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एसआरएन अस्पताल : दर्द से कराहते मरीजों पर भारी पड़ रही कैंसर की जांच में देरी, दिन में मिल रही रिपोर्ट

Wed, 10 Jan 2024 12:05 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 10 Jan 2024 12:05 PM IST
सार

बायोप्सी जांच में सबसे ज्यादा दिक्कत तीसरे चरण के कैंसर मरीजों को हो रही है। इसलिए कि जब तक उनकी रिपोर्ट आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी के हिस्टोलॉजी विभाग में कोरोना काल के बाद से बाॅयोप्सी की जांच में तेजी से इजाफा हुआ है।

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SRN Hospital: Delay in cancer investigation is taking a toll on the patients suffering from pain
बॉयोप्सी टेस्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय (एसआरएन) में कैंसर की जांच के लिए होने वाली बायोप्सी में देरी मरीजों पर भारी पड़ रही है। इसके लिए मरीजों को 15 से 20 दिन का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। इससे उन्हें न सिर्फ परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि तकलीफें भी बढ़ जा रही हैं। एसआरएन में पखवारे भर से 150 से अधिक मरीज बायोप्सी रिपोर्ट के लिए भटक रहे हैं।

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जौनपुर के अनुज तिवारी के गाल में सूजन थी। काफी इलाज के बाद आराम नहीं मिला तो एसआरएन के कैंसर विभाग में पहुंचे। वहां बायोप्सी जांच लिख दी गई। एक दिसंबर को लिखी जांच की रिपोर्ट के लिए वह भटकते रहे। 20 दिन बाद रिपोर्ट निगेटिव आई, लेकिन तब तक वह कैंसर की आशंका से भयभीत रहे। इसी तरह मिर्जापुर के मड़िहान निवासी एक व्यक्ति के मुंह में छाले पड़ गए थे।
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मुंह खुल नहीं पा रहा था। कई जगह उपचार कराने के बाद राहत नहीं मिली। संदेह के आधार पर बायोप्सी जांच लिखी गई। इनकी 22वें दिन रिपोर्ट निगेटिव आई। लेकिन, इस अवधि में चिंता और भय के कारण वह ब्लड प्रेशर के मरीज हो गए। यह दो मरीज को नमूना भर हैं। ऐसे पांच से आठ मरीज हर रोज रिपोर्ट के लिए अस्पताल का चक्कर काट रहे हैं।

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बायोप्सी जांच में सबसे ज्यादा दिक्कत तीसरे चरण के कैंसर मरीजों को हो रही है। इसलिए कि जब तक उनकी रिपोर्ट आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी के हिस्टोलॉजी विभाग में कोरोना काल के बाद से बाॅयोप्सी की जांच में तेजी से इजाफा हुआ है। जनवरी 2022 से दिसंबर तक 13 हजार और वर्ष 2023 में जनवरी से दिसंबर तक करीब 15 हजार स्मॉल और लार्ज टिश्यू की जांचें हुईं हैं। वहीं,जांच में देरी का एक कारण विभाग में काम का दबाव बढ़ने के बावजूद कर्मचारियों की कमी भी मानी जा रही है।

चिकित्सकों का कहना है कि इबॉयोप्सी की जांच भेजते समय मरीज की विस्तृत जानकारी भी पैथोलॉजी विभाग को नहीं दी जाती,इस कारण रिपोर्ट आने में देरी हो रही है। दरअसल, एसआरएन परिसर में पीएमएसएसवाई बिल्डिंग बनने से यहां पर कई विभागों की स्थापना की गई है। इसमें न्यूरो, यूरो के साथ कैंसर की यूनिट भी स्थापित की गई है। इसके बाद मरीजों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है।

प्रतिदिन ओपीडी में आ रहे 50-60 मरीज

कैंसर विभाग की बात करें तो यहां पिछले एक साल में ब्रेस्ट, माउथ, लीवर सहित कुल 739 मरीजों की सर्जरी हो चुकी है। वहीं, प्रतिदिन कैंसर विभाग में 50 से 60 मरीज ओपीडी में आ रहे हैं। यूरो और न्यूरो विभाग का भी लगभग यही हाल है। आवश्यकता पड़ने पर इन सभी मरीजों का टिश्यू जांच के लिए मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में स्थित पैथोलॉजी के हिस्टोलॉजी में भेजी जाती है।

कोरोना संक्रमण से पहले पैथोलॉजी विभाग में सात से आठ हजार बॉयोप्सी जांच हर साल होती थी। लेकिन, कोरोना काल के बाद पीएमएसएसवाई बिल्डिंग में प्रति वर्ष 14 हजार के लगभग बॉयोप्सी की जांच होने लगी है। मरीज बढ़ने के साथ रिपोर्ट जारी करने में लेट लतीफी का सबसे ज्यादा असर कैंसर मरीजों पर पड़ रह है। पैथोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ. वत्सला मिश्रा का कहना है कि जांच तो बढ़ गई है, लेकिन उनके पास कर्मचारियों का अभाव है। इस कारण रिपोर्ट मिलने में देरी हो रही है।


हमारे यहां दो टेक्नीशियन हैं। मरीजों की टिश्यू की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह संख्या चार होनी चाहिए। संसाधन की कमी की वजह से रिपोर्ट में 15 से 20 दिन का समय लग रहा है। - वत्सला मिश्रा, विभागाध्यक्ष, पैथोलॉजी विभाग, एमएलएन।

कई कैंसर के मरीज ऐसे होते हैं, जिनकी बॉयोप्सी की रिपोर्ट समय से मिलना जरूरी होता है। हमारी पूरी कोशिश रहती है कि सभी प्रकार के कैंसर का इलाज यहीं किया जाए। मरीज को बाहर रेफर न करना पड़े। - डॉ. राजुल अभिषेक, सीनियर रेजिडेंट, कैंसर विभाग।

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