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सोमेश्वर महादेव : यहां चंद्रदेव ने की थी पूजा, बीमारी से मिली थी निजात, पद्म पुराण में है महिमा का बखान

Wed, 09 Jul 2025 06:13 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 09 Jul 2025 06:13 PM IST
सार

गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम तट पर कई ऐसे स्थान हैं, जिनसे विशेष मान्यताएं और पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक नैनी स्थित सोमेश्वर महादेव मंदिर भी है।

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Someshwar Mahadev: Chandradev had worshipped here, got relief from illness, the glory of this is mentioned in
सोमेश्वर महादेव मंदिर, अरैल प्रयागराज। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम तट पर कई ऐसे स्थान हैं, जिनसे विशेष मान्यताएं और पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक नैनी स्थित सोमेश्वर महादेव मंदिर भी है। मान्यता है कि कुष्ठ रोग होने के बाद चंद्रदेव ने इसी जगह पर शिवलिंग स्थापित कर पूजन किया था और बीमारी से मुक्ति पाई थी। तभी से इस मंदिर में खासताैर पर श्रद्धालु विभिन्न बीमारियों से निजात की आस लेकर दूरदराज से पहुंचते हैं।

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पद्म पुराण की कथा के मुताबिक, सोलह कलाओं में माहिर होने की वजह से चंद्रदेव बेहद खूबसूरत नजर आते थे। राजा दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रदेव से किया था। 27 पत्नियाें में वे रोहिणी को सबसे ज्यादा मानते थे। ऐसे में बाकी 26 पत्नियां खुद को उपेक्षित महसूस करती थीं। उपेक्षा किए जाने पर बाकी पत्नियों ने चंद्रदेव को श्राप दिया था। तमाम जगहों पर इलाज कराने के बावजूद जब चंद्रदेव की बीमारी कहीं ठीक नहीं हो रही थी, तब देवताओं की सलाह पर चंद्रदेव ने तीर्थराज प्रयागराज में आकर संगम किनारे अरैल इलाके में शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की आराधना की। कहा जाता है कि तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें साक्षात दर्शन दिया। चंद्रदेव का कुष्ठरोग ठीक हुआ और उन्हें महीने में 15 दिन पूरी चमक बिखेरने का वरदान भी मिला।

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मान्यताओं के मुताबिक, चंद्रदेव द्वारा स्थापित इस मंदिर में सच्चे मन से की गई पूजा बेकार नहीं जाती। वैसे तो यहां पूरे साल देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पूजन के लिए आते हैं लेकिन कुंभ और माघ मेले में तो यहां तिल रखने तक की जगह नहीं होती। सावन के पूरे महीने के दौरान यहां मेला लगता है। भव्य शृंगार के साथ ही हर दिन रुद्राभिषेक होता है। साथ ही मंदिर परिसर भजन-कीर्तन की मधुर ध्वनि से गूंजता रहता है और भंडारे का भी आयोजन होता है।

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