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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Senior storyteller and thinker Neelkant is no more, he breathed his last at the age of 90 during treatm

Prayagraj : वरिष्ठ कथाकार और चिंतक नीलकांत नहीं रहे, दिल्ली में इलाज के दौरान 90 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस

Sun, 15 Jun 2025 04:40 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 15 Jun 2025 04:40 PM IST
सार

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार और चिंतक नीलकांत सिंह का लंबी बीमारी के बाद शनिवार तड़के निधन हो गया। 90 वर्षीय नीलकांत काफी दिनों से बीमार थे। दिल्ली में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

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Senior storyteller and thinker Neelkant is no more, he breathed his last at the age of 90 during treatm
नीलकांत सिंह, कवि। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार और चिंतक नीलकांत सिंह का लंबी बीमारी के बाद शनिवार तड़के निधन हो गया। 90 वर्षीय नीलकांत काफी दिनों से बीमार थे। दिल्ली में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से साहित्यिक जगत में शोक है। जौनपुर के बराई गांव में 22 मार्च 1942 को जन्मे नीलकांत ने हिंदी कथा साहित्य को नई दिशा दी। बचपन से ही पढ़ने-लिखने के शौकीन नीलकांत ने स्वतंत्र लेखन करते हुए उपन्यास और कहानी में विशिष्ट पहचान बनाई।

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उन्होंने ‘एक बीघा जमीन’, ‘बंधुआ रामदास’, ‘बाढ़ पुराण’, ‘महापात्र’, ‘अजगर और बूढ़ा बढ़ई’, ‘हे राम’ और ‘मतखनना’ जैसी कृतियों के जरिए समाज के विभिन्न पहलुओं को बेहद संवेदनशीलता के साथ शब्दबद्ध किया। प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला से शुरू करने के बाद उन्होंने जौनपुर के रतनुपुर स्थित चंदवक इंटर कॉलेज से हाईस्कूल पास किया, फिर इलाहाबाद आकर जीआईसी से इंटर और इविवि से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर किया।

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इविवि से जुड़ाव के बाद प्रदेश में सपा शासन के दौरान स्टेट यूनिवर्सिटी (झूंसी) में भी उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन किया। प्रसिद्ध कथाकार मार्कंडेय के भाई नीलकांत के दो बेटे हैं, जो मुंबई में व्यवसाय करते हैं। विविधतापूर्ण रचनाओं के साथ-साथ उन्होंने 1982 में ‘हिंदी कलम’ नाम से पत्रिका का संपादन भी किया, हालांकि यह पत्रिका केवल चार अंकों तक ही प्रकाशित हो सकी।

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वर्ष 2016 में कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका ‘लहक’ ने उन पर विशेषांक प्रकाशित किया था, जो खासा चर्चित रहा। साहित्य भंडार समेत कई संस्थाओं ने उन्हें उनके विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित भी किया था। नीलकांत जी अपने समय की साहित्यिक प्रवृत्तियों को लेकर भी बेहद मुखर रहे।

प्रयागराज के टालस्टॉय थे नीलकांत : डॉ. इम्तियाज गाजी

प्रयागराज। गुफ्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज अहमद गाजी ने कहा, नीलकांत जी सच्चे मायने में साहित्यकार थे। उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। उनकी कहानियों में प्रेमचंद और टालस्टॉय के बिंब स्पष्ट रूप से नजर आते हैं। उनके निधन से पूरे साहित्य जगत के साथ-साथ प्रयागराज के साहित्य को बड़ी क्षति पहुंची है।

चले गए हिंदी के एकांत साधक नीलकांत

नीलकांतजी का जाना साहित्य जगत को सूना कर दिया है। इविवि के हिंदी विभाग के प्रोफेसर कुमार वीरेंद्र बताते हैं, झूंसी स्थित एक कमरे के मकान में में खुद खाना बनाकर खाते थे। इसी में से कुछ हिस्सा गोरैया, बुलबुल, तोता, मैना और कौआ को खिलाते थे। उनके बगीचे में अल्फांसो आम, नींबू, आंवला, पपीता, अमरूद में से कोई न कोई एक फला ही रहता था। उनके बीच बैठकर नीलकांतजी रोज लिखते-पढ़ते रहते थे। वे जहां भी सोते थे, उसी पर किताबें और समकालीन पत्रिकाएं रहती थी। हाथ में स्वनिर्मित छड़ी, मुंह में मगहिया पान, सिर पर हैट और कंधे पर शांति निकेतनी झोला लेकर साहित्य के एकांत साधक की तरह निकलते थे। उन्होंने बताया कि ग्रेटर नोएडा के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में देहदान किया गया है।

आज के सबसे वरिष्ठ और चमकदार सितारे नीलकांत जी का देहावसान, इलाहाबादी साहित्यिक आभा मंडल को बहुत धुंधला कर गया है। उनके लिए नीलाभ जी के शब्द थे, यकीन मानो इतना सौम्य, सज्जन और शरीफ व्यक्ति है कि कभी-कभी नीलगाय कहने को जी चाहता है। - भूमिका अश्क, कथा लेखिका

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