधन और इंजीनियरिंग कालेज खुल गए। हर किसी की आकांक्षा रही कि वे एमबीए और बीटेक कर ले। इस प्रवृत्ति का नतीजा अब सामने है। प्राइवेट कालेजों में बिल्डिंग तो है लेकिन फैकेल्टी नहीं है। इसके अलावा एमबीए और बीटेक डिग्रीधारकों की भीड़ की तुलना में नौकरी नहीं है। हालांकि अच्छे इंस्टीट्यूट से पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के सामने अब भी अच्छी नौकरी का संकट नहीं है। इसलिए इस भीड़ को कहीं न कहीं रोकना होगा। इसमें सरकार की मुख्य भूमिका है।
माध्यमिक के स्तर पर ही छात्र-छात्राओं के कॅरियर की दिशा तय करनी होगी। उच्च शिक्षा के लिए उसे ही आगे बढ़ना चाहिए जिन्हें रिसर्च या एकेडमिक फील्ड में जाना है। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर प्रदीप भार्गव कहते हैं, एमबीए और बीटेक की पढ़ाई में लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं लेकिन नौकरी पांच से 10 हजार रुपये की भी नहीं मिलती। इससे निराश युवाओं की भीड़ बढ़ रही है, जो हर तरह से नुकसानदायक है। पैसा देकर संस्थान खोले जा रहे हैं। इस पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं है।
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संस्थान के ही डॉ.सुनीत सिंह कहते हैं, इस स्थिति के लिए बैंक भी जिम्मेदार हैं। मेधावी विद्यार्थियों को लोन नहीं मिलता। शिक्षण संस्थान पहल कर दें तो लोन लेना आसान होता है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। एसबीआई के मुख्य प्रबंधक अनिल सिन्हा कहते हैं, एजुकेशन लोन सबसे अधिक खराब होता है। अधिक इंस्टीट्यूट खुलने से नौकरी नहीं मिल पा रही, मिल भी जाए तो इतना वेतन नहीं मिलता कि लोन चुकता हो सके। इसलिए इस सेक्टर में खराब लोन का अनुपात अधिक है।
यह है सच्चाई
0 एमबीए की पढ़ाई करने वाले सात फीसदी छात्र ही पाते हैं नौकरी
0 20 शीर्ष रैंकिंग वाले संस्थान के छात्र तुरंत पाते हैं नौकरी
0 5500 शेष प्रबंधन स्कूलों में अधिकतर छात्र बेरोजगार
0 नौकरी मिली तो भी 10 हजार प्रतिमाह से कम वेतन
0 देश में हर साल 15 लाख छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री पाते हैं
0 20 से 30 फीसदी छात्रों को नहीं मिलती नौकरी
0 सिर्फ 7.49 प्रतिशत छात्र कोर इंजीनियरिंग की नौकरी पाते हैं
0 दो साल में कैंपस प्लेसमेंट 45 प्रतिशत घटा और वेतन भी
0 एमबीए की पढ़ाई में हर साल तीन से पांच लाख होते हैं खर्च
0 मात्र आठ से 10 हजार रुपये हर माह पाते हैं वेतन
फर्जी डिग्री भी बनी चुनौती
0 बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जिनकी डिग्री मान्य नहीं है। इसके बावजूद वे डिग्री बांट रहे हैं। इतना ही नहीं ऐसे संस्थानों की ओर से बेरोकटोक बड़े-बड़े दावों के विज्ञापन भी हर जगह दिखते हैं। इससे विद्यार्थी उनकी जालसाजी में फंसकर दाखिला ले लेते हैं लेकिन जब वे नौकरी के लिए जाते हैं तब उन्हें असलियत का पता चलता है कि उनकी डिग्री मान्य ही नहीं है।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग के निदेशक तथा मोतीलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (मोनिरबा) के निदेशक प्रोफेसर जेएन भार्गव कहते हैं, मांग बढ़ी तो जगह-जगह प्रबंधन और इंजीनियरिंग कालेज खुल गए। हर किसी की आकांक्षा रही कि वे एमबीए और बीटेक कर ले। इस प्रवृत्ति का नतीजा अब सामने है। प्राइवेट कालेजों में बिल्डिंग तो है लेकिन फैकेल्टी नहीं है। इसके अलावा एमबीए और बीटेक डिग्रीधारकों की भीड़ की तुलना में नौकरी नहीं है। हालांकि अच्छे इंस्टीट्यूट से पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के सामने अब भी अच्छी नौकरी का संकट नहीं है। इसलिए इस भीड़ को कहीं न कहीं रोकना होगा। इसमें सरकार की मुख्य भूमिका है।
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माध्यमिक के स्तर पर ही छात्र-छात्राओं के कॅरियर की दिशा तय करनी होगी। उच्च शिक्षा के लिए उसे ही आगे बढ़ना चाहिए जिन्हें रिसर्च या एकेडमिक फील्ड में जाना है। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर प्रदीप भार्गव कहते हैं, एमबीए और बीटेक की पढ़ाई में लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं लेकिन नौकरी पांच से 10 हजार रुपये की भी नहीं मिलती। इससे निराश युवाओं की भीड़ बढ़ रही है, जो हर तरह से नुकसानदायक है। पैसा देकर संस्थान खोले जा रहे हैं। इस पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं है।
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संस्थान के ही डॉ.सुनीत सिंह कहते हैं, इस स्थिति के लिए बैंक भी जिम्मेदार हैं। मेधावी विद्यार्थियों को लोन नहीं मिलता। शिक्षण संस्थान पहल कर दें तो लोन लेना आसान होता है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। एसबीआई के मुख्य प्रबंधक अनिल सिन्हा कहते हैं, एजुकेशन लोन सबसे अधिक खराब होता है। अधिक इंस्टीट्यूट खुलने से नौकरी नहीं मिल पा रही, मिल भी जाए तो इतना वेतन नहीं मिलता कि लोन चुकता हो सके। इसलिए इस सेक्टर में खराब लोन का अनुपात अधिक है।
यह है सच्चाई
0 एमबीए की पढ़ाई करने वाले सात फीसदी छात्र ही पाते हैं नौकरी
0 20 शीर्ष रैंकिंग वाले संस्थान के छात्र तुरंत पाते हैं नौकरी
0 5500 शेष प्रबंधन स्कूलों में अधिकतर छात्र बेरोजगार
0 नौकरी मिली तो भी 10 हजार प्रतिमाह से कम वेतन
0 देश में हर साल 15 लाख छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री पाते हैं
0 20 से 30 फीसदी छात्रों को नहीं मिलती नौकरी
0 सिर्फ 7.49 प्रतिशत छात्र कोर इंजीनियरिंग की नौकरी पाते हैं
0 दो साल में कैंपस प्लेसमेंट 45 प्रतिशत घटा और वेतन भी
0 एमबीए की पढ़ाई में हर साल तीन से पांच लाख होते हैं खर्च
0 मात्र आठ से 10 हजार रुपये हर माह पाते हैं वेतन
फर्जी डिग्री भी बनी चुनौती
0 बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जिनकी डिग्री मान्य नहीं है। इसके बावजूद वे डिग्री बांट रहे हैं। इतना ही नहीं ऐसे संस्थानों की ओर से बेरोकटोक बड़े-बड़े दावों के विज्ञापन भी हर जगह दिखते हैं। इससे विद्यार्थी उनकी जालसाजी में फंसकर दाखिला ले लेते हैं लेकिन जब वे नौकरी के लिए जाते हैं तब उन्हें असलियत का पता चलता है कि उनकी डिग्री मान्य ही नहीं है।