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एक दिन के लिए हमारे भी हुए थे ‘शहीदे आजम’
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Mon, 23 Mar 2015 11:52 PM IST
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शहीदे आजम भगत सिंह का वैसे तो इलाहाबाद से कोई सीधा जुड़ाव नहीं रहा लेकिन आजादी की लड़ाई को धार देने केलिए वह यहां जरूर आए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हालैंड हॉल हॉस्टल के ‘कमरा नंबर आठ’ में उन्होंने एक रात गुजारी थी। यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जु़ड़े विश्वविद्यालय के छात्र अजय घोष के साथ मिलकर उन्होंने आजादी की लड़ाई की रणनीति तय की थी और सुबह उनके साथ ही चंद्रशेखर आजाद से मिलने के लिए कानपुर रवाना हो गए थे। बाद में अजय घोष भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भी बने। भगत सिंह के साथ उनकी दोस्ती खूब रही। दरअसल इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आए अजय घोष हालैंड हॉल हॉस्टल के कमरा नंबर आठ में ही रहते थे।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में कमरा नंबर आठ में रह चुके इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कमेटी के सदस्य सुधीर सिंह ने कमरे से जुड़ी स्मृतियां सहेजीं। कहा, वर्ष 1999 में यहां अजय घोष के नाती आए तो चर्चा के दौरान स्मृतियां ताजा हो उठीं। अजय घोष के संस्मरणों के मुताबिक ‘एक दिन अचानक मैंने देखा कि एक व्यक्ति मेरे कमरे के बाहर खड़ा है। जब पास से देखा तो वह भगत सिंह थे। वह बदले-बदले से नजर आ रहे थे लेकिन उनके चहरे पर परिपक्वता थी।
रात भर चर्चा के बाद सुबह हम दोनों चंद्रशेखर आजाद से मिलने के लिए साथ-साथ कानपुर के लिए रवाना हुए।’ यह बात 1928 की थी लेकिन तारीख का कोई जिक्र नहीं है। बता दें, ऐतिहासिक कमरा नंबर आठ में फिलहाल बनारस के गौरव कुमार सिंह और पुष्पेंद्र सिंह रह रहे हैं जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी के छात्र हैं। गौरव और पुष्पेंद्र इसे अपना सौभाग्य मानते हैं। कहते हैं, इस कमरे की ऐतिहासिकता को जानकर गौरवान्वित और रोमांचित होना स्वाभाविक है क्योंकि इसके साथ आजादी के आंदोलन का एक अध्याय जुड़ा है।
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‘अमर उजाला’ से बातचीत में कमरा नंबर आठ में रह चुके इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कमेटी के सदस्य सुधीर सिंह ने कमरे से जुड़ी स्मृतियां सहेजीं। कहा, वर्ष 1999 में यहां अजय घोष के नाती आए तो चर्चा के दौरान स्मृतियां ताजा हो उठीं। अजय घोष के संस्मरणों के मुताबिक ‘एक दिन अचानक मैंने देखा कि एक व्यक्ति मेरे कमरे के बाहर खड़ा है। जब पास से देखा तो वह भगत सिंह थे। वह बदले-बदले से नजर आ रहे थे लेकिन उनके चहरे पर परिपक्वता थी।
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रात भर चर्चा के बाद सुबह हम दोनों चंद्रशेखर आजाद से मिलने के लिए साथ-साथ कानपुर के लिए रवाना हुए।’ यह बात 1928 की थी लेकिन तारीख का कोई जिक्र नहीं है। बता दें, ऐतिहासिक कमरा नंबर आठ में फिलहाल बनारस के गौरव कुमार सिंह और पुष्पेंद्र सिंह रह रहे हैं जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी के छात्र हैं। गौरव और पुष्पेंद्र इसे अपना सौभाग्य मानते हैं। कहते हैं, इस कमरे की ऐतिहासिकता को जानकर गौरवान्वित और रोमांचित होना स्वाभाविक है क्योंकि इसके साथ आजादी के आंदोलन का एक अध्याय जुड़ा है।
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